कारोबारी घराने: आधुनिक बनने की चुनौती

  • 23 फरवरी 2014
चंदू हलवाई मिठाई की दुकान के संस्थापक

मुंबई की एक संकरी सी गली में चंदू हलवाई की मिठाई की दुकान है. यह छोटी सी दुकान भले ही आधुनिक नज़र आती है, लेकिन यहां बिकने वाले व्यंजनों की पहचान एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी है.

यह दुकान सबसे पहले कराची में साल 1896 में खोली गई थी और भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद 1947 में मुंबई पहुंची. दुकान के संस्थापकों की तस्वीरें दीवार पर टंगी हुई हैं.

अभी कारोबार की ज़िम्मेदारी 71 साल के भारत भूषण बहल संभाल रहे हैं. इस दुकान की नींव उनके दादा ने रखी थी और अभी उनके बेटे सचिन और नितिन कारोबार संभालने में उनकी मदद कर रहे हैं.

उनका परिवार मौलिक रूप से भारतीय संस्कृति और कारोबार से गहराई से जुड़ा है. भारत में करीब 85 फ़ीसदी कंपनियां घरेलू व्यवसाय की श्रेणी में आती हैं और इनमें टाटा, रिलायंस और वाडिया समूह जैसे बड़े घराने शामिल हैं.

बहल कहते हैं, "दूसरे कारोबारों में सामर्थ्य और लाभ महत्वपूर्ण होता है. लेकिन पारिवारिक व्यवसाय इनसे अलग है."

बहल बताते हैं, "इसमें यह महत्वपूर्ण होता है कि आप साथ-साथ हैं, आप मिलकर काम कर रहे हैं और मिलजुलकर रह रहे हैं. इसमें आप परिवार की छवि की परवाह करते हैं,

सचिन बहल
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद सचिन ने घरेलू कारोबार में लौटने का निर्णय किया.

आप अपने पूर्वजों के सिद्धांतों की कद्र करते हैं और सफलता और लाभ इसका पैमाना नहीं होते."

'वह आपका बेटा है!'

सचिन और नितिन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद स्वतंत्र कारोबार करने की बजाय घरेलू कारोबार में वापसी का निर्णय किया.

सचिन कहते हैं, "हम अपना विकल्प खुला रखना चाहते थे, इसलिए हमने अलग पढ़ाई करने का फ़ैसला किया. लेकिन कारोबार ऐसी चीज़ है जिसके बारे में हम घर में खाने पर बात करते रहे हैं, हमने इसे अपने बचपन से देखा है, इसलिए हमने आख़िर में इसे आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया."

अभी दोनों भाई निर्यात बढ़ाने और मिठाइयों में विविधता लाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. जब कोई बड़ा निर्णय लेना होता है तो वे पिता की मदद लेते हैं.

घरेलू कारोबार को चलाने में मुश्किलों की बात को भारत भूषण बहल स्वीकार करते हैं.

बहल कहते हैं, "कॉरपोरेट दुनिया में हायर और फायर की नीति चलती है. घरेलू कारोबार में इस तरह की सवाल ही पैदा नहीं होता. आप पारिवारिक व्यवसाय में जन्म लेते हैं, इसी में जीते हैं और इसी में मरते हैं."

चंदू हलवाई की दुकान

बहल के मुताबिक़, "ऐसा दौर भी आता है जब कारोबार की क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं, लेकिन कम प्रदर्शन के बावजूद आप अपने बेटे की जगह किसी अन्य प्रबंधक को नहीं रख सकते जो ज़्यादा बेहतर कर सकता है. वह आपका बेटा है! आप उसकी जगह किसी प्रबंधक को नहीं दे सकते."

पीढ़ियों की बात

भारत में अब कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां आ रही हैं ऐसे में घरेलू व्यवसायों को प्रतियोगिता का सामना करने के लिए अब ज़्यादा कॉरपोरेट संस्कृति को अपनाना पड़ रहा है.

बीते दो दशकों में भारत में कई कारोबारी परिवार अलग हो गए हैं.

जिस बिखराव की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई वो रिलायंस का था, भारत की सबसे बड़ी निजी कंपनी जिसका कारोबार रसायन, टेलीकॉम, तेल और खुदरा कारोबार का था.

वेणुगोपाल धूत
वीडियोकॉन के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत परिवार को मार्गदर्शन देते हैं.

कंपनी के संस्थापक धीरू भाई अंबानी का निधन साल 2002 में हुआ और इसके कुछ साल बाद उनके बेटों, मुकेश और अनिल ने कारोबार का बंटवारा कर लिया.

