'मोदी और आरएसएस में मतभेद सोचना भी बेबुनियाद'

  • 12 मार्च 2014

जाने माने राजनीतिक विश्लेषक ज्योतिर्मय शर्मा ने कहा है कि नरेंद्र मोदी संघ प्रमुख मोहन भागवत के चहेते हैं और संघ की पूरी कोशिश होगी कि किसी तरह उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाए.

उन्होंने कहा कि मोदी और संघ में किसी भी तरह के वैचारिक मतभेद की बात सोचना भी बेबुनियाद है.

बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद ने उनसे इस बारे में लंबी बात की.

सवाल- ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि संघ प्रमुख ने कहा है कि संघ का काम नमो-नमो करना नहीं है. मोहन भागवत ऐसा कह सकते हैं?

जवाब- इस मुद्दे पर दो बातें अहम हैं. 1925 से लेकर मोहन भागवत के आने से पहले तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक भिन्न प्रकार का संगठन था. जहां उन्हें राजनीति से केवल परहेज़ ही नहीं था, बल्कि चिढ़ थी. गुरू गोलवलकर का मानना था कि समाज और संस्कार को पहले बदला जाए, राजनीति अपने आप बदल जाएगी.

भागवत के आने के बाद उनकी विचारधारा पूरी तरह से बदल जाती है. भागवत के आने के बाद आरएसएस में माना जाता है कि राजनीति अछूत नहीं है. राजनीति और भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से सत्ता हासिल करना ज़रूरी है.

नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत के चहेते हैं. उन्हें भागवत और स्वयंसेवक संघ ने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर चुना है.

यहां तो वैचारिक मतभेद का सवाल ही नहीं उठता है.

(ज्योतिर्मय शर्मा से पूरी बातचीत सुनें)

आरएसएस में व्यक्ति विशेष को उभारने और उसका नाम जपने की प्रथा नहीं है. पर्सनैलिटी कल्ट के बारे में आरएसएस वालों का मानना है कि यह संगठन के विरूद्ध जाता है. संगठन में हर आदमी की अपनी भूमिका होती है. अगर व्यक्ति विशेष पर ध्यान दिया जाए तो संगठन कमज़ोर पड़ता है.

एक सामान्य स्थिति में कांग्रेस तक कहती है कि कांग्रेस में शीर्ष नेता हैं, बड़े अच्छे नेता हैं, केवल वंशवाद की बात नहीं है.

सामान्य तौर पर हो सकता है कि भागवत ने कहा भी हो, लेकिन मुझे लगता नहीं है कि अब वो नमो जाप से पीछे हटेंगे या पीछे हटकर कहीं जाएंगे. भागवत की क़िस्मत, संघ की क़िस्मत और उनका भविष्य अब मोदी से बंधा है.

सवाल- ऐसे में 2014 के लोकसभा चुनाव में संघ की भूमिका को किस तरह से आप देखते हैं?

जवाब- संघ कोशिश ज़रूर करेगा. संघ हर तरह से प्रयास करेगा. सुनने में आया है कि संघ से प्रेरित संगठन, जैसे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, भारतीय किसान संघ को कहा गया है कि आप चुपचाप रहिए, फ़ोकस बीजेपी से हटने नहीं दीजिए.

आप कोई ऐसा कार्य मत करिए जिससे बीजेपी के चुनाव प्रचार और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम खटाई में पड़ जाए. आरएसएस चुनाव में शरीक हो कर बीजेपी की मदद करने की हरसंभव कोशिश करेगा. इस बार कोई हिचकिचाहट नहीं है.

सवाल- इन हालात में हिंदुत्व का कितना असर होगा चुनाव प्रचार पर. क्या आरएसएस का ख़ास एजेंडा भी दिखेगा?

