क्या पूर्ण विराम लग जाएगा टाइपराइटरों पर?

  • 20 जनवरी 2014
भारत, टाइपिस्ट, टाइपराइटर, कोलकाता

34 साल से हर सुबह अजय कुमार नायक कलकत्ता हाईकोर्ट के बाहर बेहद व्यस्त फ़ुटपाथ से गुज़रते रहे हैं.

वह लकड़ी की जर्जर हो चुकी मेज़ के पीछे टूटी-फूटी कुर्सी लगाते हैं और इसके बाद आहिस्ता से अपना 15 साल पुराना टाइपराइटर उस पर रख देते हैं.

सूरज की गर्मी से अपनी बेशक़ीमती धरोहर बचाने के लिए वह डेस्क पर तिरपाल का टुकड़ा बिछाते हैं. अब वह कोलकाता की सड़कों पर बैठने वाले कुछ चुनिंदा टाइपिस्टों की तरह कामकाज के लिए तैयार हो चुके हैं.

वह कहते हैं, "एक दशक पहले मेरे पास ख़ाली बैठने या बात करने का वक़्त नहीं होता था. मेरी उंगलियां सारे दिन चलती रहती थीं. तब आपको सिर्फ़ टाइपराइटर की आवाज़ ही सुनाई दिया करती थी. मगर अब ख़ामोशी पसरी है."

वह एक मिनट के लिए थमते हैं और सड़क पर बैठे कुछ दूसरे टाइपिस्टों की तरफ़ इशारा करते हैं- इनमें से एक चाय पी रहा है, जबकि दूसरा अख़बार पढ़ रहा है.

अजय कहते हैं, "हमारी तरफ़ देखें. हमारे पास काम ही नहीं है. अगर आप कुछ साल पहले आएंगे तो यहां आपको कोई नहीं मिलेगा. कंप्यूटर ने हमारे कारोबार की हत्या कर दी है."

अजय और उनके दोस्त तक़रीबन सभी तरह के दस्तावेज़ तैयार किया करते थे.

प्रेम पत्र

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अजय नायक कलकत्ता हाईकोर्ट के बाहर फ़ुटपाथ पर टाइपिंग का काम करते हैं.

जटिल क़ानूनी ड्राफ़्ट तैयार करना तो उनका काम था ही, मगर वे शादी कार्डों के संदेश से लेकर सीवी तक अपडेट किया करते थे.

वे मुझे यह बताते हुए हँसने लगते हैं कि कैसे कुछ युवा पुरुष उनसे अपने प्रेम पत्र टाइप कराने आया करते थे.

इनमें से एक ने मज़ाक किया, "हो सकता है कि अब हम तलाक के पत्र टाइप करना शुरू कर दें. हो सकता है कि इससे शायद हमारे पास काम बढ़ जाए."

हमारी बातचीत कुछ देर के लिए रुक जाती है जब एक शख़्स उनकी तरफ़ आ रहा है, लेकिन जैसे ही वह वहां से जाता है, बातचीत फिर शुरू हो जाती है.

हाईकोर्ट से कुछ मील दूर सफ़ी कॉमर्शियल कॉलेज है. पिछले 80 साल से यहां नौजवान लड़के-लड़कियां और महिलाएं टाइपिंग सीखने आते रहे हैं.

ग्राउंड फ़्लोर पर अभी भी एक अंधेरा सा क्लासरूम है जहां लकड़ी की मेज़ों पर रेमिंगटन टाइपराइटर भरे पड़े हैं, मगर अब उनका इस्तेमाल बहुत कम ही होता है.

'क्या ज़रूरत है?'

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अपनी स्थापना से लेकर अब तक कॉलेज चलाने वाले परिवार के मोहम्मद क़मर हामिद बताते हैं, "अगला साल टाइपिंग कक्षाएं चलाने का हमारा आख़िरी साल होगा."