दुनिया भर में कई सर्वे में ये बात सामने आई है कि घरेलू कारोबारों में से सिर्फ़ एक तिहाई ही दूसरी पीढ़ी तक चल पाते हैं और बहुत कम होते हैं जो तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते हैं.

ये चलन भारत में भी देखा गया है लेकिन कुछ कारोबारी घराने साथ रहने में कामयाब रहे हैं.

आसान संवाद

वीडियोकॉन देश के सबसे मशहूर उपभोक्ता ब्रांड में से है. इसकी शुरुआत घरेलू और इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने से हुई थी लेकिन अब ये तेल की खोज और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार कर रही है.

इसे धूत परिवार के तीन भाई और उनके बेटे चलाते हैं.

22 साल के अक्षय धूत हाल ही में कारोबार से औपचारिक रूप से जुड़े हैं लेकिन वो समूह की कंपनियों के साथ 15 साल की उम्र से प्रशिक्षण लेते रहे हैं.

अक्षय कहते हैं, "हम साथ रहते हैं, साथ छुट्टियां मनाते हैं और क्योंकि साथ में काम भी करते हैं इसलिए हम कारोबार पर काफ़ी बातें भी करते हैं. इससे विचारों को बांटने में भी आसानी होती है."

उनके चचेरे भाई अनिरुद्ध धूत कहते हैं, "कभी-कभी बहस होती है और राय अलग-अलग होती है. लेकिन अगर आम सहमति नहीं बन पाए तो जैसा कि भारतीय परंपरा में होता है हम परिवार के मुखिया के पास जाते हैं."

हालांकि वीडियोकॉन को विदेशी कंपनियों से तगड़ी प्रतियोगिता झेलनी पड़ी है और अब वो पारंपरिक घरेलू कारोबार से हटकर ज़्यादा कॉरपोरेट ढांचे में ढल गई है.

वीडियोकॉन के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत कहते हैं, "हमें सीईओ, सीओओ और बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर को खुश रखना होता है. इसलिए कभी-कभी परिवार के सदस्यों से निपटने और कारोबार चलाने में रणनीतिक होना पड़ता है."

वो कहते हैं, "इन दिनों ज़्यादातर कंपनियां शेयर बाज़ार में जा रही हैं और नियम बेहद सख़्त हो गए हैं इसलिए परिवार को भी कंपनी की तरह बर्ताव करना होता है."

'सही मार्गदर्शन की ज़रूरत थी'

भारत के कई कारोबारी घरानों को व्यावसायिक मदद की ज़रूरत का एहसास हुआ है. इस मांग को पूरा करने के लिए देश में कई प्रबंधन संस्थान पारिवारिक कंपनियों के लिए तैयार किए गए एमबीए कार्यक्रमों की पेशकश कर रहे हैं.

वेलिंगकर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट
पारिवारिक कारोबार में कामयाबी के लिए युवा मैनेजमेंट संस्थानों का रुख कर रहे हैं.

मुंबई में वेलिंगकर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट उन लोगों के लिए डेढ़ साल का कोर्स करवाता है जिनकी अपनी कंपनी हो.

अमोघ देसाई अपने परिवार का फ़ोटोग्राफ़ी ट्रेनिंग कारोबार चलाते हैं और वेलिंगकर इंस्टीट्यूट में पढ़ रहे हैं. वो कहते हैं, "शुरुआत में मुझे महसूस हुआ कि लोगों को मुझ में भरोसा नहीं था. मैं ये महसूस कर सकता था. आत्मविश्वास हासिल करने के लिए मुझे सही मार्गदर्शन की ज़रूरत थी."

अमोघ बताते हैं, "जब मैंने यहां पढ़ाई शुरू की तो मुझे मैनेजमेंट, वित्त और मानव प्रबंधन के बारे में कई बातें पता चलीं."

एक और छात्र राजेश सोरप का पारिवारिक कारोबार वाटर हीटर बनाने का है. राजेश कहते हैं, "मैं अपनी कंपनी को वैश्विक बनाना चाहता हूं इसलिए मुझे लगा कि मुझे तैयार होने की ज़रूरत है."

राजेश अकेले नहीं हैं. कई भारतीय कंपनियों की नज़र दुनिया में कारोबार फैलाने पर है.

भारतीय समाज में पारिवारिक मूल्यों और पदानुक्रम की जड़ें गहरी हैं. कंपनियां इनसे कैसे निपटती हैं इससे तय हो सकता है कि वो तरक्की में काम आएंगे या अड़चनें पैदा करेंगे.

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