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गोधराः क्या यही वो जगह है..

 गुरुवार, 27 फ़रवरी, 2014 को 15:08 IST तक के समाचार

गोधरा वो शहर है, जिसने महात्मा गांधी को चरखा दिया, जिसके माध्यम से उन्होंने एकीकृत भारत के ताने-बाने को बुना. यही गोधरा इतिहास में उस ट्रेन हादसे के लिए ज़्यादा जाना जाएगा जिसने गुजरात के सामाजिक ताने बाने को जलाकर राख कर दिया.

इस घटना को 12 साल बीत चुके हैं. लेकिन साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग की घटना एक ऐसा धब्बा है जिसे गोधरा मुक्त नहीं हो सकता.

गोधरा रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन के दो कोचों में लगी आग में 59 लोग जल कर मर गए थे.

27 फरवरी 2002 की तारीख, ऐसा दिन है जिसे गोधरा के ज़्यादातर लोग भूल जाना चाहते हैं.

एक भूत की तरह ही यह गोधरा को डराता है. जैसा कई लोग मानते हैं, दंगे की इस राजनीति ने डरावनी रातों के अलावा कुछ नहीं दिया.

हालांकि 2002 के बाद इस कस्बे में कभी दोबारा दंगा नहीं हुआ.

लेकिन इस भयानक त्रासदी की 12वीं बरसी पर यहां लोगों के चेहरे पर डर और सांप्रदायिक घृणा का भाव स्पष्ट देखा जा सकता है.

कितना बदला है गोधरा

पिछले 12 सालों में गोधरा में बहुत कुछ नहीं बदला है. सड़कें जरूर कुछ चौड़ी हो गई हैं और इमारतों की ऊंचाई बढ़ गई हैं लेकिन सही मायने में यह कस्बा विकास की बाट जोह रहा है.

हालांकि यहां के निवासी कबाड़, ऑटो और रेत व्यवसाय से समृद्ध जरूर हुए हैं.

गोधरा के एक प्रमुख व्यवसायी मुकेश पटेल का कहना है, ''गोधरा वैसा ही है, जैसा पहले था. हमारे आस पास के शहर और कस्बों में विकास की चमक दिखी है जबकि यहां वैसा विकास नहीं दिखा जैसा गुजरात के अन्य हिस्सों में हुआ है. मूलभूत सुविधाओं से लेकर औद्योगिक निवेश के मामले में गोधरा को गुजरात के विकास का हिस्सा मिलना अभी बाक़ी है.''

हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि गोधरा में पिछले 10 सालों में तेजी से समृद्धि आई है.

भाजपा को समर्थन करने वाली और नरेंद्र मोदी की धुर समर्थक निर्दलीय कॉरपोरेटर सोफिया अनवर जमाल कहती हैं, ''आज गोधरा में लड़कियां ख़ुद कॉलेज जाती हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. ज़्यादा से ज़्यादा स्कूल और कॉलेज बने हैं. लेकिन रोजगार के अवसर नहीं बढ़ पाए हैं.''

क्या कहते हैं लोग

गोधरा में मुख्यतया तीन तरह के लोग मिलते हैं. एक वो जो बातचीत में साबरमती एक्सप्रेस की घटना को हिंदुओं की हत्या करने के लिए पूर्वनियोजित हमले के तौर पर पेश करते हैं. दूसरे वे लोग हैं जो आपको यह विश्वास दिलाना चाहेंगे कि यह एक मात्र दुर्घटना थी. जबकि बाक़ी लोग इस घटना पर अपना कोई विचार नहीं रखते हैं.

कस्बा गहरे तौर पर सांप्रदायिक विचारधाराओं में बंटा हुआ है. इन दिनों पूरे कस्बे में 'नरेंद्र मोदी फॉर पीएम' अभियान वाले नरेंद्र मोदी के बड़े-बड़े पोस्टर बड़े पैमाने पर दिख जाएंगे.

