क्या कांग्रेस और भाजपा कमज़ोर पड़ रही हैं?

  • 6 जनवरी 2014
मनमोहन सिंह का रेखाचित्र

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने शासन के लगभग दस सालों में मीडिया को केवल तीन बार संबोधित किया है.

विपक्ष उनकी सरकार को आज़ाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार कहती रही है. तीसरे संवाददाता सम्मेलन में मनमोहन सिंह ने दिल्ली में शुक्रवार को इसके जवाब में सिर्फ़ इतना ही कहा कि विपक्ष के विपरीत इतिहास उनके साथ रहम के साथ पेश आएगा.

(मुसलमान कांग्रेस से नाराज, पर किसके साथ?)

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अर्थशास्त्री की भूमिका निभाते हुए देश की राजनीति में प्रवेश किया था और उन्हें प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी गांधी परिवार की मजबूरी के कारण बाई डिफ़ॉल्ट मिली थी.

मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी कमज़ोरी उनकी ख़ामोशी है. सत्तारूढ़ कांग्रेस अतीत की तरह सामंती अंदाज़ में सरकार चलाती रही है.

भारत के ज़्यादातर राजनीतिक दलों की तरह कांग्रेस भी इस बदले हुए हालात को महसूस नहीं कर पा रही है कि नई पीढ़ी पहले से कहीं ज़्यादा आत्मनिर्भर, समझदार और जागरूक है.

वीआईपी कल्चर

जम्मू में कर्फ्यू का एक दृश्य. (फाइल फोटो.)

आज की पीढ़ी पूरी दुनिया में होने वाले बदलावों को देख रही है और महसूस भी कर रही है. विदेश यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या दुनिया की पहली क़तारों में है. आज हर कोई जवाबदेह ईमानदार और प्रभावी सरकार की ख़वाहिश रखता है.

(मोदी ने चुप्पी तोड़ी)

भारत के सियासी जमात अभी तक एक वीआईपी कल्चर को बढ़ावा देते रहे हैं. सरकार का मतलब यहां ताक़त, दौलत, रसूख़ और जनता से फ़ासला बनाए रखना है. सियासत यहां दौलत और ताक़त इकट्ठा करने का ज़रिया बनी हुई थी.

अभी कुछ दिनों पहले तक एक मामूली से मंत्री के गुज़रने के समय सड़कें बंद कर दी जाती थीं. उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात के कई नेता हिंदी फ़िल्मों की खलनायक की तरह लगते रहे हैं. कई बार तो उन्हें बीसियों कमांडोज़ के बीच खोजना पड़ता है.

अभी तक ये सियासतदां एक पैसे का हिसाब दिए बग़ैर जनता की मेहनत की कमाई से इकट्ठा की गई दौलत से अपनी जागीरदारी चला रहे थे.

संसद की कार्यवाही

भारत की संसद

मनमोहन सरकार का अगर विश्लेषण किया जाए तो उनकी तुलना उनकी ख़ामोशी से और एक विचार तो ये भी है कि वे कई बार किसी मूर्ति की तरह लगते हैं. कुछ लोग उन्हें ख़ामोशी और निष्क्रियता की राष्ट्रीय प्रतिमा भी कहते हैं.

(राहत के बाद बढ़ेगी आफत?)

दूसरी ओर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा भी इस तथ्य से पूरी तरह से कटी हुई एक पार्टी है. ऐसा लगता है कि जैसे उसे न अपने सिद्धांतों पर यक़ीन रह गया है और न ही वह आने वाले कल को समझने की क़ाबिलियत रखती है.

पिछले दस सालों में भाजपा ने केवल संसद की कार्यवाही न चलने देने में महारत हासिल की है. उसके पास न कोई कार्यक्रम है और न नीति. लेकिन पार्टी ने इस तथ्य का सही विश्लेषण किया है कि जनता की नज़रों में उसकी स्थिति कांग्रेस से अलग नहीं है.

मनमोहन सिंह सरकार ने पिछले दस साल के शासन में जनता को ख़ुद से बहुत अच्छी तरह बेज़ार किया है. लेकिन दूसरी तरफ़ भाजपा भी ख़ुद को एक कुशल, सक्रिय और भविष्य की पार्टी के रूप में पेश कर पाने में नाकाम रही है.

सियासी बदलाव

केजरीवाल, मोदी, राहुल

मजबूरी में उसे नरेंद्र मोदी जैसे एक क्षेत्रीय नेता को सामने लाना पड़ा जिनका राजनीतिक अतीत इतना विवादास्पद रहा है कि उनका भविष्य शायद इससे शर्मसार हुए बिना न रह सके.

(भाजपा तो जीत गई लेकिन क्या...)

भारत के सभी राजनीतिक दल इस वक़्त एक अनजाने डर से गुज़र रहे हैं. दिल्ली की जनता ने अनिश्चितता के आलम में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को जीत दिलाकर राजनीतिक दलों को एक स्पष्ट संदेश दे दिया है. भारत में अब पहले जैसी सामंती राजनीति नहीं चलेगी.

आम आदमी पार्टी की जीत महज़ प्रतीकात्मक जीत नहीं है. यह सियासी बदलाव की शुरुआत है. मुल्क के सियासी रहनुमाओं और राजनीतिक दलों को अपने कामकाज का तरीक़ा और सोच में बदलाव लाना पड़ेगा.

आनेवाले संसदीय चुनाव भारत के पुराने राजनीतिक दलों का रुख़ और भविष्य में उनका जगह तय करेंगे.

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