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मोबाइल इंडियन: क्या आपके पास है 'मोबाइल-बटुआ'?

 शुक्रवार, 17 जनवरी, 2014 को 14:31 IST तक के समाचार
एम-पेसा

क्या आप जानते हैं कीनिया की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में मोबाइल-पेमेंट के ज़रिए किया गया वित्तीय आदान-प्रदान 40 प्रतिशत है. देश की 70 फ़ीसदी आबादी इस सेवा, 'एम-पेसा' का इस्तेमाल करती है. इनमें से ज़्यादातर लोगों के बैंक खाते तक नहीं हैं.

दूसरी तरफ़ भारत है, जहां करीब 90 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता हैं, लेकिन यहां की एक प्रतिशत से भी कम आबादी 'मोबाइल पैसे' का प्रयोग करती है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की जीडीपी का 0.1 प्रतिशत वित्तीय आदान-प्रदान मोबाइल पैसे के ज़रिए होता है.

यह आंकड़ा थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि कीनिया की एम-पेसा प्रणाली को भारत आए दो साल हो चुका है और मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी एयरटेल की 'एयरटेल मनी' भी काफ़ी समय से भारत में सक्रिय है.

'मोबाइल वॉलेट' कही जाने वाली ये सेवाएं ग्राहकों को बिना बैंक खाते के अपने मोबाइल खाते में पैसे डालने और फिर उससे ख़रीदारी करने या पैसे ट्रांस्फ़र करने का विकल्प देती हैं.

भारत में कब और कैसे आया 'मोबाइल वॉलेट'

स्वाहिली में 'पेसा' और हिंदी व दक्षिण एशिया की अन्य भाषाओं के शब्द 'पैसा' के मायने एक ही होते हैं- धन. एम-पेसा ने कई अफ़्रीकी देशों में लोगों का जीवन बदला है.

अफ़गानिस्तान में वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांस्फ़र के सहयोग से चल रही इस सेवा को 'मोबाइल हवाला' कहा जाता है. अरबी भाषा में हवाला शब्द के मायने भी स्थानांतरण ही होते हैं. 'हवाला' विश्वसनीय एजेंटों के ज़रिए पैसे भेजने और मंगाने की एक प्रचलित व्यवस्था है.

एम-पेमेंट या मोबाइल फ़ोन के ज़रिए बिल चुकाने की सेवा नई नहीं है. मैंने इसका सबसे पहला इस्तेमाल 2001 में एचडीएफ़सी बैंक के ज़रिए मोबाइल बिल चुकाने में किया था. हालाँकि इस सेवा के बारे में ज़्यादा लोगों को जानकारी नहीं थी और इसका इस्तेमाल बेहद कम ही किया जाता था.

एम-पेसा

साल 2008 में एयरटेल ने नई कंपनी एम-चैक के साथ साझेदारी में एम-पेमेंट सिस्टम शुरू किया. यह हर सिमकार्ड पर पहले से इंस्टॉल कर दिया जाता था. जिस कारण साल दर साल एयरटेल ने करोड़ों ग्राहक जोड़े लेकिन इसका इस्तेमाल बेहद कम ही रहा. यह इस्तेमाल भी सिम कार्ड को रिचार्ज करने तक ही सीमित रहा.

साल 2011 में एम-चैक की जगह 'एयरटेल मनी' ने ले ली. इस नई मोबाइल पेमेंट व्यवस्था में कंपनी ने कई नई सेवाएं भी जोड़ी, जबकि उसी साल वोडाफ़ोन एम-पेसा को भारत लेकर आया. तीन साल बाद भी मोबाइल पेमेंट व्यवस्था भारत में कोई ख़ास असर नहीं पैदा कर सकी है.

एम-वॉलेट की चुनौतियां

एम-चैक के सीईओ रहे संजय स्वामी बताते हैं कि मोबाइल रिचार्ज करने के लिए इस व्यवस्था का काफी इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन असली ज़रूरत पैसा ट्रांस्फ़र करने की थी जिस पर रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया(आरबीआई) ने रोक लगा रखी थी.

संजय स्वामी अब बेंगलुरु से शुरू हुई एम-पेमेंट की नई कंपनी ईज़ीटैप के चैयरमैन हैं. यह कंपनी मोबाइल फ़ोन और टैबलेट से जुड़ पाने वाली छोटे क्रेडिट कार्ड रीडर बेचती है.

मोबाइल पेमेंट सेवा पेटीएम (Paytm) लाने वाली कंपनी वन 97 समेत कई टेलीकॉम कंपनियों में निवेश करने वाले कुनाल बजाज कहते हैं कि मोबाइल पेमेंट व्यवस्था का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि आरबीआई के दिशानिर्देशों के तहत इसमें बैंकों का शामिल होना ज़रूरी है.

