मुज़फ्फ़रनगर: 'सरकार चाहती है हम मर जाएं, तब देगी मुआवज़ा'

  • 25 दिसंबर 2013

दिल्ली से मुज़फ्फरनगर पहुंचने तक एक सवाल दिमाग़ में बार-बार उठ रहा था. इतनी ठंड में लोग बिना छत के गुज़ारा कैसे कर रहे होंगे?

जब हमने मुज़फ्फरनगर के कैंपों में क़दम रखा तब दोपहर हो चुकी थी लेकिन कोहरे की चादर छटी नहीं थी.

शिविर में हमें नाकाफ़ी कपड़ों में ठिठुरते बूढ़े, बच्चे और महिलाएं और चाय की प्यालियां हाथों में लिए आग के सहारे सिकुड़े हुए मर्द नज़र आए. किसी के तन पर कंबल नज़र आया तो कोई अंगीठी के पास बैठा ख़ुद को राहत देने की कोशिश कर रहा था.

एक प्लास्टिक की तिकोनी झुग्गी में रहने की तकलीफ़ के बावजूद भी लोग वापिस जाने को तैयार नहीं. इसकी वजह क्या है?

मुज़फ्फरनगर के बस्सी कलां और लोई कैंप के अलावा नज़दीकी ज़िले शामली के मलकपुर में भी सैकड़ों लोगों से यही सुना कि ‘’हम मर जाएंगे लेकिन वापिस नहीं जाएंगे.’’

मुआवज़े की मांग

ये पूछना लाज़मी था कि अगर वापिस नहीं जाएंगे तो ज़िदगी कैसे चलेगी. अधेड़ उम्र के एक आदमी से मैंने यही सवाल पूछा कि आप नहीं जाएंगे तो आगे के बारे में क्या सोचा है, खाना-पीना, कपड़े कहां से आएंगे?

जवाब मिला, ‘‘अब सरकार हमें कुछ दे देगी तो हम कुछ कर लेंगे. अपना घर बना लेंगे. घर की परेशानी है.’’

बिना ज़मीन पर कुछ बिछाए अपने दो बच्चों को संभालती एक निराश मां का कहना था जिन लोगों को पांच-पांच लाख मिल गए हैं उन्होंने तो अपना घर बना लिया. जिन्हें कुछ नहीं मिला वो क्या करें? क्या से बच्चों को खाना खिलाएं और कहां से कपड़े पहनाएंगे?

हर कैंप में लोग सामान्य रूप से एक ही मांग कर रहे हैं कि वो दंगा प्रभावित हैं और इसलिए उन्हें मुआवज़ा मिलना ही चाहिए. ख़ासकर बस्सी कलां कैंप में ज़्यादातर लोग दुलेहड़ा गांव से आए. लोगों का कहना था कि अगर वो भागते नहीं तो ज़िंदा भी नहीं बचते लेकिन अब वो काफ़ी ग़ुस्से में हैं क्योंकि सरकार उन्हें मुआवज़े के लिए उपयुक्त नहीं मान रही है.

बेहद उत्तेजित स्वर में एक आदमी ने हमारे नज़दीक आकर कहा, दुलेहड़ा के लोग जान बचाकर भाग आए क्या इसलिए उन्हें कुछ नहीं मिलेगा?

वो कहते हैं कि 'सेना ने हमें बाहर निकाल लिया और अब दुलेहड़ा गांव के लोग वापिस नहीं जाना चाहते तो क्या उन्हें क्लेम नहीं मिलना चाहिए. वहां पर कट जाते तभी मिलता क्या?'

इन्ही शब्दों को दोहराती एक महिला का कहना था सरकार चाहती है हम मर जाएं तभी मुआवज़ा मिलेगा. ऐसे कुछ नहीं मिलेगा किसी को.

प्रतिक्रिया

कुछ लोगों ने दबे सुर में ये भी कहा कि जिनके पैसे आ भी गए हैं वो बैंक से निकाल नहीं सकते, ऐसा प्रशासन का आदेश है.

लेकिन मुआवज़ा की इस मांग का असर इन लोगों के गांवों में दिखाई ना दे रहा हो ऐसा नहीं है.

बस्सी कलां के नज़दीकी गांव कुटबां से बहुत सारे मुसलमान अपना घर छोड़कर चले गए. ये जानना ज़रूरी था कि यहां रहने वाला जाट समुदाय मुज़फ्फरनगर के इस वक्त के हालात पर क्या सोचता है और जो आरोप उस पर लग रहे हैं उन पर वे क्या कहते हैं ?

