भारत में क़ानून बदलने की ज़रूरत: वेंडी डोनिगर

  • 13 फरवरी 2014
किताब
कई साहित्यकारों ने इस फ़ैसले की आलोचना की है

अमरीकी लेखिका वेंडी डोनिगर ने भारत में उनकी पुस्तक 'द हिंदूज़: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री' को नष्ट किए जाने के फ़ैसले पर अफ़सोस जताया है.

वेंडी डोनिगर की किताब को ये कहते हुए क़ानूनी रूप से चुनौती दी गई थी कि इससे हिंदुओं की भावनाओं को ठेस लगी है. इसके बाद किताब की प्रकाशक पेंगुइन इंडिया इस पुस्तक को वापस लेने और उसकी बाक़ी बची प्रतियों को नष्ट करने पर सहमत हो गई.

बीबीसी से बातचीत में डोनिगर ने कहा, "मैंने लगभग एक हफ़्ते पहले इस बारे में सुना और मुझे काफ़ी दुख हुआ. मुझे आशंका थी कि ऐसा हो सकता है. पिछले चार साल से ये क़ानूनी मामला चल रहा था. जिस तरह से भारत में और पूरी दुनिया भर में इसे लेकर प्रतिक्रिया हुई है मैं उससे आश्चर्यचकित हूँ. मुझे नहीं लगा था कि किसी को इस बात से कोई फ़र्क पड़ेगा."

डोनिगर का कहना था, "क़ानून काफ़ी क्रूर है और किसी हिंदू को आहत करने वाली किताब के प्रकाशक को ये अपराधी साबित करता है. इसलिए ये क़ानून बदलने की ज़रूरत है."

'शिक्षा बचाओ आंदोलन' संगठन ने इस बारे में याचिका दायर की थी. डोनिगर ने कहा कि उनकी किताब हिंदुओं के लिए कतई अपमानजनक नहीं है.

डोनिगर ने कहा, "वो सभी हिंदुओं के लिए अपमानजनक नहीं है. बहुत से हिंदुओं को किताब काफ़ी अच्छी लगी और उन्होंने इस बारे में मुझे लिखा भी है. किताब काफ़ी बिकी भी है. इसलिए ऐसा नहीं है कि किताब बस हिंदू विरोधी है. दरअसल तो ये काफ़ी हिंदू समर्थक किताब है. ये कुछ ख़ास तरह के हिंदुओं को बुरी लगेगी. दक्षिणपंथी हिंदुओं को, कट्टरपंथी हिंदुओं को और ऐसे लोगों को जो किताब को दबाना चाहते हैं."

इस विवादास्पद किताब को दो साल पहले रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया था और बीते चार बरसों से ये किताब बिक रही है और तभी से इसके खिलाफ़ अभियान भी चल रहा है.

'आपत्तिजनक'

इस किताब के ख़िलाफ़ दस हज़ार से ज़्यादा लोग एक ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर कर चुके थे. इसमें दावा किया गया है कि किताब में बहुत सी 'तथ्यात्मक ग़लतियां' हैं.

शिक्षा बचाओ आंदोलन ने 2011 में पेंगुइन इंडिया के ख़िलाफ़ ये कहते हुए मामला दर्ज कराया था कि ये किताब हिंदुओं का 'अपमान' करती है क्योंकि इसमें हिंदुओं की 'स्थापित धार्मिक मान्याताओं के विपरीत बातें' कही गई हैं.

इस संगठन के अध्यक्ष दीना नाथ बत्रा ने बताया कि ये किताब ‘सेक्स और कामुकता’ पर आधारित है.

वह कहते हैं, "किताब के मुख्य पृष्ठ पर छपी तस्वीर तो आपत्तिजनक है ही, साथ ही किताब में देवी देवताओं और महापुरुषों के बारे में भी ओछी टिप्पणियां की गई हैं. पूरे समाज की भावनाओं को इससे ठेस पहुंची है. हमने काफ़ी लंबी लड़ाई लड़ी है.”

किताब वापस लिए जाने से साहित्यकार और लेखक ख़ासे नाराज़ हैं. जाने माने साहित्यकार अशोक वाजपेयी का कहना है कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है.

वाजपेयी कहते हैं, "दीनानाथ बत्रा पूरे समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं. लोग अपनी मर्ज़ी से पढ़ें, जिसे नहीं पढ़ना है वो न पढ़े. मगर प्रतिबंध या रोक अच्छी बात नहीं है.”

भारत में सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर ख़ासी आलोचना हो रही है. कई लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि धार्मिक संगठन देश में अभिव्यक्ति और कलात्मक स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगा रहे हैं.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इस ख़बर को ‘बेहद निराशाजनक’ कहा है.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “अगर किसी को कोई किताब पसंद नहीं आती है तो उसका जवाब है एक और किताब. न कि उस पर प्रतिबंध, या क़ानूनी कार्रवाई या मार पिटाई की धमकी.”

वहीं साहित्यकार उमा वासुदेव मानती हैं वह किताबों पर किसी भी तरह के प्रतिबंध के पक्ष में तो नहीं हैं लेकिन लेखकों को भी चाहिए कि वे धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं.

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