'कांग्रेस सरकार में मुस्लिमों की परेशानियां बढ़ीं हैं'

  • 13 मार्च 2014

दारुल उलूम देवबंद के एक वरिष्ठ मुफ़्ती ने बीबीसी से कहा है कि पिछले 10 वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौर में देश के मुसलमानों की परेशानियां बढ़ीं हैं.

दारुल उलूम देवबंद के अरबी विभागाध्यक्ष मुफ़्ती अशरफ़ अब्बास क़ासमी ने बीबीसी से हुई एक विशेष बातचीत में भ्रष्टाचार और नरेंद्र मोदी समेत कई मसलों पर खुल कर बातचीत की.

उन्होंने कहा, "पिछले दस साल में विकास तो हुआ है लेकिन ख़ुद मुसलमान जो आमतौर से इन्हीं पार्टियों को वोट देते आए हैं, उनकी परेशानियां बढ़ीं. जो फ़सादात हुए उनपर कोई रोक तो नहीं लग सकी. लेकिन साथ ही मुसलमानों को ये भी लगा कि उनका दर्द और ग़म बांटने वाला कोई भी नहीं है.''

मुफ़्ती अशरफ़ अब्बास क़ासमी ने कहा, "ख़ुद सच्चर कमेटी रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि भारत में दलितों से भी बुरी हालत मुसलमानों की है. यह अजीब सी बात है कि मुसलमानों को बिल्कुल ही नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.''

वो कहते हैं कि सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर भी किसी तरह का कोई अमल कांग्रेस के हुकूमत में मौजूद रहने के बावजूद नहीं हुआ. "मुसलमानों को रिजर्वेशन दिए जाने का मामला लटका का लटका रह गया."

उनका कहना था, ''शायद यही वजह है कि मुसलमान बार-बार अपने दुख और दर्द का इज़हार भी करते रहते हैं.''

नए दलों पर भरोसा कम

मुफ़्ती अशरफ़ अब्बास क़ासमी भारत में मौजूदा शिक्षा प्रणाली से भी ज़्यादा ख़ुश नहीं लगे.

उन्होंने कहा, "हमारे यहाँ शिक्षा का असल मक़सद है मानवता और इंसानियत की भावना पैदा करना, लेकिन उसी में हम मात खा रहे हैं. सिर्फ औपचारिक तालीम से हम प्रगति का जो मक़सद चाहते हैं वो पूरा नहीं हो सकेगा.''

उन्होंने बेबाक़ तरीक़े से स्वीकार किया की भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भ्रष्टाचार ने अपने पैर बड़ी तेज़ी से पसारे हैं.

उन्होंने कहा, "जब भी कोई चीज़ हद से ज़्यादा हो जाती है तो लोगों में उसके ख़िलाफ़ ग़ुस्सा बढ़ जाता है. अभी पानी सर से ऊपर हो गया है. इसीलिए कुछ लोग इसी को मुद्दा बना कर मैदान में आ रहे हैं. लेकिन ऐसी पार्टियां जब मैदान में आतीं हैं तो लोगों को यह भी लगता है कि जैसा ये कह रहे थे वैसा वे कर नहीं पा रहे हैं.''

ज़ाहिर है मुफ़्ती अशरफ़ अब्बास क़ासमी का इशारा अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और दिल्ली में उनके छोटे दौर के शासनकाल की ओर था.

मुलायम फैक्टर

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर शहर के नज़दीक स्थित भारत में सबसे बड़े इस्लामी मदरसों में से एक दारुल उलूम देवबंद ने क़रीब एक हफ्ते पहले ही देश के मुसलमानों से अपील की थी कि उन्हें चुनावों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए और बड़ी तादाद में वोट देना चाहिए.

कुछ दिनों पहले ही समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सहारनपुर में जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द के मुखिया मौलाना सैयद अरशद मदनी के साथ एक रैली में मंच साझा किया था.

मौलाना सैयद अरशद मदनी को दारुल उलूम देवबंद के सबसे ज़्यादा अहमियत रखने वाले धार्मिक नेताओं में गिना जाता है.

दारुल उलूम देवबंद भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी शिक्षा के केन्द्रों में से एक है.

माना जाता है कि भारत में मुस्लिम समुदाय, देवबंद और यहाँ की राजनीतिक और शैक्षिक विचारधारा से ख़ासा प्रभावित भी रहता है.

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