जवाब- आरएसएस का अभी एक ही एजेंडा है- नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना. हिंदुत्व ऐसा विषय है, जो वे चुनाव के बाद उठाएंगे. चुनाव से पहले नहीं उठाएंगे. मिडिल क्लास के लिए हिंदुत्व अब मुद्दा नहीं है. उसके लिए करप्शन, बिजली-पानी-सड़क मुद्दा है. महंगाई मुद्दा है. हिंदुत्व को मुद्दा बनाने में आरएसएस और बीजेपी को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है.

इस चुनाव में वे नरेंद्र मोदी के गुजरात के डेवलपमेंट मॉडल को लेकर ही आगे बढ़ेंगे.

सवाल- एक महीने से भी कम वक़्त बचा है, चुनाव के शुरू होने में. ऐसे में क्या वे हिंदुत्व के मुद्दे को हवा देंगे?

जवाब- मोहन भागवत के आरएसएस में आने के बाद एक बात और हुई है. संघ की विचारधारा में अब केवल प्रैगमैटिज़्म रह गया है.

हिंदुत्व वैसे तो कोई मुद्दा नहीं है लेकिन सेकुलर फ़ॉर्म में आज भी चुनावी मुद्दा है. भारत को सुपर पॉवर बनाना, स्ट्रांग बनाना, दुश्मनों को उनकी जगह बताना सेक्युलराइज़ड हिंदुत्व है.

ये हमें स्वाभाविक रूप से दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन यह मौजूद है. हिंदू राष्ट्र के विज़न के सेक्युलर डायमेंशन भी हैं.

सवाल- नरेंद्र मोदी अपने चुनाव प्रचार में जिन मुद्दों को उठा रहे हैं, आप उसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब- छह महीने से उनका घिसापिटा मॉडल है, डेवलपेमेंट का मॉडल है. प्रोगेस और गुजरात का मॉडल है. लेकिन मीडिया वालों की भी इसमें कुछ ग़लती है. मोदी गुजरात के मॉडल की जब बात करते हैं तो मीडिया वाले सवाल नहीं उठाते हैं. उन्होंने यूपी में जाकर कहा यूपी में दूध नहीं है, हम अमूल की तरह श्वेत क्रांति लेकर आएंगे. किसी ने यह नहीं कहा कि श्वेत क्रांति नरेंद्र मोदी नहीं लेकर आए थे.

यह क्रांति तो 40-50 सालों से कूरियन साहब और एचएम पटेल की बदौलत है. ऐसी कई बात वह उठाते रहे हैं, मीडिया का दायित्व बनता है कि सवाल पूछे जाएं. लेकिन जिस तरह से उनका प्रचार जा रहा है ऐसे में मुझे नहीं लगता है कि वह हिंदुत्व को मुद्दा बनाएंगे.

सवाल- अरविंद केजरीवाल अपने गुजरात दौरे के बाद नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहे हैं, ऐसे में क्या संघ और मोदी पर उनका असर पड़ेगा?

जवाब- ज़रूर पड़ेगा. ज़रूर पड़ेगा. क्योंकि केजरीवाल वो सब कुछ कह जाते हैं, जो आप और हम कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते हैं, शिष्टाचार के नाते कह नहीं पाते, डर के मारे नहीं कह पाते या मीडिया के लोग किसी बिज़नेस हाउस के साथ बंधे हैं तो नहीं कह पाते. एक झूठी हिचक है नरेंद्र मोदी के बारे में बहुत कुछ कहने की. और इस हिचक को अरविंद केजरीवाल ने दूर किया है. तो बहुत सारी चीज़ें हैं ऐसी जो हम कहना चाहते हैं पर नहीं कह पाते. संघ परिवार और बीजेपी चिंतित तो ज़रूर होंगे. भले ही अरविंद केजरीवाल उतनी सीटें न जीतें इस चुनाव में, पर जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं 'कॉलिंग द इम्पेरर नेकेड' वो रोल अरविंद केजरीवाल ने बख़ूबी निभाया है.

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