क्या फिर बीजेपी का खेल बिगाड़ेंगे केजरीवाल?

  • 13 मार्च 2014
केजरीवाल

एडवर्ड लोरेंज़ ने 1972 में 'अमरीकन एसोसिएशन फ़ॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस' के लिए एक शोध पत्र लिखा था- पू्र्वानुमान: क्या ब्राज़ील में तितलियों का पंख फड़फड़ाना टेक्सास में आने वाले तूफ़ान की वजह हो सकता है?

उनका कहना था कि बहुत छोटे-छोटे वायुमंडलीय परिवर्तन अंततः बड़े पैमाने पर परिवर्तनों का सिलसिला शुरू कर सकते हैं जो आख़िरकार तूफ़ान का रास्ता बदलने जैसे परिणामों में तब्दील हो सकता है.

बहरहाल, यहां सवाल यह है कि महज़ तीन महीने पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान मज़बूती से उभरे अरविंद केजरीवाल का असर क़रीब महीने पर दूर लोकसभा चुनाव में रहेगा? दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने से रोक दिया था. लेकिन क्या वह इसे आम चुनाव में भी दोहरा पाएंगे?

हाल के अपने गुजरात दौरे के बाद केजरीवाल ने अपनी कोशिशों को तेज़ किया है. उन्होंने ना केवल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के गुजरात विकास के दावे पर सवाल उठाए हैं बल्कि बीते दस साल से दंगा मुक्त होने के दावे और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी उन्हें घेरा है.

'बकवास विकास मॉडल'

गुजरात के दौरे के बाद तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर सात मार्च को इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में बात करते हुए केजरीवाल ने मोदी के विकास मॉडल को बकवास बताया और आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के मामले में दागी पुरुषोत्तम सोलंकी गुजरात में मंत्री बने हुए हैं जबकि बाबू बोखारिया एक खनन घोटाले में दोषी क़रार दिए जाने के बावजूद मंत्री पद धारण किए हुए हैं.

दरअसल 2011 की जनगणना की रिपोर्ट के बाद मोदी के दावों का खोखलापन निकल कर सामने आने लगा था. लेकिन केजरीवाल की चुनाव प्रचार शैली ने इसे धार दी है-भले ही अराजक अंदाज़ में ही सही.

लेकिन केजरीवाल का कैंपेन चलाने का डायनामिक अंदाज़, चाहे वह अराजक ही क्यों ना हो, भाजपा के लिए चिंता पैदा करने वाला है. आख़िरकार बीते 15 साल से दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को उनके ही विधानसभा से हराने वाले केजरीवाल की पहचान अप्रत्याशित परिणाम देने वाले के रूप में होने लगी है.

गुजरात दौरे के पहले ही दिन केजरीवाल को थोड़े समय के लिए राधनपुर पुलिस थाने में हिरासत में ले लिया गया था जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली और लखनऊ में भाजपा कार्यालयों के बाहर आप का भारी विरोध प्रदर्शन हुआ. दोनों पक्षों की ओर से ईंट, गमलें, और कुर्सियां चली जिससे दोनों ओर से कई घायल हुए. गुजरात पुलिस के द्वारा केजरीवाल को हिरासत में लेने और उनकी कार पर हमले ने निश्चित रूप से मोदी की घबराहट के संकेत दिए हैं.

इसके अलावा, हाल ही में सीएनएन-आईबीएन के सर्वेक्षण में राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की लोकप्रियता को एक प्रतिशत बढ़ता हुआ दिखाया गया है, जबकि मोदी की लोकप्रियता, जनवरी में 36 प्रतिशत से पाँच प्रतिशत घटती हुई दिखाई गई है.

साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद मोदी ने "छह करोड़ गुजरातियों" के विकास के लिए समर्पित होने की छवि गढ़ने और अपने हिंदुवादी छवि बदलने के लिए बहुत मेहनत की है. यह छवि धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से नक़ली साबित हुई है.

गिरावट

मोदी के नेतृत्व के दौरान 2001 से गुजरात की शिक्षा के क्षेत्र में रैंकिंग 16 से 2011(जनगणना के आंकड़ों) में गिरकर 18 तक पहुंच गई है. साल 2001 में गुजरात में प्रति व्यक्ति आय राज्यों के बीच चौथी स्थान पर थी. यह अब छठे स्थान पर गिर गया है. गुजरात साक्षरता, स्कूल छोड़ने की दर, उम्र, शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर जैसे सभी प्रमुख स्वास्थ्य और शिक्षा सूचकांक में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल से पीछे है. राज्य में कुपोषण का स्तर पिछड़ा माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से भी बदतर है.

इस सब के बावजूद, तथ्य यह है कि पार्टी मशीनरी के अभाव में केजरीवाल की पार्टी भाजपा और कांग्रेस से पिछड़ सकते हैं. लेकिन, एक बेहद क़रीबी चुनाव में जहां हर वोट की गिनती मायने रखेंगी, 'आप' कुछ सीटें जीतने के अलावा भाजपा और कांग्रेस के क़िस्मत को प्रभावित कर सकती है.

