'मोदी को रोकना सिर्फ़ मुसलमानों की ज़िम्मेदारी नहीं'

  • 18 दिसंबर 2013

''मुसलमानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि इस तूफ़ान को कैसे रोका जाए जिसे बीजेपी ने खड़ा किया है. इस बार बीजेपी ने जो रवैया इख़्तियार किया है, वो नौजवानों के दिलों में ये बात डाल रही है कि मोदी एक ऐसा शख़्स है जिसने मुसलमानों को दुरुस्त किया है. मियां लोगों को मोदी ही दुरुस्त कर सकता है. बीजेपी ने ये जो हवा दी है, उससे एक तबक़ा बहुत उत्तेजित है.'' ये कहना है निर्दलीय राज्य सभा सांसद मोहम्मद अदीब का.

मोहम्मद अदीब कहते हैं कि ये बहुत ही अफ़सोसनाक बात है कि 65 वर्षों के बाद भी मुसलमान एक बार नकारात्मक वोटिंग करने के लिए मजबूर है जिससे यूपीए-3 बनने की संभावना बढ़ गई है.

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हो सकता है सांसद अदीब की बातें बहुत जज़्बाती हों, लेकिन इससे भी इनकार करना मुश्किल है कि जब से केंद्र में प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, मुसलमानों के एक बड़े हिस्से में मोदी को लेकर चिंता बनी हुई है.

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लेकिन इस तरह की तमाम अटकलों को ख़ारिज करते हुए बीजेपी का कहना है कि नरेन्द्र मोदी को पूरे देश में सभी तबक़ों का समर्थन हासिल है जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं.

पार्टी प्रवक्ता तरुण विजय कहते हैं, ''मुस्लिम समाज हो, इसाई समाज हो, उनके बीच में हमारे लोग जा रहे हैं, उनके लोग हमारे बीच में आ रहे हैं. बहुत बड़ी संख्या में विभिन्न राज्यों में इस समाज के लोग हमारे साथ जुड़े हैं.''

तरुण विजय के तमाम दावों के बावजूद ज़्यादातर पर्यवेक्षकों और मुसलमानों की राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि पिछले नौ-दस वर्षों से केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए से सख़्त नाराज़गी और निराशा के बावजूद, मोदी का नाम आने से मुसलमान ये सोचने पर मजबूर है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में उसका फ़ैसला क्या होगा.

उर्दू दैनिक जदीद ख़बर के संपादक मासूम मुरादाबादी कहते हैं, ''कोई सच्चा मुसलमान जिसका इंसानियत, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर यक़ीन हो, वो तो मोदी को बिल्कुल भी पसंद नहीं करता है.''

2011 के जनगणना के अनुसार भारत में मुसलमान लगभग 15 फ़ीसदी हैं. मुस्लिम नेता दावा करते हैं कि लगभग 120 सीटों पर मुस्लिम वोटों की निर्णायक भूमिका होती है.

लेकिन कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर मणिपूर तक क्या सभी भारतीय मुसलमान एक जैसा सोचते हैं और एक ही राजनीतिक फ़ैसले करते हैं?

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर अब्दुल वहीद कहते हैं कि दूसरे समुदायों की तरह मुसलमान भी आपस में बंटे हुए हैं और जाति और बिरादरी का असर मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न पर भी उतनी ही होता है हिंदूओं के वोटिंग पैटर्न पर.

सीएसडीएस(सेंटर फ़ॉर द स्टडीज़ ऑफ़ डेवेलपिंग सोसाइटीज़) के ज़रिए किए गए चुनावी सर्वे का हवाला देते हुए जामिया मिलिया इस्लामिया के एसोसियेट प्रोफ़ेसर तनवीर फ़ज़ल कहते हैं कि 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में मुसलमानों ने सपा, कांग्रेस और बसपा तीनों को वोट दिए थे. उसी प्रकार असम में मोटे तौर पर मुसलमानों की पार्टी समझेजानी वाली एयूडीएफ़ को बंग्ला भाषी मुसलमानों का वोट मिलता है जबकि असमिया भाषी मुसलमान ज़्यादातर अपना वोट कांग्रेस या असम गण परिषद को देते हैं.

