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मंडेला: 'तस्वीर पर लगे प्रतिबंध ने बना दिया महान नेता'

 शनिवार, 7 दिसंबर, 2013 को 17:13 IST तक के समाचार
नेल्सन मंडेला

जेल में बंद नेल्सन मंडेला दुनिया भर में रंगभेद के खिलाफ अभियान का चेहरा बन चुके थे लेकिन दक्षिण अफ्रीका में उनकी तस्वीर पर प्रतिबंध होने के चलते वहां लोग यह नहीं जानते थे कि वह दिखते कैसे हैं.

दक्षिण अफ्रीकी लेखक विलियम गमेड बताते हैं कि इस दौरान वह दक्षिण अफ्रीका में एक मिथकीय किरदार बन गए थे.

नेल्सन मंडेला बेहद शौक से बताते थे कि कैसे 1980 के दशक की शुरुआत में जब वो रॉबेन द्वीप जेल में कैद थे तो एक बार उन्हें वहां से केप टाउन शहर में चिकित्सकीय जांच के लिए ले जाया गया.

उनके जेल के अधिकारियों ने उस दिन उनका एक अनुरोध मान लिया कि चंद मिनटों के लिए उन्हें समुद्र तट पर टहल लेने दिया जाए.

वह 1960 के दशक से जेल में थे और उनकी तस्वीरों के मीडिया में छपने पर प्रतिबंध था, तो बहुत ही कम लोग जानते थे कि उस समय मंडेला कैसे दिखते थे.

उस दिन समुद्र तट पर किसी ने उनकी ओर देखा तक नहीं. मंडेला का कहना था कि उसके बाद वह सोचते रहे कि क्या होता अगर उन्होंने अचानक चिल्लाकर कहा होता, "मैं नेल्सन मंडेला हूँ."

उससे पहले लोगों के मन में नेल्सन मंडेला की जो छवि थी वो 20 साल पुरानी थी. जेल जाने से पहले उनकी अंतिम तस्वीर 1962 में खींची गई थी.

नाम लेना था गुनाह

जेल में उन्हें कुछ लोगों से ही मिलने की इजाजत थी और ये लोग आमतौर पर उनके परिवार के लोग होते थे. जेल से रिहा होने वाले उनके साथी कैदियों ने लोगों को उनका हुलिया बताने की कोशिश की, पर ये पर्याप्त नहीं था.

उस समय सुरक्षा इतनी तगड़ी थी कि कोई भी रॉबेन द्वीप से उनकी नई फोटो तस्करी करके नहीं ला सकता था.

उस समय तक मंडेला का जिक्र पूरी दुनिया में जोर-शोर से हो रहा था लेकिन उनके अपने देश दक्षिण अफ्रीका में उनके विचारों और शिक्षाओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध था.

इन आदेशों को तोड़ने वालों पर भारी जुर्माने का प्रावधान था. उनकी फोटो या उनका जिक्र तक करने वाले को प्रताड़ना से लेकर जेल तक की सजा हो सकती थी.

किताबों पर प्रतिबंध

अगर उन्हें एक आतंकवादी के रूप में चित्रित न किया गया हो, तो उन पर सभी किताबें प्रतिबंधित थीं. मीडिया संगठनों पर भी उनकी खबरें प्रकाशित करने या फोटो का इस्तेमाल करने की मनाही थी.

लेकिन सरकार ने उनकी छवि, उनके शब्दों और उनके नाम को जितना रोकने की कोशिश की, लोगों में उनके प्रति श्रद्धा उतनी ही बढ़ती गई.

सरकार के जरिए लादी गई इस खामोशी के चलते न सिर्फ दक्षिण अफ्रीका बल्कि पूरी दुनिया में रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले इस योद्धा के बारे में जानने के लिए 70 और 80 के दशक में नई पीढ़ी बहुत अधिक उत्सुक हो गई.

1960 के दशक में अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस (एएनसी) पर प्रतिबंध और उनके खिलाफ क्रूर अभियान के कारण एएनसी के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया था.

