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'पति जेल में, तो अच्छा हुआ बच्चा गिर गया'

 शनिवार, 1 फ़रवरी, 2014 को 06:55 IST तक के समाचार

सुषमा का गर्भ तब तीन महीने का था, जब मारूति के क्लिक करें मानेसर प्लांट में हिंसा और उसमें एक मैनेजर की मौत के आरोप में कंपनी के 148 कर्मचारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया.

तीन साल तक डॉक्टरों के चक्कर काटने और इलाज करवाने के बाद सुषमा आख़िरकार गर्भवती हुईं थी, कि पति गिरफ़्तार हो गए.

फिर गर्भ में ही बच्चे की धड़कन बंद होने से गर्भपात करवाना पड़ा. तीन साल तक बच्चा न होने पर ख़ूब ताने देनेवाले ससुरालवालों ने भी किनारा कर लिया.

क्लिक करें डेढ़ साल बाद भी जेल में हैं 148 मारूति कर्मचारी

अब डेढ़ साल बीत चुका है. सुषमा के पति सोहन अब भी जेल में हैं और बेऔलाद सुषमा बिल्कुल अकेलीं, पर अब ख़ुद को बदनसीब नहीं, ख़ुशनसीब समझती हैं.

आंसूओं को पलकों में समेटते हुए मुझे बोलीं, “जब गर्भपात हुआ तब मैं अंदर से बिल्कुल टूट गई थी, पर अब लगता है कि अच्छा हुआ कि बच्चा नहीं हुआ, फिर तो मैं सड़क पर आ जाती, नौकरी ही नहीं कर पाती तो ख़र्चा कैसे चलता, अकेले बच्चे को कैसे पालती?”

सुषमा जैसी कई औरतें हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग गांवों से क्लिक करें मारूति के मानेसर प्लांट में काम कर रहे कर्मचारियों से ब्याहीं और गुड़गांव में रहने लगीं थी.

साल 2012 में जब मारूति के 148 कर्मचारी जेल गए तो उस बड़े शहर में किराए के कमरों में पीछे रह गईं यही पत्नियां और बच्चे.

मानेसर प्लांट में हिंसा से पहले कर्मचारी कई बार हड़ताल पर गए थे.

अकेली औरत

बड़े शहर की खुली सोच और आधुनिक गति ने सुषमा और सोहन के जीवन को नई दिशा दी थी. इसलिए सोहन के जेल जाने के बाद भी सुषमा अपने रूढ़ीवादी ससुराल के पास गांव नहीं गई.

अब छोटे से दफ़्तर की कम तनख़्वाह की नौकरी और किराए का छोटा सा कमरा है, जहां रोज़ दफ़्तर से लौटकर सिलाई-बुनाई का काम करती हैं.

और बहुत सारा अकेलापन है, कहती हैं, “जब वो नौकरी करते थे, तब भी आने-जाने का ठिकाना नहीं था, बहुत लंबी ड्यूटी होती थी, पर साथ तो था, अब तो व़क्त काट रही हूं, ज़िन्दगी जीना है तो जी रही हूं, किसी पर जल्दी विश्वास भी नहीं कर पाती अब.”

25 साल की सुषमा की मुस्कान, पहनावा, हावभाव इस सारे कशमकश को सामने आने नहीं देते. पर धीरे-धीरे जब ये दीवार गिरती है तो आंसूओं की महीन धारा के साथ सारा ग़ुबार बह निकलता है.

मेरा हाथ पकड़कर सुषमा कहती हैं, “अकेली औरत हूं, अगर हिम्मती नहीं दिखूंगी तो लोग ग़लत फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे, जेल भी जाना होता है, अदालत भी, अस्पताल भी, जब कोई ध्यान रखनेवाला नहीं होता तो ख़ुद ही अपना ध्यान रखना पड़ता है.”

बताती हैं कि डेढ़ साल के इंतज़ार ने उनके पति और बाक़ी कर्मचारियों के हौसले को तोड़ दिया है, पर चाहती हैं कि सोहन चाहे पांच-छह साल बाद बाहर आएं, पर निर्दोष साबित होने के बाद, ताकि वो दोनों फिर सर उठा कर जी सकें.

