जहाँ से आती है बासमती की बयार

  • 3 जनवरी 2014
शिवतराई गाँव के बासमती किसान झाड़ूराम मरावी

शिवतराई गांव के झाड़ूराम मरावी इन दिनों बेहद खुश हैं. उनकी धान की फसल बोरे में बंद हो कर जल्दी ही बाज़ार में पहुंचने वाली है और सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो इस दफ़े उन्हें पहली बार धान की खेती में भरपूर मुनाफ़ा मिलने की उम्मीद है.

(अमर सिंह चावल वाले के यहाँ...)

झाड़ूराम मरावी ने अपने तीन एकड़ खेत में पहली बार बासमती चावल की खेती की है. उनकी ही तरह गांव के 64 से अधिक किसानों ने पहली बार परंपरागत धान के बजाय बासमती बोया है. लेकिन बीज के साथ-साथ खेती में कुछ और भी बदला.

झाड़ूराम मरावी कहते हैं, "हम लोगों ने रासायनिक खाद और कीटनाशक को विदा करने की एक कोशिश की है. हमने अपने खेतों में किसी भी तरह के रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल नहीं किया है और पूरी तरह से हम जैविक खेती कर रहे हैं."

यह सब कुछ तब है, जब छत्तीसगढ़ में रासायनिक खाद का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है. राज्य में ख़रीफ फसल में साल 2000 में प्रति हेक्टेयर 47.19 किलोग्राम खाद का उपयोग होता था जो बढ़ते-बढ़ते 92.39 किलोग्राम तक जा पहुंचा.

प्रतिरोधक क्षमता

बासमती धान

इसी तरह रबी की फसल में साल 2000 में किसान प्रति हेक्टेयर 18.88 किलोग्राम रासायनिक खाद का उपयोग करते थे जो 2011-12 में 121.27 किलोग्राम हो गया.

(खेती की जादूगरी)

लेकिन इसके उलट छत्तीसगढ़ के बिलासपुर ज़िले के कोटा इलाके में इन दिनों किसानों के बीच बदलाव की बयार बह रही है. बयार ऐसी कि जिसकी ज़द में आस पास के कम से कम 45 गांव हैं.

इन गांवों में अधिकांश आदिवासी बहुल हैं जहां खेती में कुछ लोगों ने रासायनिक खाद और कीटनाशक का उपयोग शुरू किया था.

लेकिन गांव के लोग रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग के कारण होने वाली परेशानियों से अनजान नहीं थे.

झाड़ूराम मरावी का दावा है कि तब गांव में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो गई थी और लोग बीमार भी बहुत पड़ते थे. चावल समेत दूसरी फसलों की मिठास खत्म हो गई थी.

जैविक खेती

बासमती उत्पादक किसान झाड़ूराम

इसके बाद गांव में स्वयंसेवी संगठनों से जुड़े कुछ लोगों ने जैविक खेती की शुरुआत की. धीरे-धीरे पड़ोसी गांव के लोगों ने भी जैविक खेती की ओर क़दम बढ़ाये. 45 गांवों में लगभग दो हज़ार किसानों ने मिलकर पौने दो सौ किसान क्लब बनाए हैं और आपस में एक-दूसरे की मदद की शुरुआत हुई.

(एक गाँव, दो पड़ोसी)

गांव के नौजवान परसराम खुसरो बताते हैं कि चार साल पहले यह सिलसिला शुरू हुआ और इसके बाद से इन गांवों में रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल लगभग खत्म हो गया.

जाहिर है, इसका असर उपज पर भी पड़ा और उपज कम हो गई. इससे निपटने के लिये इस साल किसानों ने पारंपरिक सरना और एचएमटी जैसी किस्मों के बजाय बासमती की किस्म लगाई.

हालांकि आम तौर पर खेतों में प्रति एकड़ 10 से 15 क्विंटल धान उपजता था लेकिन इस बार बासमती की उपज प्रति एकड़ साढ़े तीन क्विंटल है.

गांव के संतकुमार मेश्राम का कहना है, "उपज कम होने पर भी इसकी क़ीमत अधिक मिलेगी. सरना जैसा पारंपरिक धान 10 रुपए किलो बिकता रहा है लेकिन बासमती 40 रुपए किलो और बीज के लिये 150 रुपये किलो में बिकेगी."

जैव संतुलन

धान की फसल

इसके लिये गांव के लोग स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ संपर्क में हैं.

(राजस्थान में जैविक खेती)

बिलासपुर ज़िले के कृषि उपसंचालक चिरंजीव सरकार कहते हैं, "कोटा इलाके के इन 45 गांवों के किसानों ने आधुनिक संतुलित खेती की पहल तो ख़ुद ही की है. हमारा कृषि विभाग अब इनकी मदद कर रहा है. आप कह सकते हैं कि किसानों ने एक क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत की है."

हालांकि राज्य सरकार के छत्तीसगढ़ कृषक कल्याण परिषद के सदस्य प्रदीप शर्मा का मानना है कि किसानों को लाभान्वित करने के लिये राज्य सरकार को इन सभी किसानों के उत्पाद को अभिप्रमाणित करना चाहिए. इसके अलावा बीज विकास निगम को इनके उत्पाद की बिक्री के लिये भी अविलंब उचित क़दम उठाना चाहिए.

प्रदीप कहते हैं, "जंगलों के आसपास बसे गांवों में बासमती का उत्पादन न केवल जैव संतुलन को समृद्ध करता है बल्कि यह उसे संवर्धित करने का काम भी करता है, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में बेहद कारगर है."

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