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'सरकार उद्योगपतियों के लिए काम कर रही है'

 मंगलवार, 4 फ़रवरी, 2014 को 11:46 IST तक के समाचार
पर्यावरण मंत्रालय के पोस्को स्टील परियोजना को मंज़ूरी के खिलाफ़ प्रदर्शन

पर्यावरण के लिए काम करने वाले कुछ संगठनों ने पर्यावरण मंत्रालय पर आरोप लगाया है कि वो कई परियोजनाओं को बेहद हड़बड़ी में मंज़ूरी दे रहा है.

प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोइली को इस बारे में एक पत्र में 200 से भी ज़्यादा संगठनों ने मांग की है कि इसे रोका जाए क्योंकि इस तरह के फ़ैसले पर्यावरण के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी नुक़सान पहुंचाएंगे.

पर्यावरण, मानवाधिकार, समुदायों और वन्यजीवन की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े संगठनों और कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर वाला ये पत्र सोमवार को नई दिल्ली में एक पत्रकार सम्मेलन में जारी किया गया.

पत्र लिखने वालों में ग्रीनपीस इंडिया, आरटीआई कार्यकर्ता शेखर सिंह, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और ग़ैर-सरकारी संस्था कल्पवृक्ष के आशीष कोठारी शामिल हैं.

जारी पत्र में कहा गया है, “मंत्रालय ने जिस तेज़ी से परियोजनाओं को मंज़ूरी दी है और जिस तरह से पर्यावरण नियामक में छूट दी गई है, उससे यह बात साफ़ होती है कि सरकार पर्यावरण सुरक्षा और लोगों की जीविका की अनदेखी कर रही है और उद्योगपतियों के हितों के लिए काम कर रही है.”

मंज़ूरी

"वन क़ानून के तहत जंगलों को किसी भी विकास परियोजना के लिए देने का फ़ैसला ग्राम सभाएं ही ले सकती हैं. (पर्यावरण) मंत्री ये सारी प्रक्रियाएं नज़रअंदाज़ कर रहे हैं."

प्रिया पिल्लै, पर्यावरण कार्यकर्ता

कार्यकर्ताओं का कहना है कि वीरप्पा मोइली को पर्यावरण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार मिले अभी महज डेढ़ महीने ही हुए हैं लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने डेढ़ लाख करोड़ रुपए लागत वाली 70 परियोजनाओं को मंज़ूरी दे दी है.

जिन बड़ी परियोजनाओं की मंज़ूरी पर आपत्ति जताई गई है उनमें ओडिशा में क्लिक करें पोस्को स्टील प्लांट, मध्य प्रदेश की कोयला खदानें, तिरुवनंतपुरम के विज़नीजाम इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल शामिल हैं.

इन लोगों का कहना है कि ये परियोजनाएं इसलिए रोक दी गई थीं क्योंकि वहां क्लिक करें वन क़ानून की अवहेलना की गई थी और स्थानीय लोगों के अधिकारों का हनन किया गया था.

मध्य प्रदेश के सिंगरौली ज़िले में पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था ‘महान संघर्ष समिति’ से जुड़ी प्रिया पिल्लै कहती हैं, “वन अधिकार अधिनियम क़ानून 2006 पूरे देश में लागू है जिसके तहत जंगल और जंगल के इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों के उन जंगलों पर सामुदायिक अधिकार हैं. क़ानून के तहत इन जंगलों को किसी भी विकास परियोजना के लिए देने का फ़ैसला ग्राम सभाएं ही ले सकती हैं. (पर्यावरण) मंत्री ये सारी प्रक्रियाएं नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.”

अतिरिक्त प्रभार

केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली

वहीं क्लिक करें ग्रीनपीस संगठन का आरोप है कि वीरप्पा मोइली को पर्यावरण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया ही इसलिए गया है ताकि बाक़ी बची हुई परियोजनाओं को जल्द मंज़ूरी मिल जाए.

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्था कल्पवृक्ष के आशीष कोठारी कहते हैं, “मोइली जिस तेज़ी से परियोजनाओं को मंज़ूरी दे रहे हैं, वो कोई नई बात नहीं है. पहले भी अगर आप देखें, तो नामंज़ूरी दर बहुत कम है."

उन्होंने कहा, "पर्यावरण मंत्रालय को रबर स्टैंप की तरह नहीं माना जाए बल्कि देश का पर्यावरण और उससे जुड़े करोड़ों लोगों की आजीविका को बचाने का काम मंत्रालय को करना चाहिए. मंत्रालय को उस तरह के अधिकार मिलने चाहिए और उस तरह के मंत्री भी बनाए जाएं.”

इन संगठनों ने मांग की है कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे और क्लिक करें वीरप्पा मोइली के तहत पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मंज़ूर की गई सभी परियोजनाओं पर रोक लगाए. साथ ही पर्यावरण मंत्रालय कोई भी फ़ैसला लेने से पहले हर परियोजना की पूरी पारदर्शिता के साथ जांच करे.

इस बारे में पर्यावरण मंत्रालय से संपर्क करने और उनका पक्ष जानने की कोशिशें नाकाम रहीं और फ़िलहाल मंत्रालय से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है.

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