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गणतंत्र दिवसः तंत्र से अलग गण की एक परेड

 रविवार, 26 जनवरी, 2014 को 07:20 IST तक के समाचार
तिरंगा झंडा

गणतंत्र दिवस के दिन भारत की संस्कृति और सैन्य बल के वार्षिक भव्य आयोजन से एकदम अलग राजधानी दिल्ली में, कई मानवाधिकार कार्यकर्ता अपनी अलग गणतंत्र दिवस परेड निकालने वाले हैं.

रविवार दोपहर बाराखम्बा रोड से जन्तर-मन्तर तक निकाली जाने वाली इस परेड में औरतों, विकलांगों, समलैंगिकों, दलितों और कई अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाले संगठन शामिल हैं.

इतने अलग-अलग सरोकारों के लिए काम करने वाले ये संगठन एकजुट होकर आखिर क्या कहना चाहते हैं. बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य ने अलग-अलग लोगों से बात कर यही जानने की कोशिश की.

विमल भाई, नेशनल एलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट्स

जब मैं छोटा था तो गणतंत्र दिवस की परेड खूब देखने जाता था.

लेकिन पिछले 10-20 सालों से मुझे उसमें ‘तंत्र’ तो नज़र आता है लेकिन ‘गण’ नज़र नहीं आता.

हथियार तो नज़र आते हैं, सेना नज़र आती है, लोग नाचते-गाते नज़र आते हैं लेकिन यह सब बहुत बनावटी नज़र आता है.

क्योंकि इसमें जनता की पीड़ा नज़र नहीं आती, जनता की तकलीफ़ें नज़र नहीं आती.

विमल भाई

मणिपुर में एक छोटी सी लड़की 11-12 साल से भूख हड़ताल पर है और आप रोज़ उसे जेल में डाल देते हैं.

उधर गणतंत्र दिवस परेड में आप दिखाते हैं मणिपुर की झांकी में सरकारी योजनाओं को, नाचते-गाते लोगों को. उसमें असली मणिपुर कहीं नज़र नहीं आता.

पूरे देश में विकास योजनाओं के नाम पर विस्थापन हो रहा है. आदिवासी हाशिए पर हैं.

ऐसे में हम सिर्फ़ उत्सव मनाएं, यह ठीक नहीं लगता. इसलिए हम सरकारी तामझाम के बरअक्स अपनी परेड कर रहे हैं.

वह नाच-गाकर दिखाना चाहते हैं कि सब अच्छा-अच्छा है. हम अपनी तकलीफ़ों को, अपने संघर्षों को सामने ला रहे हैं कि संविधान के दिवस में संघर्ष जारी हैं मतलब संविधान का पालन नहीं हो पा रहा, इन संघर्षों का होना इसका द्योतक है.

दीप्ति शर्मा, सदस्य, सहेली

समलैंगिक संबंधों को आपराधिक करार देने वाली धारा 377 पर जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुनाया था, तो कहा था कि समलैंगिक समुदाय अल्पसंख्यक है.

यह प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर एक तरह की प्रतिक्रिया भी है, कि हम जो बहुत छोटे-छोटे अल्पसंख्यक समुदाय हैं अगर वह मिल जाते हैं तो हम एक उल्लेखनीय अल्पसंख्यक समुदाय बन सकते हैं.

फिर ऐसा कोई साफ़ विभेद भी नहीं है.

दीप्ति शर्मा

ऐसा नहीं है कि कि जो समलैंगिक हैं वह विकलांग नहीं हो सकते. या अगर कोई दलित है तो उसका किसी और मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है.

तो जो हमारी सामाजिक पहचान होती है और जो पहचान हम अपने लिए चुनते हैं उनमें बहुत ज़्यादा अंतर होता है.

ये सब हमारे सरोकार हैं. पिछले साल जो बहुत से कानून बने हैं उनमें बहुत से वर्गों को शामिल नहीं किया गया है, बहुत सारी श्रेणियां ऐसी हैं जिनमें कानून ने लोगों को और हाशिए पर धकेल दिया है.

