फ़ीस भरने के लिए बेचा मुफ़्त मिला लैपटॉप

  • 18 फरवरी 2014

19 वर्षीय रमेश (नाम बदला हुआ) उत्तर प्रदेश में हरदोई ज़िले के संडीला में रहते हैं.

रमेश के पिता एक ग़रीब किसान हैं जिन्होंने बड़ी मुश्किल से रमेश की 12वीं तक की पढ़ाई की फ़ीस चुकाई थी.

इनके परिवार में मां के अलावा तीन बहनें और एक छोटा भाई भी है जो गाँव के स्कूल में मुफ़्त पढ़ाई करता है.

रमेश ने जैसे ही 12वीं पास की, तो प्रदेश में आई समाजवादी पार्टी की सरकार ने ये घोषणा की थी कि ऐसे सभी छात्र-छात्राओं को मुफ़्त लैपटॉप बांटे जाएंगे.

सुनिए ये विशेष रिपोर्ट

पिता ने अपनी तंगी के बावजूद रमेश को लखनऊ में आगे की पढ़ाई करने के लिए जैसे तैसे भेजा.

शहर के एक प्रतिष्ठित मगर सस्ते कॉलेज में दाख़िला लिए कुछ ही महीने हुए थे कि रमेश को एक दिन स्कूल प्रांगण में हुए रंगारंग समारोह में मुफ़्त लैपटॉप भी मिल गया.

दिक़्क़त

बड़ी मुश्किलों से रमेश ने कैमरे के सामने आकर बीबीसी हिंदी से बात करने की हामी भरी.

निर्धारित जगह पर हमारी मुलाक़ात हुई और रमेश हिचकिचाए नज़र आए.

उन्होंने बताया, "मुझे अक्तूबर 2013 में मुफ़्त लैपटॉप मिला. कुछ ही दिन में मुझे उसमे तकनीकी दिक़्क़त नज़र आने लगी और वो लोकल सॉफ़्टवेयर के साथ मिला था."

हमने तुरंत ही रमेश को टोका, "लैपटॉप तो एचपी कंपनी का था और सॉफ़्टवेयर भी ब्रांडेड था?".

झिझकते हुए रमेश से जवाब मिला, "मेरे किसी काम का नहीं था, इसलिए हमने उसे बेच दिया".

उन्होंने आगे कहा, "आप मेरा नाम मत लीजिएगा, लेकिन हमें अपनी बीबीए की पढ़ाई के लिए फ़ीस की ज़रूरत थी. इसलिए हमने उसे 10,000 रुपए में बेच डाला क्योंकि फ़ीस रहेगी तभी पढ़ाई होगी और उसके बाद तो हमेशा कम्प्यूटर चलाने का मौक़ा मिलता रहेगा."

उन्होंने ये भी बताया कि डर के मारे वे उसे बेचने हरदोई शहर तक गए और लैपटॉप को एक कम्प्यूटर रिपेयर शॉप वाले ने नक़द रक़म देकर ख़रीदा है.

लेकिन अब रमेश को इस बात की ख़ुशी है कि उनकी पढ़ाई तो कम से कम जारी रहेगी.

अफ़सोस नहीं

हमने रमेश को याद दिलाया कि जब अखिलेश यादव की सरकार ने चुनावी वादे को पूरा करते हुए मुफ़्त लैपटॉप बांटने शुरू किए थे तब एक काग़ज़ पर इस बात के हस्ताक्षर भी लिए थे कि उनकी ख़रीद-फ़रोख़्त ग़ैर-क़ानूनी क़रार दी जाएगी.

अब तक रमेश खुल कर बात करने के मूड में आ चुके थे.

अखिलेश यादव सरकार 'डिजिटल डिवाइड' दूर करने की बात करती रही है.

उन्होंने कहा, "साहब, सरकार हमसे पूछे तो सही, जवाब भी देंगे. प्रदेश में ग़रीब बच्चों के पास फ़ीस देने के पैसे हैं नहीं, वे बिना इंटरनेट और बिजली के लैपटॉप का क्या करेंगे? इस बात का जवाब है किसी के पास?."

क़रीब पांच मिनट तक रमेश से हुई बातचीत मेरे ज़हन में बैठ सी गई है.

राजनीतिक दल चुनाव से पहले वादे भी करते हैं और कुछ जगहों पर पूरा भी कर देते हैं.

उत्तर प्रदेश में ही 2012 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भाजपा ने मुफ़्त गाय देने का वादा किया था.

लेकिन आम आदमी से मिले कर के पैसे से लैपटॉप जैसी महंगी चीज़ देने का वादा करने से पहले क्या सरकारों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने पर भी विचार नहीं करना चाहिए?

इसी श्रृंखला की अगली कहानी में मिलिएगा एक और व्यक्ति से और जानिएगा क्यों बेचा उन्होंने भी अपना लैपटॉप.

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