भारतीय राजनयिकों के ठाट और नौकरानियों का हाल

  • 18 दिसंबर 2013
न्ययूॉर्क में भारतीय वाणिज्य दूतावास

मैं अमरीका और ब्रिटेन सहित कई देशों में भारतीय राजनयिकों के घर गया हूँ. मेरे दिमाग़ में उनकी एक स्थायी छवि ये है कि उनका रहन सहन जो विदेश में रहने वाले औसत भारतीयों से कहीं बेहतर है.

लंदन में एक राजनयिक के घर जाने के बाद मुझे लगा कि भारत सरकार इन अफ़सरों को कितनी सुविधाएं देती है.

वो घर शहर के महंगे रिहाइशी इलाक़े में था और वो घर इतना बड़ा था कि उसमें उनका परिवार ही नहीं, उनका पूरा कुनबा रह सकता था. और हाँ, सभी के घरों में नौकरानियां भी काम करती नज़र आईं.

जब मैं राष्ट्रपति भवन को देखता हूँ तो लगता है ये पैसे की बर्बादी है. राष्ट्रपति का एक छोटा सा परिवार इतने बड़े महल में रहता है, क्यों न इसे एक पांच सितारा होटल में बदल दिया जाए और राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री जैसे एक घर में जगह दी जाए.

ठीक इसी तरह का ख्याल आता था, जब मैं इन भारतीय राजनयिकों के घरों पर जाता था.

'बढ़िया रहन सहन का हक'

तीन साल पहले मैंने वॉशिंगटन में एक भारतीय राजनयिक के घर पर अपने विचार प्रकट किए. मैं उनकी दावत पर उनके घर गया था. इस अवसर पर उन्होंने कुछ अमरीकी पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को भी बुलाया था.

उनके सामने अपने विचार रखने की हिम्मत इसलिए हुई क्योंकि वो एक बड़े अफसर थे लेकिन इसके बावजूद उनके घर पर कोई भारतीय नौकरानी नहीं थी.

उनका कहना था वो और उनकी पत्नी भारत से नौकरानी लाने के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि वो इस देश में न्यूनतम मज़दूरी देने के योग्य भी नहीं हैं. लेकिन उन्होंने ये ज़रूर स्पष्ट किया कि एक राजनयिक अपने देश का प्रतिनिधि होता है इसलिए उसका रहन सहन बढ़िया होना चाहिए.

शायद उनकी बात में दम हो लेकिन भारत से लाई गई नौकरानी इस शान और शौकत का हिस्सा कैसे हो सकती है. उससे कम दिहाड़ी पर प्रति दिन आठ घंटे से अधिक काम कराना बढ़िया रहन सहन का हिस्सा कैसे हो सकता है?

देवयानी के पिता उत्तम खोबरागड़े
देवयानी के पिता उत्तम खोबरागड़े सरकार से अपनी बेटी की मदद की गुहार लगाई है

न्यूनतम मज़दूरी से कम पैसे में काम कराना और उसके लिए वीज़ा हासिल करने के लिए अमरीकी प्रशासन को धोखा देना, यही इलज़ाम है न्यूयॉर्क में भारत की देवयानी खोबरागड़े के ख़िलाफ़ और इसी कारण उन्हें गिरफ़्तार किया गया.

लेकिन उनकी गिरफ़्तारी एक आम अपराधी की तरह किए जाने पर भारत ने अमरीका से कड़ा विरोध किया है. भारत ने बदले में दिल्ली में अमरीकी दूतावास और उनके कर्मचारियों को लेकर जो कदम उठाने का एलान किया है उसके कारण अमरीका पर दबाव बना और अब अमरीकी विदेश विभाग ने भारतीय राजनयिक की गिरफ़्तारी की पूरी प्रक्रिया की जांच के आदेश दिए हैं.

कम हुई गर्मजोशी

खोबरागड़े की गिरफ़्तारी और उनके साथ कथित रूप से हुए दुर्व्यवहार और फिर भारत की तीखी प्रतिक्रिया से जो एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ है, उससे क्या भारत-अमरीका रिश्तों पर कोई फ़र्क़ पड़ेगा?

भारत की स्वतंत्रता के बाद से लेकर 13 पहले अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की ऐतिहासिक भारत यात्रा तक अमरीका का झुकाव पाकिस्तान की तरफ रहा था. क्लिंटन का दौरा भारत और अमरीका के बीच एक नए युग की शुरुआत थी.

ये रिश्ता उस समय चरम सीमा पर पहुँच गया जब क्लिंटन के दौरे के छह साल बाद राष्ट्रपति जॉर्ज बुश भारत आए. दोनों देशों के बीच हुए परमाणु समझौते के बाद भारत परमाणु अलगाव से बाहर निकल पाया. इसके अलावा दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार तेज़ी से फलने फूलने लगा.

लेकिन बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद इस रिश्ते में थोड़ा गर्मजोशी कम हो गई. विशेषज्ञ कहने लगे ओबामा भारत को अमरीका का प्रतिद्वंद्वी समझते हैं इसलिए वो भारत के प्रति थोड़ा सतर्क हैं.

लेकिन दरअसल आबामा के दिलों में भारत के प्रति काफ़ी सम्मान है और इस आलोचना को ग़लत साबित करने के लिए और भारत से व्यापारिक रिश्ते मज़बूत करने के लिए वो तीन साल पहले भारत के दौरे पर आए. उनका भी स्वागत उसी तरह से हुआ जैसे बुश और क्लिंटन का हुआ था.

लेकिन ओबामा के दौरे के समय ही लोग ये सवाल उठा रहे थे कि वो उस तरह का जोश पैदा करने में विफल रहे हैं जैसा बुश ने पैदा किया था.

असल में ओबामा देने से अधिक भारत से लेने आए थे. उन्होंने दस अरब डॉलर का एक बड़ा समझौता भी किया जिससे अमरीका में नौकरी के अवसर बढ़े और जिसे ओबामा ने देश वापस जाकर भुनाया भी.

नहीं आएगी आंच

बराक ओबामा
कई लोग भारत के प्रति ओबामा के नज़रिए को ठंडा मानते हैं

पिछले तीन बरसों में दोनों देशों के बीच व्यपारिक रिश्ते अधिक मज़बूत हुए हैं. आपसी व्यापार 100 अरब डॉलर के आसपास हो गया है. परन्तु सियासी रिश्तों में जोश ठंडा होता दिखाई देता है.

या ये कहें बढ़ते रिश्ते की रफ़्तार थम सी गई है. लेकिन रिश्ते पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ कहते हैं, "हमें हमेशा रिश्ते में जोश देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. रिश्ते में स्थिरता आई है अब ये रिश्ता मज़बूत स्तंभ पर टिका है."

मेरे विचार में खोबरागड़े मामले के कारण दोनों देशों के बीच रिश्ते की स्थिरता में कोई आंच नहीं आएगी. कुछ दिनों के लिए मन मुटाव हो सकता है लेकिन ये इतना बड़ा मामला नहीं है कि कई बरसों से बना रिश्ता इससे प्रभावित हो.

हाँ, इस मामले के बाद पैदा होने वाले तूफ़ान के थमने के बाद हो सकता है कि दोनों पक्ष इस रिश्ते में ग़ायब जोश को दोबारा पैदा करने की जोरदार तरीके से कोशिश करें और ये दो बड़ी लोकतंत्रों के लिए कोई बुरा संकेत नहीं है.

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