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गया ज़माना पन्ने वाली किताबों का..

 गुरुवार, 20 फ़रवरी, 2014 को 08:28 IST तक के समाचार
दिल्ली पुस्तक मेला मेला, प्रगति मैदान

वो किताबों के पन्ने पलटना, पुराने कागज की ख़ुशबू को महसूस करना, धुंधली हो चुकी स्याही को आँखे गड़ा कर पढ़ना. ये एहसास वही जान सकता है जिसने किताबें पढ़ी हों वर्ना ये आजकल मोबाइल और ऐसे तमाम माध्यमों पर "ई - बुक" पढ़ने वाले इसे कहाँ महसूस कर पाएंगे...

ये कहना था लेखक और इतिहास विशेषज्ञ सुधीर चन्द्र का, जब नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में मेरी उनसे मुलाकात हुई. इस पुस्तक मेले का आयोजन नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा किया गया है.

यूँ तो छोटे बच्चों को ध्यान में रखते हुए मेले का थीम "कथा सागर" रखा गया है लेकिन ई बुक्स के प्रचार प्रसार पर भी इस बार काफ़ी ज़ोर है.

न सिर्फ़ नेशनल बुक ट्रस्ट बल्कि पुस्तक मेले में आए अधिकांश प्रकाशन समूहों का ये मानना है कि "क्लिक करें ई बुक्स" ही आने वाले समय की डिमांड हैं.

तो हमने भी सोचा कि जायज़ा लिया जाए कि आख़िर “ई, ई – बुक है का ?”

क्लिक करें (पढ़िएः एमएफ़ हुसैन पर ई-बुक का अनावरण)

इलेक्ट्रॉनिक किताबें

मीनू हांडा, अमेज़न डॉट कॉ़म, कॉर्पोरेट कम्यूनिकेशन

ई बुक्स यानि इलेक्ट्रॉनिक किताबें और यही हैं इनकी परिभाषा - यह कहना था विश्व के सबसे बड़े ई-बुक पब्लिशर क्लिक करें अमेज़न.कॉम में कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन संभाल रही मीनू हांडा का.

प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में यूँ तो तीन से ज़्यादा हॉल में किताबों कि प्रदर्शनी लगाई गई है और बच्चों के लिए बनाया गया थीम हॉल सात नंबर है.

लेकिन हॉल नंबर 12 मेले में आने वाले युवा दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र है क्योंकि यहाँ उन्हें मिल रहीं हैं उनकी मनपसंद ई बुक्स.

मीनू ने बताया कि उनकी स्टॉल पर न सिर्फ कॉलेज जाने वाले युवा आ रहे हैं बल्कि छोटे बच्चे जिन्हे ई बुक्स के बारे में जानने कि उत्सुकता है वे भी आ रहे हैं.

बच्चों के साथ ही उनके अभिभावक भी पहुँच रहे हैं. उनके हिसाब से ये किताबें – सुविधाजनक हैं, सस्ती हैं और ये जगह नहीं घेरती.

ई-बुक्स की सफलता

"मैं तो ई-बुक्स का धुर विरोधी हूँ. वो किताबों से क्या मुक़ाबला करेंगी..... कागज़ी किताबो और उनसे जुड़ी यादों का कोई सानी नहीं"

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और एंकर

ई-बुक्स कि सफलता को लेकर प्रकाशक इतने आशावान हैं कि अगले साल तक वो अपनी पूरे संग्रह को ई फॉर्मेट में लाने कि तैयारी में हैं.

राजपाल प्रकाशन के प्रणव के मुताबिक़ वह इस पर ध्यान दे रहे हैं कि उनके प्रकाशन से रिलीज़ होने वाली नयी क्लिक करें किताब का ई वर्ज़न भी साथ में आए.

एक साल के भीतर ही वह अपने सभी पुराने टाइटल भी ई प्लेटफॉर्म पर निकालेंगे.

ई-बुक्स का किताबों कि दुनिया में दख़ल का अंदाजा इस बात से और साफ़ हो जाता है कि अब नेशनल बुक ट्रस्ट, जो कि एक सरकारी संस्था है, ने भी अपनी पहली ई बुक लॉन्च कर दी है स्वामी विवेकानंद पर.

किताबों से प्यार

ई-बुक रीडर

लेकिन कोई यादों का क्या करें. पुस्तक मेले में अपनी ई बुक्स लेकर आये मॉडर्न पब्लिकेशंस भले ही ई बुक्स के तारीफों के पुलिंदे बांधे लेकिन पुस्तक प्रेमियों का प्यार अभी भी कागजी किताबों से जुड़ा हुआ है.

जानेमाने न्यूज़ एंकर रवीश कुमार ने बीबीसी से कहा "मैं तो ई-बुक्स का धुर विरोधी हूँ. वो किताबों से क्या मुक़ाबला करेंगी..... कागजी किताबों और उनसे जुड़ी यादों का कोई सानी नहीं”

मशहूर लेखक और पत्रकार अभय कुमार दुबे का कहना था, "जब ई-बुक्स नहीं रहेंगी तब उनके बारे में भी काग़ज़ी किताबों में लिखा होगा.... जनाब प्रेम पत्र किताबों में भेजें जाते हैं, ई बुक्स में नहीं.”

ऐसा ही कुछ मानना था नेशनल बुक ट्रस्ट के डायरेक्टर एम ए सिकंदर. उन्होंने कहा, “ई-बुक्स, किताबों को कॉम्पलिमेंट करती हैं उनसे कम्पीट नहीं करती. अभी किताबों कि जगह ई बुक्स लें... वो दिन दूर हैं ”

ई-बुक पढ़ते लोग

मेले में आए अधिकांश पुस्तक प्रेमियों कि राय भी यही थी.

ई-बुक्स भले ही सस्ती हैं, एक छोटे से डिवाइस में एक साथ हज़ारों किताबें रखी जा सकती हैं, इन्हे कहीं भी ले जाया जा सकता है लेकिन फिर भी इनसे वो एहसास पैदा नहीं किया जा सकता जो कागज के पन्ने पलटने से पैदा होता है.

ख़ैर इस पूरी जिरह से हम तो बस इतना ही समझ पाये हैं कि चिट्ठियां भले ही ईमेल और किताबें भले ही ई-बुक कि शक्ल में आ गयी हों लेकिन अभी भी आपके-हमारे दिलों में कागज पर बिखरी स्याही का रंग गहरा छपा हुआ है.

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