बढ़ती गई लोकप्रियता

ऐसे में एएनसी की वैश्विक इकाई ने अभियान को गति देने के लिए दुनिया भर में अभियान चलाने का फैसला किया. इस नए अभियान का चेहरा नेल्सन मंडेला को बनाया गया. जेल से उन्हें रिहा करने की मांग रंगभेद विरोधी अभियान का केंद्र बिंदु बन गया.

अगस्त 1962 में उनकी गिरफ्तारी के समय मंडेला एएनसी के शीर्ष नेता नहीं थे. उन्हें एएनसी की दूसरी पंक्ति के नेताओं में गिना जाता था लेकिन इस अभियान ने उन्हें एएनसी का चेहरा बना दिया और जेल में रहने के बावजूद उन्हें संगठन में शीर्ष स्थान हासिल हो गया.

मंडेला की रिहाई का अभियान दुनिया के सर्वाधिक प्रभावी मीडिया अभियानों में गिना जाने लगा. यह सर्वाधिक फैशनेबल अभियानों में भी गिना जाने लगा. दुनिया की कई बड़ी हस्तियाँ इस अभियान में शामिल हो गईं.

महान राजनेता

1980 के दशक की शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका के काले छात्र आन्दोलनकारी भी मंडेला को एक उग्र व्यक्ति के रूप में जानते थे, जिन्होंने एएनसी की सशस्त्र इकाई का गठन किया.

लेकिन बाकी दुनिया में मंडेला की छवि बदल रही थी. उन्हें एक वैश्विक राजनेता के रूप में पहचाना जा रहा था.

रॉबेन द्वीप पर एएनसी के नेतृत्व ने एक नेतृत्व की शृंखला खड़ी करने की कोशिश की जिससे कार्यकर्ताओं का हौसला न टूट जाए क्योंकि बड़े नेता लंबे समय के लिए जेल में बंद थे. इसमें मंडेला के अलावा गोवान एमबेकी भी शामिल थे. एमबेकी थाबो एमबेकी के पिता थे. थाबो बाद में दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति बने थे.

मंडेला और एमबेकी के दोनों के अलावा दो और नेता उस शृंखला में शामिल थे. मंडेला को उस समय प्रवक्ता बनाया गया.

गोवान एमबेकी को जब 1987 में रिहा किया गया तो उन्होंने ये माना कि द्वीप पर कोई ये सोच भी नहीं सकता था कि मंडेला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े नेता हो चुके हैं.

एएनसी में भी नेतृत्व में दो तरह की विचारधाराएँ थीं. एक अफ़्रीकी राष्ट्रवादियों की थी जिसका नेतृत्व मंडेला के पास था तो दूसरे अफ़्रीकी कम्युनिस्ट थे जिनका नेतृत्व एमबेकी के पास था.

एमबेकी के गुट का कहना था कि एएनसी को सैनिक ज़रियों से सत्ता पर कब्ज़ा कर लेना चाहिए, सभी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर देना चाहिए और रंगभेद फैलाने वाले नेताओं पर मुक़दमा चलाकर देश को एक कम्युनिस्ट देश घोषित कर देना चाहिए.

मंडेला और उनका नेतृत्व कहता था कि एएनसी में सभी रंगों, विचारधाराओं और वर्गों को जगह मिलनी चाहिए जिन्होंने रंगभेद के विरुद्ध अभियान में हिस्सा लिया. उन्होंने रंगभेदी सरकार और स्वतंत्रता का आंदोलन चलाने वाले नेताओं के बीच समझौते की राह अपनाने पर ज़ोर दिया.

1985 में जो पीढ़ी आंतरिक संघर्षों में सक्रिय थी उसे मंडेल के समझौतावादी रुख से आश्चर्य हुआ.

यहां तक कि फरवरी 1990 में मंडेला की रिहाई तक कई लोगों को उम्मीद थी कि वह अपना रुख बदल लेंगे.

लेकिन यह आशंका गलत साबित हुई. वास्तव में मंडेला रॉबेन द्वीप में एक अच्छे नेता के रूप में आए थे और वहां से एक महान नेता के रूप में बाहर निकले.

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