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सियासी जंग में कौन हैं राहुल के सिपहसालार?

 शुक्रवार, 17 जनवरी, 2014 को 07:49 IST तक के समाचार
राहुल गांधी

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है.

ज़ाहिर तौर पर पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथ में आने के साथ ही नई पीढ़ी के कई चेहरे कांग्रेस पार्टी में बड़ी भूमिका निभाते नज़र आएंगे.

राहुल गांधी के क़रीबी समझे जाने वाले इन लोगों को ही अक्सर 'टीम राहुल' का नाम दे दिया जाता है.

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इनमें से कुछ लोग उनसे राजनीतिक तौर पर जुड़े हैं, कुछ उनके समर्थक हैं तो कुछ को लगता है कि पार्टी को एक विशेष दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.

कनिष्क सिंह

कनिष्क सिंह ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त एसके सिंह के बेटे हैं और पिछले क़रीब दस वर्षों से राहुल गांधी के सहयोगी हैं. वे एक निवेश बैंकर की अपनी नौकरी छोड़कर राहुल गांधी के साथ आए थे.

कहा जाता है कि वो राहुल गांधी के भाषण तैयार करते हैं, उनकी यात्राओं का ब्यौरा रखते हैं और साथ ही कांग्रेस नेताओं के साथ उनकी मुलाकात का कार्यक्रम भी कनिष्क की देखरेख में तैयार होता है.

राहुल की टीम में कनिष्क की छवि एक टेक्नोक्रेट की बताई जाती है.

जी मोहन गोपाल

राहुल गाँधी

जी मोहन गोपाल नेशनल लॉ यूनीवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थे और उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर राहुल गांधी का हाथ थामा है.

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राहुल गांधी की विचारधारा को आकार देने में मोहन गोपाल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. वो कई मसलों पर राहुल गांधी को अपनी राय देते हैं.

कई हलकों में ये राय है कि राहुल गांधी की भाषा में जो एक तरह का समाजवादी पुट है, वो जी मोहन गोपाल की वजह से है. इस समय वो राजीव गांधी इस्टीट्यूट ऑफ कन्टेम्प्ररी स्टडीज़ के निदेशक हैं.

के राजू

भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे के राजू अब राहुल गांधी के साथ जुड़े हुए हैं. राजू दलितों के मसले पर राहुल गांधी को सलाह देते हैं.

राजू प्रशासनिक कार्यों के साथ ही ख़ासतौर से उन सुधारों पर काम कर रहे हैं जिनके ज़रिए दलितों को ऊपर लाया जा सके और वो कंधे से कंधा मिलाकर बाक़ी लोगों के साथ चल सकें.

राहुल गांधी देश भर से दलित नेताओं की तलाश कर उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देना चाहते हैं और इस काम की ज़िम्मेदारी राजू के पास ही है.

सचिन राव

राहुल गाँधी कांग्रेस पार्टी के अन्य नेताओँ के साथ

सचिव राव राहुल गांधी से मिलने जुलने वालों का ब्यौरा रखते हैं.

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मिशिगन बिजनेस स्कूल से स्नातक सचिन राव यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई से संबंधित कामकाज भी देखते हैं.

माना जाता है कि पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षणों में भी उनकी भूमिका रहती है.

सैम पित्रोदा

सैम पित्रोदा राहुल गांधी के पिता के सहयोगी भी रह चुके हैं और इस समय राहुल गांधी की मदद कर रहे हैं.

सैम पित्रोदा इस बात का ख़ासतौर से ध्यान रख रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र और एजेंडे में किन बातों को शामिल करना है.

कांग्रेस पार्टी को एक विज़न और वैचारिक धार देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है.

दिग्विजय सिंह

दिग्विजस सिंह

दिग्विजय सिंह हमेशा से राहुल गांधी के हिमायती रहे हैं. एक तरह से उनका काम है कि पटाखा जलाकर उसको भीड़ में फेंक देना.

मीडिया में उन्हें हमेशा ऐसे ही देखा जाता है. यानी कि अगर वो कोई ऐसा बयान देते हैं, जिससे बाद में कांग्रेस पार्टी मुकर भी जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में दिग्विजय सिंह की बड़ी भूमिका रही थी और माना जा रहा है कि लोकसभा चुनावों में भी वो महत्वपूर्ण बने रहेंगे.

मधुसूदन मिस्त्री

गुजरात से आने वाले मधुसूदन मिस्त्री का नाम उस समय चर्चा में आया जब कांग्रेस पार्टी ने उन्हें राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया.