वह कहते हैं, "अब इसकी मांग नहीं है और जब मैं नौजवानों को इन टाइपराइटरों पर कीबोर्ड इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाने के लिए अभ्यास करने को कहता हूं तो वे मेरी तरफ़ देखकर पूछते हैं, 'क्या ज़रूरत है?'"

वे मुझे दूसरे कमरे की तरफ़ ले गए. यहां लाइन से कंप्यूटर लगे हैं और उनके सामने तक़रीबन 20 साल की उम्र वाली लड़कियों का एक ग्रुप बैठा है.

वे कहते हैं, "भारत के गलाकाट नौकरी बाज़ार में नौकरी पाने के लिए इनका कंप्यूटर जानना ज़रूरी है. अब कोई टाइपराइटर इस्तेमाल नहीं करता. कुछ साल बाद आप इन्हें सिर्फ़ संग्रहालयों में ही देखेंगे."

लड़कियां इस बात पर सहमति जताती हैं. एक छात्रा नेहा जिसने हाल ही में कंप्यूटर दक्षता में 97 फ़ीसदी अंक हासिल किए हैं कहती हैं कि हाथ से चलने वाले टाइपराइटर "अब व्यवहारिक नहीं हैं."

वह बताती हैं, "आज दफ़्तरों में इतना काम होता है और कंप्यूटर से आप अपनी ग़लतियां आसानी से ठीक कर सकते हैं."

सड़क पर टाइपिंग का काम करने के बारे में वह कहती हैं कि वह "कभी नहीं करेंगी."

"मुझे लगता है कि हमें तकनीक के साथ चलना चाहिए और पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए. टाइपराइटर अब हमारे दौर की चीज़ नहीं रह गए हैं."

जब मैंने कक्षा से पूछा कि क्या उनमें से कोई टाइपराइटर का इस्तेमाल करेगा तो उनका साफ़ जवाब था-नहीं.

एक और छात्रा दिव्या अपनी कक्षा की तरफ़ से कहती हैं: "इन्हें इस्तेमाल करना वाकई मुश्किल है. इसीलिए हम सभी कंप्यूटरों को प्राथमिकता देते हैं. हम आसान ज़िंदगी चाहते हैं."

आख़िरी कुछ सौ

भारत टाइपिस्ट टाइपराइटर
सफ़ी कॉमर्शियल कॉलेज चलाने वाले हामिद बताते हैं कि वहां टाइपिंग सीखने आने वालों की तादाद तेज़ी से घटी है.

बाहर हाईकोर्ट के बाहर अजय कुमार नायक को आख़िर एक ग्राहक मिल ही गया.

मगर जैसे ही वह इस क़ानूनी दस्तावेज़ को टाइप करना बंद करते हैं और जिसके लिए उन्हें सात रुपए प्रति पेज मिलते हैं- वह और उनके दोस्तों की बातचीत शुरू हो जाती है.

कोलकाता में 20 साल पहले सड़कों पर क़रीब दो हज़ार टाइपिस्ट बैठा करते थे; अब कुछ सौ ही बचे हैं.

अजय ने यह काम इसलिए शुरू किया था क्योंकि उन्हें कोई दूसरा काम नहीं मिला था. वह कहते हैं कि वह किसी को अपना उदाहरण दोहराने की सलाह नहीं देंगे.

"अब यहां सिर्फ़ बुज़ुर्ग लोग ही बचे हैं. कोई नौजवान यहां नहीं बैठता."

"मैंने अपने बेटे तक को कहा है कि वह इस काम में न आए क्योंकि सड़कों पर बैठकर रोज़ी-रोटी कमाना अब बेहद मुश्किल हो चला है."

तक़रीबन काम के बिना बीते दिन के बाद अब उनके घर जाने का वक़्त हो चुका है.

जैसे ही मैं आगे बढ़ता हूं, वह चिल्लाकर कहते हैं: "फिर जल्दी आइएगा. मैं और मेरे दोस्त यहां ज़्यादा वक़्त नहीं रहेंगे."

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