विकास की पटरी पर कब आएगी अर्थव्यवस्था?

  • 17 जनवरी 2014
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

विश्व बैंक का पहले अनुमान था कि भारत की अर्थव्यवस्था साढ़े छह फीसदी की दर से बढ़ेगी लेकिन अब उन्होंने 2014-15 के वित्तीय वर्ष के लिए इस अनुमान को कम करके 6.2 फीसदी कर दिया है.

आर्थिक स्थिति खराब तो बहुत ज़्यादा नहीं हुई लेकिन इसके सुधरने की सूरत भी बहुत ज़्यादा नहीं दिखती है. 2014 में आम चुनाव होने हैं. मंदी का ये जो माहौल है, ये जारी रहने की उम्मीद ज़्यादा है. खासकर तब जबकि भारत सरकार अगले चार-पाँच महीने तक कोई भी फैसला लेने की स्थिति में नहीं होगी. मई में जब नई सरकार बनेगी उसके बाद भी दो-तीन महीने लगेंगे.

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मतलब कि अगस्त सितंबर के बाद ही सुधार की कोई तस्वीर बनती दिखाई देती है. यानी कि जो भी विकास होना है वह अगले छह महीनों में ही मिलेगा. वह भी तब जब कि चुनावों के बाद ऐसी सरकार गठित हो जोकि निर्णय लेने की स्थिति में हो. इन सारी चीजों को देखते हुए उन्होंने विकास दर का अनुमान थोड़ा कम किया है. 6.5 फीसदी से 6.2 फीसदी. मेरे हिसाब से ये आकलन ज़्यादा यथार्थपरक है.

हालांकि कुछ लोग ये भी कहते हैं कि विकास दर छह फीसदी से भी कम रह सकता है लेकिन सारी चीजें इस पर निर्भर करती हैं कि चुनाव के बाद किस तरह की सरकार केंद्र में आती है और वह किस तरह के फैसले ले पाती है और उसी के अनुसार भारत की विकास की संभावना बनेगी.

नीतिगत फैसले

भारतीय अर्थव्यवस्था

विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बासु ने हाल ही में कहा है कि दक्षिण एशिया में 4.6 प्रतिशत से बढ़कर 5.7 प्रतिशत के आसपास विकास तभी होगा जब कि नीतिगत फैसले लेने में ढील न बरती जाए. ये बात सही है. लेकिन ये कहना कि 4.6 फीसदी से बढ़कर 5.7 प्रतिशत हो जाना, मुझे नहीं लगता कि इस साल ये हो पाएगा. दक्षिण एशिया में भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी है.

(आर्थिक मंदी के कारण खुदकुशी?)

यहाँ अगले साल चुनाव होने वाले हैं और यहाँ खाद्य मुद्रास्फिति अभी भी बहुत ज़्यादा है. हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि वे सामान्य मुद्रास्फीति से निपटने की स्थिति वे आ रहे हैं. इस हफ्ते मुद्रास्फीति के जो आंकड़े आए हैं, उन्हें उत्साहवर्द्धक कहा जा सकता है. इन सभी के बावजूद क्या दक्षिण एशिया का विकास दर 5.7 फीसदी हो पाएगा, ये नहीं कहा जा सकता.

लेकिन इतना तय है कि अगर नई सरकार नीतिगत फैसले लेने की स्थिति में आती है तो वह अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर जल्दी ला सकेगी. ये इस बात पर निर्भय करेगा कि कैसी सरकार चुनकर आती है, चाहे वह बीजेपी की हो या फिर कांग्रेस की हो. लोगों का मानना है कि नई सरकार के पास अच्छा बहुमत हो ताकि उसे नीतिगत फैसले करने के लिए उसे सहयोगी दलों पर बहुत अधिक निर्भर न होना पड़े.

घरेलू अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था

और इस बात का होना बहुत ज़्यादा मुमकिन नहीं दिखता. इस सूरत में आने वाले साल भर में हालात बेहतर होने के संकेत नहीं दिखाई देता है. पिछले साल के लिए आए विश्व बैंक के एक रिपोर्ट में इस साल के लिए कहा गया है कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है. हाल के आंकड़ों के मुताबिक ब्रिटेन में भी दो फीसदी की महँगाई से निपट लिया गया है. अमरीका में भी हालात बदल रहे हैं.

(रुपयाः कैसे संभलेगा? संभलेगा क्या?)

सवाल उठता है कि इन सब का असर भारत पर क्या पड़ेगा? भारत पर इनका असर पड़ सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वह इसका फायदा उठाने की स्थिति में हो.

भारत के उत्पादन क्षेत्र या सेवा क्षेत्र में ऐसी स्थिति हो कि वह इन बाजारों में जाकर अपने सामान या अपनी सेवाएँ बेच सकें और इसके लिए बहुत जरूरी है कि भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था अच्छी खासी स्थिति में हो.

(बीबीसी संवाददाता फैसल मोहम्मद अली से बातचीत पर आधारित.)

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