BBC navigation

मिलिए देश की महिला नीलामीकर्ता से...

 शुक्रवार, 7 फ़रवरी, 2014 को 08:38 IST तक के समाचार
सरफ़राज़ बेगम शम्सी

"इस चीनी डिनर सेट की क़ीमत शुरू होती है सौ रुपए से... दो सौ... ढाई सौ... तीन सौ.... तीन सौ एक, तीन सौ दो, तीन सौ तीन... यह डिनर सेट ख़रीदा एसआर मल्लिक ने."

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में पार्क स्ट्रीट के पास रविवार की दोपहर को एक लंबे-चौड़े हॉल में मंचनुमा जगह पर एक ऊंची कुर्सी और मेज़ पर बैठी सरफ़राज़ बेगम शम्सी की जुबान और हाथ लयबद्ध तरीक़े से काम करते हैं.

यह हॉल दरअसल एक नीलामी घर है और उस ऊंची कुर्सी पर बैठी सरफ़राज़ देश की महिला नीलामीकर्ता हैं.

उनका कहना है कि वह देश की पहली और अकेली महिला नीलामीकर्ता हैं. इस पेशे पर अब तक विशुद्ध रूप से पुरुषों का ही क़ब्ज़ा रहा है.

क्लिक करें (उम्र 84 साल, लॉटरी छह करोड़ डॉलर की)

लेकिन अस्पताल प्रशासक और शिक्षक के बाद जीवन के इस तीसरे करियर में उन्होंने अपनी क़ाबिलियत से इस पुरुष-प्रधान पेशे में अपने लिए ख़ास जगह बना ली है.

भाई की ज़िद

सरफ़राज़, रसेल एक्सचेंज, नामक नीलामीघर में पुरानी चीज़ों की नीलामी का संचालन करती हैं.

यहां नीलाम होनी वाली चीज़ों की सूची काफ़ी लंबी है. लेकिन चीज़ चाहे सौ रुपए की हो या दस हज़ार की, सरफ़राज़ की भाव-भंगिमा जस की तस रहती है.

एक ही नीलामी में डेढ़ सौ से ज़्यादा चीज़ों को नीलाम कर चुकी सरफ़राज़ नीचे उतरने पर कहती हैं, "पहले यह काम मुश्किल लगता था. लेकिन अब तो कुर्सी पर बैठते ही सब कुछ यंत्रवत तरीक़े से होता रहता है."

क्लिक करें (पाकिस्तान सेना की पहली महिला पैराट्रूपर्स)

एक महिला नीलामीकर्ता होना कैसा लगता है?

वह कहती हैं, "मुझे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि पारंपरिक तौर पर यह पुरुषों का पेशा है."

सरफ़राज़ बेगम शम्सी

उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी वे नीलामी का संचालन करेंगी. वैसे अपने पिता अब्दुल मजीद, जो नीलामीकर्ता थे, के साथ वह कभी-कभार नीलामघर में आया करती थी और नीलामी की प्रक्रिया देखती थीं.

लेकिन यह नहीं सोचा था कि कभी उनको भी नीलामी का संचालन करना होगा और वह ऐसा कर सकेंगी.

सरफ़राज़ ने नौ साल पहले इस नीलामी घर में काम शुरू किया था और कोई छह साल से नीलामी का संचालन कर रही हैं. वह बताती हैं, "पहली बार जब नीलामी कराने बैठी तो थोड़ी घबराहट थी. पहली नीलामी की पुराने कपड़ों की."

क्लिक करें (जयपुर में उम्मीदों की सड़कों पर ज़िंदगी की कारें)

पहले चार-पांच लॉट के बाद उनमें आत्मविश्वास पैदा हो गया. कमाल यह कि पहले ही दिन उन्होंने 80 लॉट नीलाम किए. सरफ़राज़ कहती हैं, "पहले दिन की नीलामी पूरी होने के बाद मन में बेहद आत्मविश्वास भर गया था. लग रहा था कि मैं भी किसी क़ाबिल हूं."

वे अपने भाई अरशद सलीम के ज़ोर देने की वजह से इस पेशे में आईं. सरफ़राज़ कहती रहीं कि वह यह काम नहीं कर सकती. लेकिन सलीम अड़ गए कि तुम कर सकती हो.

बदल गए ख़रीदार

सरफ़राज़ बेगम शम्सी

वैसे, सरफ़राज़ का यह तीसरा करियर है. अपने सर्जन पति के जीवित रहते वह उनके साथ अस्पताल में प्रशासक थीं.

पति के निधन के बाद ससुराल वालों के कहने पर उन्होंने शिक्षक का काम किया. सरफ़राज़ बताती हैं, "शिक्षक के तौर पर मेरे अनुभव ने एक कामयाब नीलामीकर्ता बनने में काफ़ी सहायता की."

इसका ख़ुलासा करते हुए वह कहती हैं कि शिक्षक के तौर पर उनको छात्रों और उनके अभिभावकों से घुलना-मिलना होता था. उनकी समस्याओं और शिकायतों से जूझना पड़ता था. उस वजह से नीलामी में जुटने वाली भीड़ का सामना करने का साहस पैदा हुआ.

एक नीलामीकर्ता के लिए कौन से गुण सबसे अहम हैं? इस सवाल पर सरफ़राज़ बताती हैं, "बुद्धि, सतर्कता और चीज़ों की क़ीमत आंकने की काबिलियत."

वह कहती हैं कि एक नीलामीकर्ता में नीलाम होने वाली वस्तु की क़ीमत आंकने की योग्यता होनी चाहिए. उसी आधार पर उस वस्तु का आधार मूल्य तय कर नीलामी शुरू होती है.

क्लिक करें (जिनके इशारों पर मुल्क चलते हैं)

बुद्धि इसलिए ज़रूरी है कि नीलामी की प्रक्रिया के दौरान हर चीज़ पर निगाह रहे. इसके अलावा सतर्कता इसलिए ज़रूरी है कि किसी की बोली न छूट जाए. ज़्यादातर लोग ज़ोर से बोली नहीं लगाते. कुछ लोग हाथ उठा कर या इशारे में ही बोली ऊपर चढ़ाते हैं. उन सबको ध्यान में रखना ज़रूरी है.

सरफ़राज़ बेगम शम्सी

एक सवाल के जवाब में सरफ़राज़ बताती हैं, "पिछले छह-सात दशकों के दौरान नीलामी का माहौल काफ़ी बदला है. पहले ब्रिटिश लोगों के अलावा समाज के एलीट तबके के लोग और महिलाएं भी नीलामी में शामिल होती थीं."

उन्होंने कहा, "लेकिन अब यह तस्वीर बदल गई है. एलीट क्लास के लोगों के घरों से तमाम चीजों नीलामी के लिए अब भी आती हैं, लेकिन उस तबके के लोग इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होते. अब यहां मध्य और निम्न मध्यवर्ग के लोग ही आते हैं."

इस बातचीत के बाद सरफ़राज़ एक बार फिर अपनी कुर्सी पर बैठ जाती हैं.

एक पुरानी साइकिल नीलामी के लिए आती है... "एक हज़ार....चार हज़ार...पांच हज़ार....छह हज़ार...सात हज़ार....और नौ हज़ार...."

सरफ़राज़ के हाथों में रखा लकड़ी का छोटा-सा हथौड़ा सामने रखी मेज़ पर ठक से बजता है और उनकी आवाज़ आती है... "साइकिल नौ हज़ार में बिक गई... अब अगला आइटम."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें यहां क्लिक करें. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

टॉपिक

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.