इसके अलावा जातीय आधार पर भी मुसलमानों के वोट बंटते हैं. प्रोफ़ेसर फ़ज़ल के अनुसार बिहार में नीतीश कुमार ने पसमान्दा(पिछड़ी) मुसलमानों को बहुत हद तक अपनी ओर खींचकर लालू प्रसाद के मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की है.

लिहाज़ा मुस्लिम वोटों का ज़मीनी स्तर पर कितना असर होता है इसका ठीक तरह से आकलन करना शायद मुश्किल है, लेकिन उनकी संख्या को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

बीजेपी को 'बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट'

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर असमर बेग कहते हैं कि बाक़ी पार्टियां मुसलमानों के प्रति पक्षपात कर सकती हैं लेकिन वो खुलेआम मुस्लिम विरोधी तो नहीं हैं, लेकिन बीजेपी जो कि खुलेआम मुसलमानों के ख़िलाफ़ है उसको वोट देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है.

प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं कि यूपीए की नाराज़गी के कारण बीजेपी को इस बार मुसलमानों की तरफ़ से 'बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट' दिया जा सकता था लेकिन मोदी के कारण बीजेपी ने ये मौक़ा खो दिया.

मोदा समर्थक

प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं, ''बीजेपी ने उस इंसान को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है जिनकी मुस्लिम विरोधी छवि के बारे में कोई शक ही नहीं है. उन्होंने जानबूझकर आक्रामक और हिंसक हिंदूत्व को चुना है. इसलिए मेरी समझ से किसी भी हालत में मुसलमानों का वोट बीजेपी या उनके सहयोगियों की तरफ़ जाने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता और कांग्रेस को ही इसका फ़ायदा होगा.''

जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख मौलाना जलालुद्दीन उमरी कहते हैं कि चाहे बीजेपी हज़ार टोपियां या दाढ़ियां बांटे मुसलमान उनकी तरफ़ जाएंगे नहीं और मजबूरी में कांग्रेस या दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को वोट देंगे.

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दारूल उलूम देवबंद(वक़्फ़) के प्रमुख मौलाना सालिम क़ासमी कहते हैं, ''2014 में यूपीए से निराशा का असर ज़रूर पड़ेगा लेकिन मुसलमानों के ज़हनों पर ये सवाल ज़्यादा अहमियत रखता है कि यूपीए का विकल्प क्या है. लिहाज़ा ये चिंता वो है जिस कारण वो(मुसलमान) उन तमाम कमियों को नज़रअंदाज़ करते हुए फिर यूपीए की तरफ़ जाएगा.''

कांग्रेस भी शायद इन्हीं कारणों से मुसलमानों के वोट दोबारा मिलने की उम्मीद लगाए बैठी है.

'धर्मनिरपेक्षता बनाम हिंदू राष्ट्र'

केंद्र में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के रहमान ख़ान कहते हैं, ''हिंदुस्तान में दो बड़ी पार्टियां हैं. आप कांग्रेस को कितना भी बदनाम कीजिए लेकिन ये धर्मनिरपेक्षता और प्रजातंत्र के मूल्यों पर आधारित है. दूसरी बड़ी पार्टी है जो धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ़ है. मुसलमानों को ये तय करना है कि वो धर्मनिरपेक्ष देश चाहते हैं या हिंदू राष्ट्र.''

रहमान ख़ान कहते हैं कि कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए कुछ किया या नहीं, ये एक बहस का विषय है और सिर्फ़ कुछ लोगों के कह देने भर से वो इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि कांग्रेस ने कुछ नहीं किया.

गुजरात दंगे

बीजेपी, कांग्रेस के इन आरोपों को नकारते हुए उलटे कांग्रेस पर ही सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाती है.

