भारत और अमरीका: खंडित दोस्ती का इतिहास

  • 18 दिसंबर 2013

न्यूयॉर्क में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ़्तारी और कथित तौर पर उनसे दुर्व्यवाहर से भारत और अमरीका बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई है. इससे पहले भी कई ऐसे मौक़े आए हैं.

दोनों देशों के संबंधों में सबसे अधिक तल्ख़ी 1971 के दौरान देखने को मिली जब अमरीका ने घोषित तौर पर बांग्लादेश युद्ध के दौरान पाकिस्तान का साथ देने का फ़ैसला किया.

पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब 'व्हाइट हाउज़ इयर्स' में अमरीका के इस फ़ैसले को ‘फ़ेमस टिल्ट’ की संज्ञा दी.

शायद अमरीका के इस झुकाव की नींव 1969 में रख दी गई थी जब अमरीका राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन एक दिन के भारत दौरे पर दिल्ली आए थे.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें भोज पर आमंत्रित न कर चाय पर बुलाया और उस दौरान भी उन दोनों के बीच की केमिस्ट्री कुछ ख़ास नहीं थी.

निक्सन को रात के भोज पर केंद्रीय मंत्री मोरारजी देसाई ने बुलाया था और मोरारजी देसाई कम से कम एक अच्छे मेहमाननव़ाज़ के तौर पर कभी भी नहीं जाने जाते थे.

एक दिन भारत में रुकने के बाद निक्सन पाकिस्तान गए थे जहाँ सैनिक तानाशाह जनरल याहिया ख़ाँ ने उन्हें सिर आँखों पर बैठाया था और तभी से निक्सन ने भारत के खिलाफ़ पूर्वाग्रह बना लिया था.

इससे पहले निक्सन 1967 में एक सामान्य नागरिक के तौर पर दिल्ली आए थे. तब भी निक्सन के साथ बातचीत शुरू होने के बीस मिनटों के अंदर इंदिरा गाँधी ने निक्सन के साथ आए विदेश मंत्रालय के अधिकारी से हिंदी में पूछा था कि मुझे इन्हें कब तक झेलना होगा. (डेनेस कक्स, एसट्रेंज्ड डेमोक्रेसीज़).

स्वाभिमानी इंदिरा

बांग्लादेश युद्ध से दो महीने पहले जब इंदिरा गाँधी अमरीका गई थीं तो निक्सन ने इंदिरा को मिलने से पहले 45 मिनट तक इंतज़ार कराया था.

ग़ुस्से में लाल इंदिरा से जब निक्सन की मुलाकात हुई थी तो इंदिरा ने विरोध स्वरूप बांग्लादेश के मुद्दे पर एक शब्द भी बात नहीं की बल्कि उनकी वियतनाम नीति पर उस अंदाज़ में उन्हें लेक्चर दिया था जैसे एक प्रोफ़ेसर अपने विद्यार्थी को समझाता है. ( हेनरी किसिंजर, आर्ट ऑफ़ डिप्लोमेसी).

इस बातचीत के बाद निक्सन और किसिंजर ने खुल कर इंदिरा गांधी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. बाद में किसिंजर ने तो इसके लिए माफ़ी भी मांगी लेकिन निक्सन ने इसके लिए कोई अफ़सोस नहीं प्रकट किया.

गेहूं खरीदने का नाता

इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन के ज़माने भी जब भारत ने वियतनाम में अमरीका द्वारा नापाम बम इस्तेमाल दिए जाने की निंदा की तो अमरीका नाराज़ हो गया.

जब तत्कालीन भारतीय राजदूत बीके नेहरू ने कहा कि भारत वही कह रहा है जो संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ऊ थाँ और पोप ने कहा है तो अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के टिप्पणी थी,’ये दोनों आप की तरह हमसे गेहूँ नहीं ख़रीद रहे हैं.’

शायद इस टिप्पणी का ही नतीजा था कि भारत ने युद्ध स्तर पर अनाज के मामले में आत्मनिर्भर होने का बीड़ा उठाया और यहाँ पर हरित क्रांति की नींव रखी गई.

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