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मुहांसों का एक इलाज गर्भ-निरोधक गोली भी!

 शुक्रवार, 14 मार्च, 2014 को 10:57 IST तक के समाचार
हॉर्मोन ट्रीटमेंट, महिला

एक महिला के जीवन में आम तौर पर ऐसे कई मौके आते हैं, जब इलाज के लिए हॉर्मोन देने की ज़रूरत पड़ती है. माहवारी के शुरू होने से लेकर ख़त्म होने तक ये सिलसिला कायम रहता है.

हॉर्मोन का ये हस्तक्षेप सबसे ख़तरनाक तब होता है जब हॉर्मोन के ज़रिए महिला के शरीर में अंडों का उत्पादन बढ़ाया जाता है ताकि अंडे दान किए जा सकें. इस प्रक्रिया में महिला की मौत तक हो सकती है.

आम जीवन में भी हॉर्मोन एक महिला के शरीर में बहुत पहले ही दाख़िल होने लगते हैं.

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विशाखा तब दसवीं कक्षा में थीं जब सितंबर महीने में शुरू हुई उनकी माहवारी अपने नियमित पांच दिनों में ख़त्म नहीं हुई, बल्कि वो सिलसिला दो हफ़्ते के बाद भी चलता रहा.

वो पहली बार था, जब उन्हें एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ के पास जाना पड़ा. पहली बार हॉर्मोन वाली दवा लेनी पड़ी. जब विशाखा की माहवारी 21 दिन तक चली, वो तब 15 साल की थीं.

माहवारी

अब 15 साल बाद, जब पीछे मुड़कर देखती हैं, तो कहती हैं, “वैसे तो इतने दिनों तक दर्द, थकान और माहवारी से जुड़ी परेशानियां याद आती हैं, पर मन के ज़्यादा पास वो अहसास है… मां के साथ उस डॉक्टर के पास जाने का, एक लड़की होने का, अपने लिंग से जुड़ी पहली ख़ास परेशानी का, लड़कों से अलग बीमारियों और इलाज से रूबरू होने की वो शुरुआत कभी नहीं भूलेगी.”

विशाखा के मुताबिक़ तब उन्हें नहीं मालूम था कि उन्हें दी गई दवा में हॉर्मोन हैं.

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (एम्स) में स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीरजा भाटला के मुताबिक़ महिलाओं से जुड़ी कई परेशानियों की जड़ में शरीर में हॉर्मोन का असंतुलन है और इसका इलाज हॉर्मोन देकर ही किया जाता है.

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हालांकि उनके मुताबिक़ ऐसा डॉक्टरी देखरेख में होना बेहद ज़रूरी है. उन्होंने कहा, “किशोरावस्था में माहवारी के शुरू होने से लेकर प्रौढ़ावस्था में माहवारी के ख़त्म होने के बाद भी एक महिला के इलाज में हॉर्मोन इस्तेमाल किए जाते हैं. इनके बारे में विश्वभर में शोध किया गया है, सही मात्रा में और नियमित रूप से चेक-अप के साथ दिए गए हॉर्मोन से साइड इफ़ेक्ट को कम से कम किया जा सकता है.”

मुंहासे

मुहांसे, महिला

विशाखा ने पहली बार हॉर्मोन माहवारी के न रुकने पर लिए, लेकिन कई युवतियों को मुंहासों की परेशानी के लिए भी हॉर्मोन लेने पड़ते हैं और ये हॉर्मोन गर्भनिरोधक गोली की शक्ल में भी दिए जाते हैं.

अक्सर मुंहासे चिकनाई पैदा करने वाले कॉस्मेटिक, मौसम में नमी या किसी दवा के असर की वजह से होते हैं. लेकिन कई बार ये हॉर्मोन से जुड़े असुंतलन से भी हो जाते हैं. ऐसे में इन्हें क्रीम से नहीं बल्कि हॉर्मोन के ज़रिए ही ठीक किया जाता है.

हॉर्मोन वाला ये इलाज कुछ महीने तक चल सकता है और ये गर्भनिरोधक गोली ग़ैर-शादीशुदा लड़कियों को भी दी जा सकती है.

ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना (एनएचएस) के मुताबिक़, 'मुंहासों के अलावा महिला के शरीर पर सामान्य से ज़्यादा बाल उगने या पुरुषों की तरह गंजापन या बाल झड़ना भी हॉर्मोन के असंतुलन की वजह से हो सकता है, जिसका इलाज गर्भनिरोधक गोलियों से किया जाता है.'

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दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की डर्मेटॉलोजिस्ट डॉक्टर बिंदु दीवान बताती हैं, “इसके लिए हम ज़्यादातर गर्भनिरोधक गोलियां देते हैं. ये बहुत कम मात्रा में दी जाती हैं और इनके ख़ास दुष्प्रभाव नहीं होते, पर अगर महिला के परिवार में किसी को स्तन कैंसर रहा हो, महिला धूम्रपान करती हो, डायबेटिक हो या उनका कोलेस्ट्रॉल ज़्यादा हो तो हॉर्मोन वाला इलाज बहुत ध्यान से करना होता है.”