बीजेपी प्रवक्ता तरुण विजय कहते हैं, ''कांग्रेस हिंदुस्तान में सांप्रदायिक नफ़रत और भेद-भाव को बढ़ाते हुए इतने साल तक ग़रीबी और भ्रष्टाचार को बढ़ाती रही. इससे न मुसलमानों को तरक़्क़ी मिली, न हिंदूओं को मिली न किसी अन्य वर्ग को मिली और केवल आपस में नफ़रत बढ़ाते रहे. हम इस नफ़रत की दीवार को तोड़कर हर एक हिंदुस्तानी के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना चाहते हैं.''

तरुण विजय की ऐसी सोच सुनने में ज़रूर बहुत अच्छी लगती है लेकिन भारत में मुसलमानों के सबसे बड़े धार्मिक संगठन जमीयतुल-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव महमूद मदनी शायद उनपर विश्वास नहीं करते.

मोदी को नकारते हुए महमूद मदनी कहते हैं, ''मोदी कभी मुसलमानों के लिए विकल्प नहीं हो सकते. लेकिन इस वजह से वोट फ़्री में कांग्रेस को दे दिया जाए, मुसलमानों के मामलों पर बात किए बग़ैर. ये बताएं तो इन्होंने दस सालों में कुछ क्यों नहीं किया और नहीं किया तो इसके लिए माफ़ी तो मांगें.''

लेकिन ये पूछे जाने पर कि मोदी को रोकने के लिए जमीयत या दूसरी संस्थाएं क्या नीति अपना रही हैं महमूद मदनी कहते हैं, ''इस जवाब के आ जाने से ये सुकून की सांस ले लेंगे कि ये तो ख़ाली बस बंदर भभकी दे रहे हैं. नहीं कोई बंदर भभकी नहीं है, जब वक़्त आएगा, तब देखेंगे.''

महमूद मदनी भले ही किसी नीति के तहत ये साफ़ तौर पर कहने के लिए तैयार नहीं हैं कि फ़िलहाल उनकी प्राथमिकता मोदी को रोकना है या कांग्रेस से नाराज़गी के कारण उसे सबक़ सिखाना लेकिन कई दूसरी मुस्लिम संस्थाएं बिल्कुल स्पष्ट हैं कि उन्हें क्या करना है.

तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि मोदी के आने के ख़ौफ़ से मुसलमान फिर कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियों को ही वोट देने के लिए मजबूर होगा.

इस सवाल का कुछ हद तक जवाब ढूंढते हुए 'ज़कात फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया' नामक एनजीओ चलाने वाले सेवानिवृत्त आयकर आयुक्त ज़फ़र महमूद कहते हैं कि अभी चुनाव में कुछ समय बाक़ी है और कांग्रेस के पास मौक़ा है कुछ करने का.

विकल्प की तलाश

ज़फ़र महमूद कहते हैं, ''ये बात बिल्कुल सही है कि मोदी को रोकने की कोशिश मुसलमान करेगा और कामयाब भी होगा. लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि यूपीए के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. लेकिन अभी हमारे पास कुछ महीने हैं.''

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मुज़फ़्फ़रनगर दंगे

उन्होंने कहा कि उनकी संस्था ने कुछ मुस्लिम तंज़ीमों से बातचीत करने के बाद यूपीए सरकार से 20 मांगों की एक फ़ेहरिस्त दी है जिसमें सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमीशन की तमाम सिफ़ारिशात को लागू करने के अलावा सांप्रदायिक हिंसा विरोधी बिल को जल्द से जल्द पास कराने की मांग शामिल है.

ग़ौरतलब है कि रंगनाथ मिश्रा कमीशन का गठन यूपीए सरकार ने ही किया था जिसने मुसलमानों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने की सिफ़ारिश की है. लकिन यूपीए सरकार ने कमीशन की सिफ़ारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती कहती हैं, ''मोदी खुलकर चुनवा प्रचार कर रहे हैं, इससे ध्रुवीकरण की स्थिति तो बनी है लेकिन बीजेपी 300 से ज़्यादा सीटों पर तो कहीं रेस में ही नहीं है हालांकि वे लोग 380 सीट कहते हैं. ये भी देखना होगा कि केरल का मुसलमान, यूपी, बिहार या असम का मुस्लिम क्या सोच रहा है. मोदी एक बहुत बड़ा फ़ैक्टर है लेकिन ये समझना ग़लत होगा कि अब कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं है.''