भाजपा नेता

मोदी के गुजरात के बाहर किसी लोकसभा सीट पर लड़ने के हालात में, जैसा कि भाजपा नेताओं ने वाराणसी सीट का सुझाव दिया है, केजरीवाल आमने-सामने की टक्कर दे सकते हैं जैसा दिल्ली में शीला दीक्षित के साथ किया था.

इस ख़तरे को भाजपा हल्के में नहीं ले सकती है, भले ही उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिदृश्य में दिल्ली की तरह 'आप' के अधिक पक्ष में ना हो.

लेकिन लोकसभा की दौड़ में सिर्फ यह 'आप' नहीं है जिसने भाजपा को परेशान कर दिया है. लोकसभा टिकट के लिए होड़ की वजह से चुनाव से पहले पार्टी की मुश्किलें बढ़ना आम बात है. लेकिन इस तकरार में कभी भी किसी भी पार्टी में शीर्ष नेतृत्व शामिल नहीं रहा है.

पिछले सप्ताह से पार्टी में इस बात के लेकर विवाद चल रहा है कि लालजी टंडन, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और वर्तमान पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहां से चुनाव लड़ें. पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी को भी इस विवाद में घसीट लिया गया है.

खींचतान

बीजेपी के नेताओं ने ख़ुद इन अटकलों को हवा दी है कि मोदी उत्तर प्रदेश में लखनऊ या वाराणसी के साथ ही गुजरात में एक निर्वाचन क्षेत्र से अखिल भारतीय नेतृत्व के दावे को मज़बूती देने के लिए चुनाव लड़ सकते हैं.

यह महसूस किया गया है कि यह क़दम लोकसभा में 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले उत्तर प्रदेश से पार्टी की सीटों को अधिकतम सीटे दिलवाने में कामयाब होगा.

लखनऊ राज्य की राजधानी है और यह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव क्षेत्र रहा है जबकि प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर के कारण वाराणसी हिंदुओं के लिए तीर्थ यात्रा का एक महत्वपूर्ण स्थान है.

इसके अलावा, आरएसएस का एक संगठन विश्व हिंदू परिषद लंबे वक़्त से मस्जिद के क़ब्ज़े वाले मंदिर क्षेत्र को सौंपने की मांग करता रहा है. यह संघ परिवार की हिंदुत्ववादी मांगों का हिस्सा रहा है .

जोशी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी को मोदी को दिए जाने के मीडिया रिपोर्टों के बाबत राजनाथ सिंह से पूछा था. उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला.

जोशी और मोदी
जोशी ने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी को मोदी को दिए जाने के मीडिया रिपोर्टों के बाबत राजनाथ सिंह से पूछा था.

आरएसएस के दबाव के बाद जोशी ने कहा कि वह इस मामले में पार्टी निर्णय का पालन करेंगे. अन्य रिपोर्टों के मुताबिक़ सिंह लखनऊ से चुनाव लड़ने के लिए गाज़ियाबाद निर्वाचन क्षेत्र छोड़ना चाहते थे. लालजी टंडन ने कहा कि वह मोदी को छोड़कर, किसी और के लिए अपनी सीट ख़ाली नहीं करना चाहेंगे.

'मोदी लहर'

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ने पूछा है कि उत्तर प्रदेश में अगर " मोदी लहर" है और पार्टी ने दावा किया है कि 40 सीटों के ऊपर जीत का यक़ीन है तो भाजपा नेताओं के द्वारा "सुरक्षित सीटों" के लिए मारामारी क्यों की जा रही है? क्यों पार्टी अध्यक्ष गाज़ियाबाद छोड़ने के लिए तैयार थे? उत्तर प्रदेश में मोदी उस सीट से क्यों नहीं लड़ते जो भाजपा 2009 में नहीं जीत पाई थी? इन मुश्किल सवालों का भाजपा ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया है .

यह सब काफ़ी नहीं था कि विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने छह मार्च को ट्वीट किया- "मैं कर्नाटक में भाजपा के साथ बीएसआर के विलय या गठबंधन का विरोध करती हूँ." बाद में ट्वीट को हटा दिया गया और ट्वीट से इनकार कर दिया गया.

हालिया घटनाओं ने पार्टी नेतृत्व के भीतर उचित विचार विमर्श के अभाव का संकेत दिया है. विपक्षी दलों ने कथित भ्रष्ट तत्वों के साथ गठजोड़ बनाने के लिए भाजपा की आलोचना शुरू कर दी है.

भाजपा के अंदरख़ाने से असहमति के स्वर कई मौक़ों पर खुल कर सामने आए हैं वह चाहे सुषमा स्वराज और मोदी के तल्ख़ संबंधों की बात हो या फिर कई मौक़ों पर जेटली और सुषमा स्वराज की पार्टी अध्यक्ष के साथ तकरार की बात. ये दोनों नेता मोदी की जगह लाल कृष्ण आडवाणी को वरीयता देने के लिए जाने जाते हैं और अब संघ प्रमुख ने भी अपने कैडरों को मोदी की प्रशंसा में नमो नमो की बजाय पार्टी के लिए काम करने की सलाह दी है .

मोदी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पसंदीदा उम्मीदवार हैं इसमें कोई संदेह नहीं है लेकिन क्या तितलियों के पंख फड़फड़ाने से लोकसभा चुनावों के नतीजे बदल जाएंगे?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)