गांव के प्रधान ने तो अपनी बंदिशें ज़ाहिर करते हुए ऑन रिकॉर्ड बात करने से मना किया हालांकि चाय पर हुई बातचीत में उन्होने खुलकर कहा कि ताली एक हाथ से तो नहीं बजती.

धर्मेंद्र नाम के एक व्यक्ति ने अपना पक्ष रखने की हिम्मत की और बोले, वो उजड़े हैं तो क्या गांव नहीं उजड़ा, हम नहीं उजड़े. मुआवज़े के लालच ने इन लोगों को वहां पर रोक रखा है.

एक बूढ़े शख़्स जो चारपाई पर नज़दीक में बैठे तो काफ़ी भड़के हुए से दिखे.

उनका कहना था, जब उन्हें वहां खर्चा मिल रहा है, पहनने को मिल रहा है, पैसे मिल रहे हैं तो वो यहां क्यों आएंगे. ये तो सरकार को देखना चाहिए. हमारे गांव के तो सब वापिस हो लिए. आदमी, औरतें, बच्चे सब आ गए.

प्रशासन की गले की हड्डी

मुआवज़ा देने के फ़ैसले को समस्या के तुरत-फुरत हल के तौर पर देखा गया होगा लेकिन शायद पैसे देने की कसौटी ना तो लोगों को समझ में आई और प्रशासन ने उसे खोलकर रखने की ज़रूरत महसूस की.

नतीजा लोगों के अंदर इस बात का गहरा रोष की सरकार उनकी अनदेखी क्यों कर रही है.

मुज़फ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एच एन सिंह के दफ़्तर पहुंचकर मैंने यही सवाल रखा कि मुआवज़ा देने में लेकर क्या कमी रह गई है और उनकी कसौटी इसे लेकर क्या है.

पुलिस अधीक्षक का कहना था कि जो लोग मुआवज़े के लिए जायज़ तौर पर हक़दार थे उन्हें दे दिया गया है. शिकायतें आई हैं और दोबारा सर्वे कराया जा रहा है. इसकी ज़्यादा जानकारी जिलाधिकारी से मिल जाएगी.

गेंद डीएम कौशल राज शर्मा के पाले में आई तो बगल में उनके दफ़्तर पहुंचे लेकिन मुलाक़ात तीन घंटे बाद उनके आवास पर हुई.

लोग मुआवज़े को लेकर जो ख़्याल रखते हैं उसे देखकर क्या उन्हें लगता है कि ये उनके प्रशासन के लिए बहुत बड़ी मुश्किल बन चुका है?

इस सवाल के जवाब में कौशल राज का कहना था, ‘‘मुश्किल इस नज़र से है कि जब हमने सर्वे किया और एक छत व एक रसोई के आधार पर परिवार की परिभाषा के तहत लोगों को चिन्हित किया तब तक कोई परेशानी नहीं थी. 900 परिवारों को हमने प्रभावित माना और 861 को बहुत बेहतर ढंग से मुआवज़ा दिया गया लेकिन बाद में 925 और अर्ज़ियां आ गईं कि वो भी मुआवज़े के हक़दार हैं.’’

कौशल राज मूल समस्या की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि ‘‘जिन परिवारों को आर्थिक सहायता मिल गई वो तो अपना घर बनाने की प्रक्रिया में हैं लेकिन इन्हीं परिवारों के शादी-शुदा लोग ख़ुद को अलग परिवार मान कर पैसे की मांग कर रहे हैं. जब गांव में इतने मकान ही नहीं हैं तो उन्हें अलग परिवार कैसे मान लिया जाए. ये मांग अनुचित है. जिसने भी इन लोगों को ये समझाया है कि इस तरह से प्रशासन पर दबाव डाला जा सकता है, वह बहुत ग़लत है. ना तो ये संभव है, ना अच्छा है.’’

प्रशासन जिन बातों को क़ानून, नियम और न्याय की परिभाषा में बांधकर देख रहा है, वो शायद लोगों की समझ से परे है क्योंकि उनके सामने फ़िलहाल चुनौती है उस सबको समेट कर ज़िंदगी वापिस पटरी पर लाने की. ये होगा कैसे?

इस सवाल का कोई ठोस जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है.

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