राजीव हत्याकांड के दोषियों की रिहाई की सिफ़ारिश

  • 19 फरवरी 2014
पेरारिवलन
पेरारिवलन की फांसी की सज़ा, उम्रक़ैद में तब्दील हो गई थी.

तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषियों की रिहाई की सिफ़ारिश की है. राजीव गांधी की हत्या के मामले में जेलों में बंद कुल सात लोगों की रिहाई की सिफ़ारिश की गई है.

इन सात लोगों में संथन, मुरुगन तथा पेरारिवलन भी शामिल हैं जिनकी फांसी की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उम्रक़ैद में बदलने का फ़ैसला किया था.

इन तीनों के अलावा रिहाई की सिफ़ारिश पाने वालों में नलिनी श्रीहरन, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन शामिल हैं.

नलिनी श्रीहरन, मुरुगन की पत्नी हैं.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने मंत्रिमंडल के साथ बुधवार की सुबह एक आपात बैठक की, जिसमें सातों अभियुक्तों की रिहाई की सिफ़ारिश करने का फ़ैसला किया गया.

कैबिनेट के फ़ैसले के बारे में एक बयान जारी कर कहा गया है, ''संथन, मुरूगन और पेरारिवलन पिछले 23 सालों से जेल में बंद हैं. इसी का ख़्याल रखते हुए सीआरपीसी की धारा 432 के अंतर्गत राज्य सरकार को दिए गए अधिकारों के तहत राज्य सरकार ने उन तीनों को रिहा करने का फ़ैसला किया है. ठीक उसी तरह हमने नलिनी, रॉबर्ट पायस, जयकुमार, रविचंद्रन को भी रिहा करने का फ़ैसला किया है.''

मामला केंद्र के पाले में

राजीव गांधी साल 1991 में तमिलनाडु में एक चुनावी सभा में हुए आत्मघाती हमले में मारे गए थे.

बयान में आगे कहा गया है कि चूंकि इन तमाम लोगों को टाडा की अदालत ने सज़ा सुनाई थी इसलिए सीआरपीसी की धारा 435 के तहत तमिलनाडु सरकार के फ़ैसले को केंद्र सरकार से विचार विमर्श करना होगा और इसलिए केंद्र सरकार की राय जानने के लिए राज्य सरकार ने अपनी सिफ़ारिशों को फ़ौरन केंद्र के पास भेजने का फ़ैसला किया है.

बयान के अनुसार अगर केंद्र सरकार ने तीन दिनों के अंदर कोई जवाब नहीं भेजा तो सीआरपीसी की धारा 432 के तहत राज्य सरकार के पास जो अधिकार हैं, उनका इस्तेमाल करते हुए उन सभी को रिहा कर दिया जाएगा.

नलिनी के मृत्युदंड को पहले ही कांग्रेस प्रमुख तथा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी के हस्तक्षेप के बाद उम्रक़ैद में तब्दील किया जा चुका था.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड को उम्रक़ैद में तब्दील करते समय दोषियों की दया याचिका पर निर्णय लेने में केंद्र सरकार की ओर से हुई 11 साल की देरी का ज़िक्र किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की इस दलील को ख़ारिज कर दिया कि दोषी संथन, मुरुगन और पेरारिवलन की दया याचिकाओं पर फ़ैसले में देरी से उन्हें कोई वेदना नहीं सहनी पड़ी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)