सीमा चिश्ती के अनुसार, ''ये सोचना कि अगर एक हिंदू दक्षिणपंथी पार्टी बहुत खुलकर आक्रामक प्रचार करती है तो मुसलमान कांग्रेस की ही तरफ़ भागेगा, हाल की घटनाओं से ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती.''

सीमा कहती हैं, ''1991 के चुनावों में लालकृष्ण आडवाणी भी बहुत खुलकर हिंदूत्व के नारे के साथ आगे आए थे और 90 के दशक में कांग्रेस लगातार कमज़ोर हो रही थी, फिर भी विकल्प ढूंढे गए.''

इन हालात में मुसलमानों का चुनावी फ़ैसला क्या हो सकता है?

जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख मौलाना जलालुद्दीन उमरी कहते हैं, ''जहां कहीं भी बीजेपी और कांग्रेस का कोई विकल्प है तो मेरा ख़्याल है कि आमतौर पर मुसलमान उस विकल्प को पसंद करेंगे. लेकिन जहां यहीं दो पार्टी हैं तो बीजेपी की तुलना में मुसलमान कांग्रेस को तरजीह देंगे.''

'क्षेत्रीय पार्टियों से बातचीत'

ममता बनर्जी

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर ज़ोया हसन कहती हैं कि हिंदुस्तान की राजनीति आज कल इतनी खंडित है कि उसमें विकल्प बहुत हैं.

वो कहती हैं, ''कई ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी और कांग्रेस में सीधा मुक़ाबला नहीं है. मुसलमानों को कांग्रेस से अपनी नाराज़गी का इज़हार करने के लिए बहुत से राज्यों में मौक़ा है.''

लेकिन क्या वे क्षेत्रीय पार्टियां जो फ़िलहाल भले ही बीजेपी के साथ न हों, चुनाव बाद क्या वो एनडीए में शामिल हो सकती हैं?

इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर ज़ोया हसन कहती हैं कि कुछ एक पार्टियों के साथ तो ये संभव है लेकिन ये तभी होगा अगर बीजेपी अपने बल पर 180 या उससे अधिक सीटें लाने में सफल होती है.

लेकिन इन तमाम तर्कों और समीकरणों से अलग हट कर दारूल उलूम देवबंद के एक अध्यापक शाह आलम कहते हैं कि मोदी को रोकना केवल मुसलमानों की अकेले की ज़िम्मेदारी नहीं है.

शाह आलम कहते हैं, ''ऐसा नहीं कि नरेन्द्र मोदी से सिर्फ़ मुसलमान ही नाराज़ हैं, सेक्यूलर ज़ेहन के हिंदू मोदी से ज़्यादा नाराज़ हैं. मुसलमान और सेक्यूलर ज़ेहन के हिंदू जब दोनों मिलकर इस मसले पर ग़ौर करेंगे तो ये सिर्फ़ नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस का मसला नहीं रह जाएगा, बल्कि मुल्क की तरक़्क़ी का मसला रह जाएगा. मोदी का चेहरा सामने ला-ला कर इसे कांग्रेस बनाम मोदी और मोदी बनाम कांग्रेस न बनाया जाए.''

शाह आलम की बातों में कितना वज़न है और इसका वास्तविक असर कितना होगा ये तो आने वाले वक़्त में या फिर चुनाव के समय ही पता चलेगा, लेकिन मोदी के सामने आने से चुनावी पारा धीरे-धीरे और गर्म होता रहेगा.

(बीबीसी विशेष श्रृंखला की ये पांचवी और अंतिम कड़ी है. आपको ये श्रृंखला कैसी लगी, हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा.)

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