'हाँ समलैंगिक हूँ, कोई दिक़्क़त....'

  • 4 फरवरी 2014

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 पर पुनर्विचार याचिका भले ही ख़ारिज कर दी हो लेकिन समलैंगिकों के लिये क़ानूनी दीवारें शायद ही मायने रखती हैं.

मुंबई में शनिवार को हुई प्राइड परेड में ये बात साफ उभर के सामने आई. ये कहानियां है ऐसे चार समलैंगिकों की जिन्होंने विरोध सहा लेकिन अपने रिश्ते के सच को स्वीकार करने में हिचकिचाए नहीं.

बातचीत में इन्होंने हमें बताया कि कैसे उन्हें प्यार हुआ, कैसे खुला उनके रिश्ते का राज़, कहीं घर वालों ने साथी के साथ अपनाया तो किसी के घर वाले आज तक बात करने के लिए तैयार नहीं हैं.

इन सारी कहानियों के पीछे ना कोई अपराध-बोध जैसी भावना है ना ही कोई डर. मानो ये सब जैसे एक ही बात कहना चाहते हों, 'प्यार में सौदा नहीं'.

'ई-मेल से माँ को पता चला'

"मैं लेस्बियन हूं और आज यहां मैं अपनी नौ साल से साथी को लेकर परेड का हिस्सा बनने आई हूं. मैं बैंगलुरु से हूं और मेरी साथी गोआ से, हम दोनों अब यहीं साथ रहते हैं. हम कॉलेज में मिले और प्यार हो गया. मैं ख़ुद को जेकब्स कहूंगी और मेरी साथी को चेशायर, क्योंकि हम हमारी सही पहचान अभी सामने नहीं आने देना चाहते. हमारे परिवारों को हमारे बारे में पता है, लेकिन सारे रिश्तेदारों को बताना ज़रूरी नहीं है."

घर पर उनके समलैंगिक संबंधों के बारे में कैसे पता चला इसके बारे में जेकब्स ने कहा, "हमारा अफ़ेयर शुरु हो चुका था और हमने एक दूसरे को प्यार का इज़हार करते हुए ई मेल भेजे थे."

जेकब्स ने बताया, "मेरी माँ को मेरे आईडी का पासवर्ड पता था और एक दिन जब मैं कॉलेज से आई तो माँ ई-मेल पढ़ रही थी. काफी हंगामा हुआ, जब चेशायर के घर पर ये बात पता चली तब उसके माता-पिता मेरे घर आ गए."

वह कहती हैं, "वे चाहते थे कि हम कसम खाएं और दोस्ती ख़त्म कर दें, पर हम हमारी बात से मुकरना नहीं चाहते थे. अब मेरे घर में तो हालात ठीक हैं लेकिन चेशायर के घर वाले आज भी यही कहते हैं कि मैंने उनकी बेटी को बिगाड़ा है. "

'समलैंगिक बेटे ने कुंठित विचारों से कराया आज़ाद'

पद्मा विश्वनाथन अपने बेटे हरीश के साथ आई. हरीश समलैंगिक हैं लेकिन मां उनका साथ दे रही हैं.

हरीश विश्वनाथन की माँ पद्मा विश्वनाथन परेड में अपने बेटे को और उस तरह के हर परिवार को अपना समर्थन देने आई थीं.

उन्होंने बताया, ‘‘बेटे हरीश की आदतें बचपन से ही लड़कियों जैसी थीं. तब तो मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन जब बड़े होकर हरीश ने बताया की वह लड़कों के प्रति आकर्षित होता है तब माँ का दिल घबरा उठा."

पद्मा ने बताया, ‘‘बचपन में हरीश के साथ शारीरिक शोषण हुआ था. मुझे लगा इसी वजह से यह अलग है. मैंने खुद को संभाला और उसे मनोचिकित्सक के पास भेजा."

वह कहती हैं, "मैं भी डॉक्टर से मिली, बाद में मैंने समझा की मेरा बेटा अलग है. यह हक़ीक़त गले उतारने में वक्त तो लगा लेकिन आख़िरकार मैं माँ हूँ. घर के लोगों का विरोध हम माँ बेटे ने साथ में सहन किया. आख़िरकार हमारे विश्वास और हिम्मत की जीत हुई. मैं हरीश के साथ गे बॉम्बे के एक टॉक में भी गई जहाँ मैं ऐसी और माँओं से मिली जिनके बच्चे समलैंगिक थे और मेरी ज़िंदगी और आसान हो गई. मैं कहूंगी कि मेरे बेटे ने मुझे कुंठित विचारों से आज़ाद करवाया.''

'सोचती हूँ मैरिज ऑफ़ कन्वीनियंस कर लूं'

प्राइड परेड में मुंबई की शीतल भी अन्य समलैंगिकों के साथ शिरक़त के लिए आई हुई थीं. 17 साल की उम्र में शीतल को अपने समलैंगिक होने का अहसास हुआ. आज वह 32 साल की हो चुकी हैं. शीतल का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला अपने ही देश से बाहर कर दिए जाने जैसी भावना पैदा करता है.

शीतल के माता पिता डॉक्टर हैं और खुली मानसिकता रखते हैं लेकिन उन्हें अपनी बेटी की फ़िक्र है. शीतल ने बताया, "माता-पिता की चिंता दूर करने के लिए सोचती हूँ कि मैं मैरिज ऑफ़ कन्वीनियंस कर लूँ, किसी समलैंगिक लड़के से, जिसके घर से शादी के लिए दबाव हो."

माता-पिता की उम्र ज़्यादा है. इसी वजह से शीतल ने अपनी समलैंगिकता के बारे में उन्हें खुलकर नहीं बताया. शीतल चाहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट अपना नज़रिया बदले ताकि वह और अन्य समलैंगिक गर्व से सर उठा कर जी सकें.

'हाँ समलैंगिक हूँ, कोई दिक्क़त'

अहमदाबाद से प्राइड परेड का हिस्सा बनने आए नवनीत और मोक्ष एक समलैंगिक जोड़ी हैं. मोक्ष शर्मा के मुताबिक़ आज़ादी बहुत ज़रूरी है. कोर्ट का ये नज़रिया जायज़ नहीं है. हालांकि इस फ़ैसले से उनकी हिम्मत कम नहीं हुई.

मोक्ष ने बताया, "हमने कई बार विरोध का सामना किया है. ऑफिस में कोई कुछ बोलता है तो मैं कह देता हूँ कि हाँ मैं समलैंगिक हूँ, कोई दिक्कत है? फिर कोई ज़्यादा बोलता नहीं. मेरे फ़ोन के एसएमएस से घर पर मेरी समलैंगिकता के बारे में पता चला, काफ़ी बवाल हो गया घर पर लेकिन वे कर भी क्या सकते हैं."

नवनीत ने अभी अपने बारे में घर पर बात नहीं की लेकिन उनका मानना है कि कभी ना कभी तो पता चलने ही वाला है, जब होगा तब देखा जाएगा.

ये कहानियां संकेत देती हैं कि भेदभाव और विरोध के बीच अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले समलैंगिकों को क़ानून की उस तरह परवाह शायद नहीं है.

वह अपनी राह चुन चुके हैं और उसी पर चलने का निश्चय भी कर चुके हैं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या समाज में खुले तौर पर इन रिश्तों को स्वीकृति हासिल होगी?

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