राजीव गांधी हत्याकांड: मुजरिमों की रिहाई की सिफ़ारिश पर उठे सवाल

  • 20 फरवरी 2014
पेरारिवलन
पेरारिवलन समेत तीन लोगों की मौत की सज़ा सुप्रीम कोर्ट ने उम्रक़ैद में तब्दील कर दी है.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के अभियुक्तों की रिहाई की सिफ़ारिश के तमिलनाडु सरकार के फ़ैसले पर कई सवाल उठने लगे हैं.

जयललिता मंत्रिमंडल ने बुधवार को एक आपात बैठक में फ़ैसला किया कि राजीव गांधी की हत्या के जुर्म में जेल में बंद सात क़ैदियों की रिहाई के लिए राज्य सरकार, केंद्र सरकार से सिफ़ारिश करेगी.

तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार को केवल तीन दिन का समय दिया है, जिसमें केंद्र सरकार यह फ़ैसला कर ले कि इस मामले में उसे क्या करना है.

राज्य सरकार के मुताबिक़ अगर केंद्र सरकार ने तीन दिन के अंदर कोई फ़ैसला नहीं किया तो राज्य सरकार ख़ुद ही उन्हें रिहा करने का फ़ैसला कर लेगी.

राज्य सरकार की इस सिफ़ारिश को लेकर एक तरफ़ जहां राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो गई है, वहीं ये भी बहस शुरू हो गई है कि आख़िर इस पूरे मामले में क़ानून क्या कहता है.

जाने माने वकील केटीएस तुलसी के अनुसार राज्य सरकार को इस मामले में क़ैदियों की रिहाई का अधिकार नहीं है.

तुलसी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''सीआरपीसी की धारा 435 के तहत जो मुक़दमे सीबीआई दर्ज करती है और उसका अभियोजन करती है, उन मामलों में केंद्र सरकार से विचार विमर्श के बाद ही राज्य सरकार क़ैदियों की रिहाई के फ़ैसले कर सकती है.''

क़ानूनी हैसियत

जयललिता
जयललिता सरकार ने सात लोगों को रिहा करने का फ़ैसला किया है.

तुलसी के अनुसार वे क़ानून जो संसद ने बनाए हैं उनके तहत केंद्र सरकार के आदेश के बग़ैर, राज्य सरकार कोई फ़ैसला नहीं कर सकती.

तुलसी ने कहा कि राजीव गांधी हत्याकांड में शामिल लोगों को टाडा के तहत सज़ा दी गई थी और टाडा केंद्र सरकार के ज़रिए बनाया गया क़ानून है.

उनका कहना है कि इस आधार पर तमिलनाडु सरकार का फ़ैसला सिर्फ़ एक सिफ़ारिश है, राज्य सरकार इसे लागू नहीं कर सकती है.

लेकिन जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की राय इससे अलग है.

जस्टिस सच्चर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि केंद्र और राज्य दोनों के पास अपने-अपने अधिकार हैं और दोनों में क्षेत्राधिकार का कोई मसला नहीं है.

उनका मानना है कि चूंकि यह मुक़दमा सबसे पहले तमिलनाडु राज्य में दर्ज हुआ था और इसका मुक़दमा वहीं चला था, इसलिए राज्य सरकार को उन क़ैदियों की रिहाई का अधिकार है.

रिहाई का अंतिम फ़ैसला

जस्टिस सच्चर ने कहा कि राज्य सरकार ने केवल शिष्टाचार के तहत केंद्र सरकार के पास अपनी सिफ़ारिश भेजी है और उनसे इस पर अपनी राय देने की अपील की है.

उनके अनुसार राज्य सरकार अगर उन क़ैदियों को छोड़ने का फ़ैसला करती है तो क़ानूनी तौर पर इसमें कोई ग़लत बात नहीं है.

नलिनी
नलिनी उम्रक़ैद की सज़ा काट रही हैं.

केंद्र सरकार अगर तमिलनाडु सरकार की सिफ़ारिश मानने से इनकार कर देती है तो राज्य सरकार के पास क्या विकल्प हैं, इस सवाल के जवाब में एडवोकेट तुलसी कहते हैं कि जब तक केंद्र सरकार का आदेश न हो, राज्य सरकार का फ़ैसले का कोई औचित्य नहीं है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि अगर तमिलनाडु सरकार उन क़ैदियों की रिहाई का अंतिम फ़ैसला कर ही लेती है तो फिर केंद्र सरकार क़ानूनी तौर पर क्या कर सकती है.

इस सवाल के जवाब में तुलसी ने कहा कि, ''केंद्र सरकार हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकती है और उनसे राज्य सरकार के फ़ैसले पर रोक लगाने की अपील कर सकती है.''

तुलसी के अनुसार हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद फिर दोनों पक्षों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प है.

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