‘ऐसे जीना भी क्या जीना’

हेमा के पति जेल में नहीं हैं. मुकेश मारूति के मानेसर प्लांट के उन 2,300 कर्मचारियों में से हैं जिन्हें जुलाई 2012 में हुई हिंसा के कुछ समय बाद निकाल दिया गया था.

उस वक़्त हेमा का दूसरा बेटा तीन महीने का था, पिछले डेढ़ साल से वो उसे गोद में लिए हर प्रदर्शन में जाती रही हैं, बताती हैं कि ‘मां’ के बाद उसने ‘ज़िन्दाबाद’ और ‘मुर्दाबाद’ बोलना ही सीखा.

मुकेश की नौकरी गई तो पहले कुछ महीने इस उम्मीद में ही निकल गए कि कर्मचारियों और मारूति के बीच कुछ समझौता हो जाएगा, नौकरी वापस मिल जाएगी, पर लगातार प्रदर्शनों से भी बात नहीं बनी.

बारहवीं तक पढ़ीं हेमा के मुताबिक़ पिछले दो सालों ने हिम्मती और होशियार बना दिया है, “मैं उम्मीद नहीं छोड़ती, हर रैली में जाती हूं, लगता है कि शायद मेरे जाने से ही कुछ बदलेगा, मोहल्ले में ‘प्रदर्शन वाली’ के नाम से मशहूर हो गई हूं.”

हरियाणा के कैथल शहर में राज्य के उद्योग मंत्री के घर के बाहर एक प्रदर्शन में पुलिस के लाठीचार्ज में हेमा चोट भी खा चुकी हैं, बताती हैं कि तब भगदड़ में दोनों बच्चे कुछ देर के लिए खो गए थे, पर फिर भी चली आती हैं.

हेमा कहती हैं, “ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, मर जाऊंगी, ऐसे ज़िन्दगी में भी क्या जीना, घर बैठने से कुछ नहीं होता, बाहर जाने लगी हूं तो औरों को देखकर समझ आता है, इस सबमें मरी तो नाम तो होगा कि प्रदर्शन करते-करते जान गई.”

मारुति के मानेसर प्लांट में जुलाई 2012 को हिंसक झड़पें हुईं थी.

उम्मीद

घर में पैसे ना हों, तो आंदोलन करना आसान नहीं, नौकरी से हटाए जाने पर मारूति ने जो पैसे दिए थे उनसे हेमा ने कुछ समय घर चलाया फिर अपनी मां से मदद ली और अब घर में ही कुछ सिलाई का काम करने लगीं हैं.

मारूति से निकाले जाने के बाद मुकेश को नौकरी मिलने में बहुत दिक्क़त हुई, गुड़गांव-मानेसर की कंपनियों में मारूति के बर्ख़ास्त कर्मचारियों के लिए कोई जगह नहीं थी. तीन महीने पहले आख़िर एक नौकरी मिली तो मारूति के मुक़ाबले आधी से भी कम तन्ख़्वाह पर.

हेमा कहती हैं, “तब इन्हें 18-20,000 रुपए मिलते थे, परमानेन्ट हो गए थे, बरकत की उम्मीद थी तो दूसरा बच्चा भी कर लिया, पता होता कि ऐसे दिन देखने पड़ेंगे तो कभी परिवार ना बढ़ाते, अब 8,000 की तन्ख़्वाह में गुड़गांव जैसे शहर में गुज़र कैसे करें?”

मुकेश की नौकरी गई तो सबसे पहले बड़े बेटे का स्कूल बदला – प्राइवेट की जगह अब वो सरकारी स्कूल में जाता है. खाना-कपड़ा, दवा इलाज सबका स्तर बदल गया.

ना शहर छूटता है, ना मारूति की नौकरी वापस मिलने की आस, हेमा बताती हैं कि उनके बच्चों के साथ ऐसा ना हो, उनका कल बेहतर हो, इसीलिए लगी हुई हैं.

मुझे कहती हैं, “पढ़-लिख जाती तो कुछ और कर लेती, अब तो सिर्फ़ न्याय के लिए चलकर प्रयास कर सकती हूं, तो वो करती रहूंगी.”

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