इससे पहले मधुसूदन मिस्त्री कर्नाटक में पार्टी को जीत दिलाकर अपनी सांगठनिक क्षमता का परिचय दे चुके हैं.

उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन बेहद कमज़ोर है और दूसरी तरफ उनका मुक़ाबला अपने ही राज्य के भाजपा महासचिव अमित शाह से है. ऐसे में उनके सामने चुनौती कठिन है.

जयराम रमेश

राहुल गांधी के क़रीबी माने जाने वाले जयराम रमेश हाल में आम आदमी पार्टी को लेकर दिए गए अपने बयान से चर्चा में रहे.

ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में यूपीए सरकार के सामाजिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में उनकी ख़ास भूमिका रही है. जयराम रमेश सादगी के लिए जाने जाते हैं और नकदी सब्सिडी जैसी योजनाओं से जुड़े हुए हैं.

एके एंटनी

कांग्रेस के मिशन 2014 में एके एंटनी की भूमिका महत्वपूर्ण है. कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शामिल एंटनी की राहुल गांधी कई बार खुलकर तारीफ कर चुके हैं.

एंटनी की छवि बेहद ईमानदार नेता की है और वे अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं. हालांकि कई बार उन पर आरोप लगे हैं कि उनके विचार पुराने और बाज़ार विरोधी हैं.

मिलिंद देवड़ा

बीते दिनों दागी नेताओं को बचाने के मुद्दे पर अपनी ही सरकार की आलोचना कर मिलिंद देवड़ा चर्चा में रहे हैं. हालांकि बाद में उन्हें राहुल गांधी का साथ मिल गया.

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इससे टीम राहुल में उनकी स्थिति समझी जा सकती है क्योंकि आम तौर पर केन्द्रीय मंत्री अपनी ही सरकार के किसी फ़ैसले की आलोचना नहीं करते हैं.

उनकी छवि एक धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक और तकनीक की व्यावहारिक समझ रखने वाले नेता की है.

भंवर जितेंद्र सिंह

राजस्थान के अलवर से सांसद भंवर जितेंद्र सिंह ने बहुत कम समय में राहुल गांधी की टीम में अपने लिए ख़ास जगह बनाई है.

पूर्व राजघराने से संबंध रखने वाले जितेंद्र सिंह इस समय खेल और युवा मामलों के मंत्री हैं. वो ज़मीनी नेता रहे हैं और हिंदी-राजस्थानी बोलने वाली जनता से उनका गहरा जुड़ाव रहा है.

आने वाले दिनों में राजस्थान में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

सचिन पायलट

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी की क़रारी हार के बाद अब केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट को वहां का प्रमुख नियुक्त किया है. सचिन पायलट पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय राजेश पायलट के बेटे हैं.

सचिन पायलट को यह ज़िम्मेदारी लोकसभा चुनाव से महज तीन चार महीने पहले दी गई है. ऐसे में उनके सामने लोकसभा चुनावों में पार्टी के सम्मानजनक प्रदर्शन की चुनौती है.

जितिन प्रसाद

केंद्र सरकार में राज्य मंत्री जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश में संगठन को मज़बूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी मिल सकती है.

सरल स्वभाव के जितिन को कामकाज के लिहाज से बेहद तेज़तर्रार माना जाता है.

प्रिया दत्त

कांग्रेस सांसद प्रिया दत्त और उनके भाई संजय दत्त

प्रिया दत्त न सिर्फ सलमान ख़ान की नज़र में बल्कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नज़र में भी बेस्ट हैं.

सोशल मीडिया पर कांग्रेस पार्टी की पकड़ बढ़ाने के लिए काम कर रही प्रिया दत्त को राजनीति अपने पिता से विरासत में मिली लेकिन उन्होंने संसदीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई है.

मीनाक्षी नटराजन

मीनाक्षी नटराजन मध्य प्रदेश के मंदसौर से सांसद हैं और उन्हें राहुल गांधी का भरोसा हासिल है. पार्टी के भीतर राहुल गांधी अक्सर मीनाक्षी के कामकाज की तारीफ करते रहते हैं.

राहुल का मानना है कि राजनीति में आने वाले लोगों के लिए मीनाक्षी रोल मॉडल हो सकती हैं. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में उन्हें पार्टी के भीतर एक बड़ी भूमिका मिल सकती है.

(यह लेख राजनीतिक विश्लेषक अदिति फडनीस के इनपुट पर आधारित है.)

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