लेकिन बैंक और टेलीकॉम कंपनियों के बीच कोई साझेदारी कामयाब नहीं रही. बैंकों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि ग्राहक किस कंपनी का होगा और कौन अतिरिक्त सेवाएं ग्राहकों को बेच पाएगा.

मोबाइल पेमेंट सेवाओं को भारत में लगभग पाँच साल हो गए हैं, लेकिन फिर भी इनका इस्तेमाल कम क्यों हैं? इसका जवाब 'कैश' में है.

भारत आज भी कैश यानी नक़द पर आधारित अर्थव्यवस्था है, ख़ासकर दुकानों से ख़रीदारी के मामले में.

एटीएम पेमेंट इंस्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी 'बीटीआई पेमेंट' के सीईओ एम श्रीनिवास के मुताबिक रिटेल में मोबाइल से पेमेंट आज भी मुश्किल काम है.

वे मानते हैं कि असल ज़रूरत पैसा ट्रांस्फ़र करने की व्यवस्था की है. आरबीआई के प्रतिबंधों के कारण कैश निकालने पर पाबंदी है. वे कहते हैं, 'कॉफ़ी का बिल चुकाने के लिए ज़्यादातर भारतीय कैश देना ही पसंद करेंगे.'

मनी लॉन्ड्रिंग का खतरा

श्रीनिवास को उम्मीद है कि आरबीआई नियमों में छूट देगी और बिना बैंक खाते के भी एटीएम से पैसे निकालना संभव हो सकेगा. वे कहते हैं कि आरबीआई की चिंता मनी लांड्रिंग को लेकर है लेकिन आधार कार्ड से जुड़े हुए बायोमेट्रिक कार्ड एक संभव उपाय हो सकते हैं.

mobile payment

हालांकि विशेषज्ञों को अगले दो सालों में एम-पेमेंट का इस्तेमाल बढ़ने की उम्मीद है. वोडाफ़ोन-यूके की एंटरप्राइज़ टेक्नोलॉजी की प्रमुख अमृता गंगोत्रा भारत में एम-पेमेंट को ब्रिटेन के मुकाबले तेज़ी से बढ़ता हुआ देखती हैं. हालांकि वे मानती हैं कि अफ़्रीका में यह व्यवस्था काफी आगे है.

अमृता बताती हैं कि अफ़्रीका में बैंक व्यवस्था बहुत ज़्यादा नियमित नहीं है इसलिए यहाँ टेलीकॉम कंपनियाँ स्वतंत्र रूप से पेमेंट सेवाएं दे सकती हैं, जबकि एनएफ़सी वाले मोबाइल फ़ोनों और मददगार व्यवस्थाओं के कारण जापान में एम-पेमेंट सेवाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं.

अमृता कहती हैं कि एयरटेल मनी एक समूचे बटुए की तरह हैं. इसे डेबिट कार्ड की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और आपका पैसा बैंक के एस्क्रो (escrow) खाते में रहता है.

सकारात्मक शुरुआत

विशेषज्ञ मानते हैं कि नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (एनपीसीआई) का गठन एक सकारात्मक शुरुआत है. एनपीसीआई भारत में रिटेल भुगतान सेवाओं के लिए गठित की गई एजेंसी है.

इसका आईएमपीएस यानि 'तुरंत भुगतान सेवा' भारत की पहली 24 घंटे सेवा देने वाली ऑनलाइन फंड ट्रांस्फ़र प्रणाली है.

ज़्यादातर मामलों में पैसा भेजने वाले और पैसा लेने वाले दोनों के पास बैंक खाते होने ज़रूरी हैं हालाँकि मई 2013 में लाँच की गई 'ऑक्सीकैश' सेवा बिना बैंक के भी पैसा भेजने की सेवा देती है.

ऑक्सीजन सर्विसेज़ की यह सेवा आईएमपीएस प्रणाली का इस्तेमाल करती हैं. इसके ज़रिए बैंक खाता न रखने वाले ग्राहक भी चुनिंदा स्थानों पर पैसा भेज या मंगा सकते हैं.

हालाँकि तकनीक और बाज़ार में हो रहे बदलावों और उपस्थित प्रणालियों के ज़रिए भारत में वायरलैस फंड ट्रांस्फ़र बाज़ार साल 2015 तक पड़ोसी देशों पाकिस्तान (ईजीपैसा) और बांग्लादेश (बीकैश) को पीछे छोड़ देगा और सकल घरेलू उत्पाद के 15 फ़ीसदी के आंकड़े तक पहुंचकर अफ़्रीकी देशों के क़रीब आ जाएगा.

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