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सियासत पर दंगों के दाग़

 सोमवार, 10 फ़रवरी, 2014 को 06:41 IST तक के समाचार
नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी

भारत में कुछ दिनों से बहस चल रही है कि क्या 1984 में दो दिन के भीतर हुए लगभग चार हज़ार सिखों के नरसंहार के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को माफ़ी मांगनी चाहिए या नहीं.

ये बहस उस वक़्त से शुरू हुई जब हाल में राहुल गांधी से एक टीवी इंटरव्यू के दौरान 1984 के दंगों के बारे में उस वक़्त की कांग्रेस सरकार की ज़िम्मेदारी के बारे में सवाल पूछा गया.

राहुल ने जवाब दिया कि ये उस वक़्त की बात है जब वो बहुत छोटे थे.

इससे पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके विरोधी ये मांग करते रहे हैं कि वो गुजरात में 2002 में हुए दंगों में एक हज़ार से ज़्यादा मुसलमानों के मारे जाने के लिए माफ़ी मांगें.

भारत में आज़ादी के बाद हज़ारों दंगे हुए हैं, जिनमें हज़ारों लोग मारे गए हैं.

चूंकि आरोप ये लगते हैं कि सांप्रदायिक दंगे या तो प्रशासन की लापरवाही की वजह से होते हैं या फिर राजनेताओं के इशारों पर, इसलिए दंगा करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर भी सवाल उठते हैं.

नुक़सान

दंगों में बड़ा नुक़सान हमेशा अल्पसंख्यकों का होता है.

गुजरात के दंगे भारत के इतिहास में पहले ऐसे दंगे थे जिनकी जीती जागती ख़ौफ़नाक तस्वीरें लोगों ने टीवी के माध्यम से पहली बार प्रत्यक्ष रूप से देखी थीं.

लेकिन 1984 के सिख विरोधी दंगे इससे कहीं बड़े पैमाने पर हुए थे लेकिन चार हज़ार इंसानों की मौत और दस हज़ार लोगों को घायल करने के इस जुर्म में शायद दस लोगों को भी सज़ा न हुई हो.

सिखों का कहना है कि 1984 के दंगों के मामले में उन्हें अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार है

गुजरात में भी यही स्थिति थी. मानवाधिकार संगठनों की मदद से दंगा पीड़ितों ने रिपोर्ट दर्ज कराई. लेकिन एक के बाद एक सारे केस ढह गए.

आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से दंगों के मामलों को दोबारा जांच हुई और इससे जुड़े मुकदमों में अब तक सैंकड़ों कसूरवारों को सज़ा मिल चुकी हैं. इनमें मोदी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी भी शामिल हैं.

बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद 1992-93 में देश के कई शहरों में दंगे हुए. सबसे बड़ा दंगा मुंबई में हुआ. अकेले मुंबई में एक हज़ार से ज़्यादा मुसलमान मारे गए थे.

श्रीकृष्णा आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में अहम अभियुक्तों की एक सूची तैयार की थी, लेकिन एक हज़ार से ज़्यादा इंसानों के क़त्ल के एक भी व्यक्ति को सज़ा नहीं दी जा सकी.

न एजेंडा, न दिलचस्पी

ख़ुद को सेक्युलर कहने वाले लालू यादव बिहार के भागलपुर में 1989 के दंगों के बाद सत्ता में आए थे, लेकिन उन्होंने पंद्रह साल की अपनी सत्ता में दंगा पीड़ितों के लिए कुछ नहीं किया.

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद इस मामले में मुकदमा चला और कइयों को सज़ा हुई, साथ ही दंगा पीड़ितों को मुजावज़ा मिला.

मेरठ के मालियाना और हाशिमपुरा मोहल्ले के तक़रीबन पचास लोगों का क़त्ल का आरोप पीएसी के जवानों पर लगा, लेकिन कार्रवाई पर अब भी सवाल क़ायम हैं.

मुज़फ़्फ़रनगर

हाल में उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे हुए

मुलायम की सरकार ने अभियुक्त जवानों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली.

गुजरात और 1984 के दंगों के लिए माफ़ी मांगने के लिए जारी राजनीति के बीच कोई ये मांग नहीं कर रहा है कि मुज़फ़्फ़रनगर में दंगा करने वालों को गिरफ़्तार किया जाए और उन्हें सख़्त सज़ा दी जानी चाहिए.

ये न किसी का एजेंडा है और न ही किसी को इसमें दिलचस्पी है.

कांग्रेस को अब याद आया

यही नहीं, राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यक्रमों में दंगों के अभियुक्तों का नागरिक अभिनंदन करती हैं. ऐसे लोग दो चार दिन की हिरासत के बाद रिहा हो जाते हैं.

केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस ने दस साल पहले अपने घोषणापत्र में सांप्रदायिक दंगों की रोकथाम और पीड़ितों की प्रभावी मदद के लिए एक क़ानून बनाने का वादा किया था.

अब दस साल के बाद जब उसके नेतृत्व वाली सरकार का दूसरा कार्यकाल ख़त्म होने को है तो कांग्रेस ने पिछले दिनों एक बिल संसद में पेश किया.

इस बिल में बहुत सारी कमियां थीं जिन्हें बहस के ज़रिए आसानी से दूर किया जा सकता था लेकिन सभी पार्टियों ने कोई न कोई बहाना बना कर एकजुट होकर इसे ख़ारिज कर दिया.

सांप्रदायिक दंगे भारत के रंग बिरंगे लोकतंत्र पर कलंक हैं. पिछले 25-30 बरसों से हज़ारों क़ातिल बेख़ौफ़ घूम रहे हैं.

उन्हें फिर किसी मुज़फ़्फ़रनगर की तलाश है.

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