वहीं महिलावादी आंदोलनकारियों के दशकों से चले आ रहे आंदोलन के बाद बलात्कार विरोधी क़ानून में बदलाव लाए गए हैं, लेकिन वो भी इतनी कमियों के साथ कि उसे पूरे तरीके से दोबारा लिखे जाने की ज़रूरत है.

मौजूदा रूप में क़ानून पुलिस की जवाबदेही तक सुनिश्चित नहीं करता है.

लेस्ली एस्टीव्स, समलैंगिक आंदोलनकारी

संविधान 64 साल पहले तैयार किया गया था. क्या भारत सरकार यह कह सकती है कि संविधान में दिए गए अधिकार सभी नागरिकों को मिल गए हैं? जी बिल्कुल नहीं.

लेस्ली एस्टीव्स

एक लेस्बियन व्यक्ति और कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि संविधान जो अधिकार सभी नागरिकों को देता है, धारा 377 मेरे वैसे बहुत से अधिकारों को छीन रही है.

समलैंगिकों को अब तक अपनी तरह से ज़िंदगी जीने की आज़ादी नहीं है, मूल मानवाधिकार हासिल नहीं हैं.

गणतंत्र दिवस एक उत्तम संविधान बनाए जाने का उत्सव है, पर सवाल यह है कि क्या आपको तब उत्सव मनाना चाहिए जबकि बहुत से भारतीयों से संविधान में किए गए वायदे पूरे ही नहीं हुए हैं.

स्वतंत्रता दिवस तो स्वतंत्रता सेनानियों के याद करता है, एक उप्लब्धि का जश्न है, जो हासिल की जा चुकी है.

क्या 26 जनवरी के दिन भारत सरकार को उत्सव मनाने के बजाय यह योजना नहीं बनानी चाहिए कि हर व्यक्ति को उसके संवैधानिक अधिकार कैसे मिलें?

कैसे हाशिए पर मौजूद लोगों को मुख्यधारा में शामिल किया जाए?

अनीता घई, विकलांगों के अधिकारों के लिए काम कर रहीं कार्यकर्ता

मैं हमेशा महिलावादी रही हूं, पर विकलांग होना भी मेरी पहचान का हिस्सा है. और इस पहचान से जुड़े सरोकारों के लिए महिला आंदोलन में जगह बनाने में भी बहुत संघर्ष करना पड़ा है.

तो मुझे लगा कि हम निजी स्तर पर, या विकलागों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं में रहकर तो काम कर सकते हैं, लेकिन बाहर निकलकर और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से जुड़ना भी बहुत ज़रूरी है.

अगर आप बाहर नहीं आते हैं तो यह सामान्य स्थिति को, पितृसत्ता को स्वीकारना होगा, जो अल्पसंख्यकों को आगे बढ़ने से, अपनी बात कहने से रोकती है.

जब संविधान की बात होती है, तो कई निजी अनुभव ज़हन में उठते हैं जो विकलांगों के संवैधानिक अधिकारों के हनन का सूचक है.

अनीता घई

मानो सरकार को विकलांग और उनकी विशेष ज़रूरतें दिखाई ही नहीं देतीं.

जैसे कि चार दिसंबर को जब मैं वोट देने गई थी तो पोलिंग बूथ में कोई ढलान नहीं थी जिसपर अपनी व्हीलचेयर चढ़ाकर मैं ऊपर जा पाती. तो मैं वहां विरोध जताने लगी.

ऐसे में एक टीवी चैनल की टीम, जो वहां अजय माकन से मिलने आई थी, मेरे विरोध की चर्चा भी करने लगी, जिससे बात आ बढ़ी.

आखिरकार मेरी व्हीलचेयर को उठाया गया और मैंने वोट दिया लेकिन मेरी बहुत सी विकलांग महिलाएं दोस्त वोट नहीं दे पाईं क्योंकि हमारे पोलिंग बूथ में इस बात का ध्यान ही नहीं रखा जाता.

तो मेरे विरोध में आगे आने का एक कारण यही था कि आप इस समस्या को देख नहीं पाते हो समझ नहीं पाते हो.

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