चुनाव तक ज़ुबानी जंग में कौन कितना फिसलेगा?

  • 27 जनवरी 2014
अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी

सुन ज़ा पिंग फ़ा एक बहुत पुरानी किताब है. क़रीब ढाई हज़ार साल पहले चीन में लिपिबद्ध की गई यह किताब युद्ध की रणनीति और मनोविज्ञान के बारे में है लेकिन हैरानी की बात यह नहीं है कि धर्म से इतर कोई पुस्तक इतने दिन तक बची रही.

हैरानी तब होती है जब पता चलता है कि उसका एक-एक शब्द आज के माहौल में भी उतनी ही शिद्दत से लागू होता है बल्कि पसर कर उसका विस्तार जीवन के हर क्षेत्र पर चस्पां हो जाता है.

आख़िरकार जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है, और फिर चुनाव भी तो एक युद्ध ही है.

कुल जमा 80 पन्नों की इस किताब में एक पंक्ति है कि सिपहसालार की असल परीक्षा आसन्न पराजय और विकराल परिस्थितियों का सामना करते समय होती है.

अति-सामान्य दिखाई देने वाला यह वाक्य दरअसल सामान्य नहीं है और अगर इसका अनलिखा हिस्सा उसके साथ पढ़ लिया जाए तो बात साफ़ हो जाती है...यह कि अंतिम परिणाम इससे प्रभावित होता है. परिणाम का सकारात्मक या नकारात्मक होना ऐसे में ज़्यादा मानी नहीं रखता.

अगर सुन ज़ा पिंग फ़ा को आधार माना जाए तो अगले दो-तीन महीने में होने वाले आम चुनाव के संदर्भ में हो रही क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ अचानक राजनीतिक दलों की मानसिक स्थिति को खोलकर रख देती हैं.

कांग्रेस का बर्ताव

सारी बेचैनी, सारा उत्साह, सब आशंकाएँ, सारे डर और सारी कल्पनाएँ एक झटके में बेपर्दा हो जाती हैं. समझ में आने लगता है कि कौन कहाँ खड़ा है.

सिपहसालारों या आज के संदर्भ में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को हटा दिया जाए तब देखिए कि वे चुनावी दंगल में ताल ठोंकते कहाँ खड़े हैं और क्या बेचने की कोशिश कर रहे हैं.

हड़बड़ी का पैमाना भी उसी से तय हो जाएगा और दूरगामी अंतिम परिणाम भी.

इस लिहाज से शायद कांग्रेस पार्टी को आगामी जंग के सिलसिले में सबसे अधिक नंबर देने पड़ेंगे.

असंयम की फुटकर और इक्का-दुक्का वारदातों के अलावा कांग्रेस ने बतौर राजनीतिक दल जिस तरह का बरताव रखा है उसकी सराहना की जानी चाहिए. उसे संभवतः सुन सू भी दस में से आठ नंबर दे देते.

दस साल की निर्बाध सत्ता जाने का डर मामूली नहीं होता, वह किसी भी पल बौखलाहट में तब्दील हो सकता है.

बृहदारण्यकोपनिषद के उस भालू की तरह व्यवहार कर सकता है जिसका चट्टान से पांव फिसल गया हो और गहरी घाटी में गिरना तय हो.

अपनी ग़लती का सारा दोष चट्टान पर मढ़कर वो भालू ऊंची आवाज़ में अपशब्दों की बौछार करता हुआ जीवन और संसार से मुक्त हो गया था. कांग्रेस का पांव भी पहाड़ी की चोटी पर ऐसी ही एक चट्टान पर है और उसका फिसलना क़रीब-क़रीब तय है.

संयम से होगा फ़ायदा

तो पार्टी क्या करे? उपनिषदीय भालू की तरह 128 साल बाद जीवन और संसार से मुक्ति प्राप्त कर ले, अपने पर कुढ़ते या दूसरों पर दोष मढ़ते? या चुप रहे, सोचे कि एक क़दम पीछे खींचने से पचास साल का जीवन और मिल सकता है. इतने में तो कम से कम दस चुनाव हो लेंगे.

अपशब्द और उच्छृंखलता आपका पीछा करती है. संयम और वाक्-चातुर्य आपके साथ रहता है. अगर आख़िरी दो हथियार बचे रहें तो यह संभावना बनी रहती है कि आसन्न पराजय अंतिम पराजय नहीं होगी.

अपशब्द अंसयम से ही उपजते हैं और हर बार, बल्कि बार-बार हमने उन्हें मुँह की खाते देखा है.

कुमार विश्वास और राहुल गांधी

गूंगी गुड़िया, बाबा लोग, मौत का सौदागर या पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड असंयम से उपजे शब्द समूह हैं, जिनकी सज़ा लोगों ने उनके आत्ममुग्ध वक्ताओं को दे दी है. जिन्हें नहीं मिली होगी, आगे मिल जाएगी.

इसी जीवन में हमारे देखते-देखते पता चल जाएगा कि ऐड़ा कौन है और थूक किसके मुँह पर गिरने वाला है.

ले-दे कर तीन महीने बचे हैं कांग्रेस के ताज़ा अवतार में. उसके बड़कऊ नेता तीन महीना और संभाल लें और छुटकऊ ज़्यादा उत्पात न करें तो संभव है उसकी उम्र 178 साल हो.

तब की तब देखेंगे, लेकिन यह अध्याय तो क़रीब-क़रीब समाप्त हुआ.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार