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देशज भाषा का कार्टूनिस्ट पवन

 सोमवार, 30 दिसंबर, 2013 को 12:00 IST तक के समाचार

''कार्टून की समझ तो अंग्रेज़ी समझने वालों को ही होती है. हिंदी में कार्टून बन ही नहीं सकते.''

ये वो बात थी जिसने बिहार के जाने माने कार्टूनिस्ट पवन टून को प्रेरित किया कुछ ऐसा करने के लिए जिससे वो अपनी अलग पहचान बना सकें.

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बीबीसी स्टूडियो में बातचीत करते हुए पवन भावुक हो जाते हैं. वो कहते हैं, "मैंने शुरुआत ही की थी करियर की. दिल्ली आया था लोगों से मिल रहा था तो किसी ने ये बात कही थी. तब पूरी रात जागा रहा. सोचता रहा क्या करुं. अंग्रेज़ी सीखूं. कार्टून बनाऊं या नहीं. फिर तय किया कुछ ऐसा करूं कि लोग हिंदी में भी कार्टून पढ़ें समझें.’’

वो दिन और आज का दिन है. पवन बिहार के सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्टों में शुमार होते हैं और कहते हैं कि अख़बार उनके कार्टूनों की वजह से बिकता है.

लेकिन आख़िर ऐसा क्या करते हैं पवन अपने कार्टूनों में.

पवन कहते हैं, "मैं बीस सालों से कार्टून बना रहा हूं लेकिन बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों में हमने एक प्रयोग किया कि देशज भाषा या कहिए कि जैसे लोग बात करते हैं, उस भाषा का प्रयोग किया कार्टून में और एक कहानी कहने की कोशिश की. ये बात बड़ी मक़बूल हुई लोगों के बीच.’’

पवन के कार्टून आम जन की भाषा बोलते प्रतीत होते हैं. आलोचक पवन के कार्टूनों को भदेस और थोड़ा अश्लील भी मानते हैं लेकिन राजनीति और समाज पर बनाए उनके कार्टून अब कॉलेजों के सिलेबस का हिस्सा बन रहे हैं.

पवन बताते हैं, "कुछ दिन पहले टेक्सास यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर का ईमेल आया कि मेरे 48 कार्टून वहां के सिलेबस में शामिल किए जा रहे हैं जिसके ज़रिए भारत की राजनीतिक सामाजिक समझ को विस्तार दिया जाएगा. मुझे पता भी नहीं कि कौन से 48 कार्टून शामिल हैं. लेकिन ये जानकर अच्छा लगा.’’

कार्टूनों की प्रेरणा के लिए पवन क्या करते हैं. ये सवाल सुनते ही पवन के चेहरे पर मुस्कुराहट तिरती है और वो कहते हैं, "मैं बच्चों के बिना नहीं रह सकता. वो ही मेरी प्रेरणा होते हैं."

लेकिन कैसे?

वो बताते हैं, "मैं पिछले कई सालों से एक कार्यक्रम चलाता हूं पेन एंड पेंसिल. अपने पैसे से पेन पेपर पेंसिल लेकर बिहार के आसपास बच्चों में चला जाता हूं. उनसे कहता हूं वो ड्राईंग बनाए. उससे कई रोचक बातें पता चलती हैं.’’

जैसे?

"जैसे, अभी दो दिन पहले जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में बच्चों के साथ कार्टून सेशन चल रहा था तो एक बच्ची ने कार्टून बनाया जिसमें एक आदमी के दो हाथ थे जिसमें एक बहुत लंबा था. मैंने पूछा कि दोनों हाथ तो बराबर होते हैं तो ये लंबा क्यों है तो बच्चे ने जवाब दिया- सर ये क़ानून का हाथ है.’’

पवन टून

पवन के पास ऐसे कई अनुभव हैं जिन्हें वो कार्टूनों में पिरोते हैं और शायद यही कारण है कि उनके कार्टून अत्यंत लोकप्रिय हैं.

बिहार और उत्तर भारत में कार्टूनिस्टों की लंबी परंपरा नहीं रही है. पवन के अनुसार जब उन्होंने शुरुआत कि तो कोई ऐसा नहीं था जिससे वो सीख पाते. सीखने के लिए उन्हें दिल्ली आना पड़ता लेकिन अब धीरे धीरे कई लोग कार्टून बना रहे हैं और इस दिशा में करियर बनाने को प्रेरित भी हो रहे हैं.

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