'आप' का ख़्याल और आगे का हाल

  • 25 दिसंबर 2013
अरविंद केजरीवाल

आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली में जो स्थिति बनी है उससे ये लगता है जैसे दो किरदारों ने अपने साझा दुश्मन पर बंदूक तानी हुई है, उनके साझा दुश्मन के हाथ में भी बंदूक है जिसे उसने उन दोनों पर तान रखा है.

फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि कांग्रेस और बीजेपी की बंदूकें खाली हैं जबकि 'आप' की बंदूक भरी हुई है. हालांकि उन्हें शायद नहीं पता कि दूश्मन की बंदूकें खाली हैं. लेकिन आप आत्मविश्वास से भरा है क्योंकि उसे मालूम है कि उसकी उंगली ट्रिगर पर है.

लेकिन दोनों पुराने घाघ जानते हैं कि उनकी बंदूकें खाली हैं और उनके साझा दुश्मन के पास भरी हुई बंदूक है. वे डरे हुए हैं.

दिल्ली की राजनीति में जो ड्रामा हो रहा है उस पर एक राजनीतिक थ्रिलर लिखा जा सकता है.

(तीखे तीर कर रहे हैं 'आप' का इंतजार)

परंपरागत रूप से हमेशा से ये दो घाघ एक दूसरे के ख़िलाफ़ मैदान में उतरते रहे थे और अच्छी तरह जानते थे कि उनमें से एक की जीत होनी तय है.

लेकिन अब उनके इस दोतरफ़ा खेल में एक घुसपैठिया आ गया है. यह उनका साझा दुश्मन है और राजनीति के क़ायदे बदलकर उनकी राजनीतिक खेल बिगाड़ने पर आमादा है.

आगे की राह

आम आदमी पार्टी

शायद आने वाले हफ़्तों और महीनों में दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में यही कुछ होने जा रहा है.

ऐसा लगता है कि कांग्रेस और भाजपा अपने नए नवेले राजनीतिक दुश्मन आप पर निशाना साधने का कोई मौक़ा नहीं गंवाना चाहेंगी. लेकिन उनकी खाली बंदूकें आप का कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी.

एक साल पुरानी पार्टी आप पूरी आक्रामकता के साथ शासन चलाएगी और जब-तब अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. यही एक तरीक़ा है जिससे आप अपना अस्तित्व बनाए रखेगी और आगे भी बढ़ेगी.

(दिल्ली में बनेगी 'आप' की सरकार)

पार्टी को भ्रष्ट अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होगी. इसी से 'आप' का राजनीतिक फ़ायदा होगा.

कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में रखने के लिए 'आप' दिल्ली में उसकी सरकार के 'अनैतिक और भ्रष्ट कारनामों' को उजागर करेगी. पिछली सरकार के कार्यकाल में विभिन्न विभागों में हुए कथित भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों की जाँच के लिए समितियां गठित करेगी. इस क़दमों से जनता में 'आप' की लोकप्रियता बढ़ेगी.

आम आदमी

शीला दीक्षित

हर बड़े मुद्दे पर 'आप' जनता के बीच जाएगी. पार्टी का यह मंत्र पहले ही सफल हो चुका है. अब उसकी कोशिश यह साबित करना होगा कि दिल्ली में आम आदमी सरकार चला रहा है, पार्टी नहीं.

अगर पार्टी इस मूलमंत्र पर चली तो उसके राजनीतिक विरोधी भी एक लोकप्रिय सरकार को अस्थिर करने या हटाने की हिमाकत नहीं कर सकेंगे.

दोनों परंपरागत पार्टियां अच्छी तरह जानती हैं कि अगर उन्होंने 'आप' की सरकार के साथ कुछ भी गड़बड़ी करने की कोशिश की तो इसका खामियाजा उसे अगले साल होने वाले आम चुनावों में उठाना पड़ेगा और यह नुकसान दिल्ली की गद्दी गंवाने से बड़ा होगा.

(आप के फ़ैसले से चढ़ा दिल्ली का राजनीतिक बुखार)

'आप' के विरोधियों की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उन्होंने इस पार्टी को बहुत गंभीरता से नहीं लिया. तमाम विश्लेषकों ने भी इस पार्टी को हल्के में लिया.

ये पार्टियां अब भी केजरीवाल और उनके साथियों को राजनीति के नौसीखियों की तरह ले रही हैं. 'आप' पर उनकी प्रतिक्रिया से इस बात को साफ़ समझा जा सकता है.

उनका कहना है कि 'आप' की सरकार अपने आप गिर जाएगी क्योंकि वह अपने चुनावी वादों को पूरा नहीं कर पाएगी. हाल तक आप की खिल्ली उड़ाने वाला मीडिया भी अब आप को उसके चुनावी वादे याद दिलाने में अपनी ऊर्जा लगा रहा है.

आशंका

हर्षवर्द्धन

मुझे आशंका है कि 'आप' अपने अधिकांश चुनावी वादे पूरे नहीं कर पाएगी. बराक ओबामा ने जब साल 2009 में अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था तो उन्होंने जनता से गुआंतानामो बे जेल को बंद करने का वादा किया था. वह अपना वादा पूरा नहीं कर पाए लेकिन फिर भी उन्होंने चार साल बाद फिर चुनाव जीता.

उदाहरण के लिए केजरीवाल दिल्ली में बिजली के दाम आधे करने की कोशिश करेंगे. इसके लिए दिल्ली सरकार को कुछ सौ करोड़ रुपयों की ज़रूरत पड़ेगी.

मुख्यमंत्री होने के नाते केजरीवाल केन्द्र सरकार से वित्तीय मदद मांगेंगे. क्या केन्द्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार इससे मना कर सकती है?

क्या कोई भी उस आदमी के ख़िलाफ़ जाने की हिमाकत कर सकता है जो लाल बत्ती और सुरक्षाकर्मियों के बिना शहर में घूमेगा? क्या कोई भी उस व्यक्ति को मना करने का जोखिम मोल ले सकता है जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है? ख़ासकर तब कि जब आम चुनाव इतने क़रीब हों.

(आप क्या इन पाँच वादों को पूरा कर पाएगी?)

केजरीवाल की बंदूक भरी हुई है और वह हर समय अपनी उंगली ट्रिगर रखकर सरकार चलाएंगे. शायद वह अपने सभी चुनावी वादों को पूरा करने में कामयाब नहीं होंगे लेकिन उनकी सरकार देश में और अधिक लोगों के दिल और दिमाग जीतने में सफल रहेगी और आम चुनावों में 'आप' को इसका बहुत फ़ायदा मिलेगा.

इस पूरे परिदृश्य में दो किरदार जो अब भी इस आदमी (केजरीवाल) और उसकी गैरपरंपरागत राजनीति को समझने की कोशिश कर रहे हैं, अपनी बंदूकों को उस पर ताने रहेंगे. लेकिन उन्हें इसका कोई फ़ायदा नहीं होगा. क्योंकि आप खाली बंदूक से गोली नहीं चला सकते हैं.

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