मेनोपॉज़

महिलाएं, दवा

पिछले साल विशाखा अपनी मां को उसी स्त्रीरोग विशेषज्ञ के पास लेकर गईं जिनके पास 15 साल की उम्र में मां उन्हें लेकर गईं थीं. एक बार फिर इलाज हॉर्मोन के ज़रिए शुरू हुआ.

दरअसल कुछ समय से उनकी मां की नींद टूट जाती थी, अचानक गर्मी महसूस होने के बाद ख़ूब पसीना आता था और बात-बात पर झुंझलाहट होती थी.

उनकी मां 50 साल की दहलीज़ पार कर चुकीं थीं, और ये सारे लक्षण थे ‘मेनोपॉज़’ के, यानी जीवन में माहवारी ख़त्म होने के. इस दौर में अक़्सर हॉर्मोन दिए जाते हैं.

अमरीका के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ मेनोपॉज़ल हॉर्मोन थेरेपी से ख़ून के थक्के बनने, दिल का दौरा, स्तन कैंसर और गॉल ब्लैडर की बीमारी होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

विशाखा कहती हैं, “ऐसा नहीं है कि उस इलाज के बाद सब कुछ ठीक हो गया, हॉर्मोन तो दिए ही गए, मां का गर्भाशय भी निकाला गया, वो अब भी ठीक से सो नहीं पातीं, चिड़चिड़ाहट भी बनी रहती है, शायद कुछ और महीने लगें, और शायद हमें और उन्हें इस बदलाव की आदत पड़ जाए.”

गर्भ-निरोध

पिल, मेडिसिन, कैप्सूल, बॉटल

आदत तो विशाखा ने भी डाली है, एक बच्चा पैदा होने के बाद गर्भनिरोधक गोली खाने की, और अब वो जानती हैं कि उस गोली में भी हॉर्मोन ही हैं. पिछले सालों में बाज़ार में आई ‘इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल’ भी शरीर में हॉर्मोन ही डालती हैं.

फ़ोर्टिस अस्पताल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर एसएन बासु कहती हैं, “ये दवाएं लंबे समय तक गर्भ-निरोध के लिए नहीं बल्कि आपातकालीन स्थिति में ही ली जानी चाहिए क्योंकि इसके शरीर पर कई दुष्प्रभाव हो सकते हैं. हॉर्मोन का इस्तेमाल किए बग़ैर भी गर्भ-निरोध के कई तरीक़े हैं, जिन्हें अपनाना चाहिए.”

अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक़ गर्भ-निरोधक गोलियां लेने से मुंहासे, मोटापा, माहवारी में बदलाव और स्तन के विस्तार से लेकर लीवर में ट्यूमर होने का ख़तरा हो सकता है.

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वैसे तो थाएरॉइड के कम या ज़्यादा होने की सूरत में थाएरॉइड हॉर्मोन दिया जाना भी आम है. कुछ डॉक्टर तो महिलाओं के माइग्रेन के इलाज के लिए गर्भनिरोधक गोली भी देते हैं, हालांकि इसका मिलाजुला प्रभाव ही देखा गया है.

अंडों का दान जानलेवा?

एग, स्पर्म

लेकिन सबसे विवादास्पद है हॉर्मोन के ज़रिए महिला के शरीर में अंडों का उत्पादन बढ़ाना ताकि अंडे दान किए जा सकें.

अंडों का ये दान किसी महिला की ज़िंदगी का सहज हिस्सा नहीं है बल्कि ये पैसों के एवज़ में की जाने वाली प्रक्रिया है.

इस प्रक्रिया में हॉर्मोन का इस्तेमाल हॉर्मोन के असंतुलन को ठीक करने के लिए नहीं किया जाता बल्कि असंतुलन बनाने के लिए किया जाता है.

आम तौर पर एक महिला के शरीर में हर महीने एक या कभी-कभार दो अंडे बनते हैं. अंडों की मात्रा बढ़ाने के लिए महिला को हॉर्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं.

फिर अंडों को महिला के शरीर से निकाल लिया जाता है. ये अंडे बाद में किसी ऐसी महिला को गर्भवती करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं जिसका शरीर अंडे बनाने में अक्षम हो.

डॉक्टर एसएन बासु के मुताबिक़, “महिला की सेहत को देखते हुए इस प्रक्रिया में हॉर्मोन बहुत संतुलित मात्रा में दिए जाते हैं, अगर कोई दुष्प्रभाव दिखे तो इसे फौरन रोक देना चाहिए.”

जटिलताएं

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक़ अंडों का दान करने वाली महिलाओं में इस प्रक्रिया से जुड़ी जटिलताओं से आठ प्रतिशत तक मृत्यु का ख़तरा हो सकता है.

डॉक्टर नीरजा बाटला कहती हैं, “इस प्रक्रिया में हम ‘नॉर्मल’ की सीमा लांघते हैं, तो इसकी वजह से पेट में पानी भरने, शरीर में तरल पदार्थों का असंतुलन या किडनी और लीवर के काम ना करने की नौबत आ सकती है जिससे महिला की मौत तक हो सकती है.”

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने अंडों के दान समेत असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेकनिक्स के नियमन के लिए साल 2010 में एक बिल बनाया था.

हालांकि ये बिल अभी तक संसद में नहीं पहुंचा है.

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