हालांकि दोनों समुदाय में ऐसे लोग हैं जो खाई को पाटने की कोशिश करते हैं लेकिन फिर भी कस्बा हिंदू और मुस्लिम घेट्टो (बसाहट) में बंटा हुआ है.

किराने की दुकान चलान वाले इमराम जुजारा कहते हैं, ''ट्रेन में लगी आग के पीछे कोई साजिश नहीं थी. यह महज दुर्घटना थी लेकिन निर्दोष लोगों को पकड़ा गया.''

इस मामले में उनके चाचा गिरफ्तार किए गए थे और नौ साल बाद अदालत द्वारा रिहा कर दिए गए.

हालांकि यहां के हिंदू समुह से जुड़े बहुत सारे लोग मानते हैं कि मामले की ठीक तरह से जांच नहीं की गई क्योंकि ट्रेन दुर्घटना एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी.

'क्या यही गोधरा स्टेशन है'

दिन में ज़्यादातर समय गोधरा स्टेशन सूना पड़ा रहता है. शाम को यहां थोड़ी भीड़-भाड़ होती है. लेकिन यात्रियों के लिए यह एक ऐसी जगह होती है जो उनमें एक किस्म की उत्सुकता और बेचैनी पैदा करती है.

यहां पिछले 50 सालों से भोजन की दुकान लगाने वाले मनोज जैन कहते हैं, ''आज भी, ट्रेन जब गोधरा रेलवे स्टेशन पर पहुंचती है जो लोग बेचैन हो उठते हैं. वे खिड़कियों से बाहर की ओर देखते हैं और चारों ओर नज़रें दौड़ाते हैं मानों उन्हें किसी चीज की तलाश है.''

जैन कहते हैं, ''गोधरा में पूरी तरह शांति छाई हुई है. लेकिन अक्सर प्लेफॉर्म पर मेरी दुकान पर आने वाले यात्री पूछते हैं कि एक हिंदू कैसे काम कर रहा है या यह वही गोधरा है? मैं ऐस सवालों को नज़रअंदाज कर देता हूं. लेकिन मुझे इस बात पर क्रोध आता है और बुरा लगता है कि गोधरा हिंदू-मुस्लिम लोगों के बीच नफ़रत का प्रतीक बन गया है.''

जैसे ही लोग गोधरा स्टेशन से बाहर आते हैं सदभावना वाटिका नाम से दो पार्क लोगों का स्वागत करते हैं.

...और आज का दिन

उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन को याद करने के लिए शहर में कई कार्यक्रमों का आयोजन होता है.

दुर्घटना में मारे गए 59 लोगों की याद में जले हुए डिब्बों के पास विश्व हिंदू परिषद एक सभा आयोजित करता है. इसमें वीएचपी के कुछ सदस्य शामिल होते हैं. दिन में वीएचपी और अन्य स्थानीय लोग सुंदरकांड पाठ का आयोजन करते हैं. भारतीय जनता पार्टी के सासंद हरिन पाठक के भाई और जाने माने कलाकार आशमिन पाठक सुंदरकांड का पाठ करते हैं.

इसी दिन स्थानीय कांग्रेस नेता रफीक तिजोरी मुस्लिम जोड़ों के लिए सामूहिक विवाह का आयोजन करते हैं जिसमें हिंदुओं द्वारा उपहार दिया जाता है.

तिजोरी कहते हैं, ''इस साल हम 18 मुस्लिम जोड़ों का सामूहिक विवाह कराने जा रहे हैं जहां हर साल की तरह हिंदुओं द्वारा कन्यादान दिया जाता है. हम इस आयोजन को पिछले सात सालों से लगातार करते आ रहे हैं. इस आयोजन के पीछे विचार यह है कि 2002 के बाद हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच पैदा हुई खाई को पाटा जाए.''

गोधरा के सामाजिक ताने बाने को फिर से जोड़ने की कोशिश करने वाले यहां कम नहीं हैं लेकिन यह उतना आसान नहीं लगता.

हालांकि ज़िंदगी की जद्दोजहद में लोग अब उस घटना को एक दुःस्वप्न की तरह भूल जाना चाहते हैं.

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