चुनावों में कितना कारगर रहेगा मोदी फ़ैक्टर?

  • 7 दिसंबर 2013
भाजपा की चुनाव रैली

भारत में ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि देश में होने वाले चुनावों में मतदाता अपने वोट का फ़ैसला किन किन बातों को ध्यान में रखकर करते हैं.

विधानसभा चुनावों के सवाल पर ही देखें तो जाति, नेता, स्थानीय मुद्दे, राष्ट्रीय चिताएँ, सत्ता विरोधी रुझान, विकास और महँगाई जैसे कई मुद्दे मतदाताओं के मन में रहे होंगे.

और इन सब के बीच एक चेहरा ऐसा भी है जिसके इर्द-गिर्द राजनीतिक बहस मुबाहिसों सिमट जाया करती हैं.

(सांप्रदायिक हिंसा कानून)

ये हैं भारत में दक्षिणपंथी राजनीति के पोस्टर ब्वॉय कहे जाने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी.

हालांकि नरेंद्र मोदी भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा की ओर से 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार हैं.

लेकिन मोदी की धुँआधार चुनाव प्रचार और रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ के मद्देनजर राजनीतिक पंडित इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहे हैं कि विधानसभा चुनावाों पर मोदी का क्या असर पड़ा और चुनावी परिणाम मोदी को किस तरह से प्रभावित करेंगे.

मोदी अकेले फ़ैक्टर नहीं

नरेंद्र मोदी, लालकृष्ण आडवाणी

राजनीतिक विश्लेषक प्रमोद जोशी कहते हैं, "मेरे हिसाब से सिर्फ मोदी का कारण नहीं है. ऐसा ज़रूर है कि इस इसमें दो बातें एक साथ हैं. कांग्रेस का शासन जहाँ भी है, चाहे राजस्थान हो या फिर दिल्ली, वहां मतदाता के दिल में इच्छा है उसके ख़िलाफ़ व्यक्त करने की. रही बात मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तो वहां जो उनमें गिरावट थी उसमें नरेंद्र मोदी की वजह से शायद कोई फर्क पड़ा हो."

(विधानसभा चुनावों पर विशेष)

मोदी की रैलियों से केवल एक जो एग्रेसिव कार्यकर्ता है या जो वोट मांगने का तरीका है, उससे ज़ाहिर होता है कि मोदी की परीक्षा अभी भी होनी बाक़ी है. लेकिन इसमें दो राय नहीं है कि कहीं न कहीं थोड़ा बहुत बीजेपी को इसका फ़ायदा हुआ है खास तौर पर दिल्ली में जहाँ पार्टी के अन्दर काफ़ी खींचा तानी और मतभेद थे आपस में.

अंतिम क्षणों में मोदी की रैलियों से जरूर फर्क पड़ा लेकिन नरेंद्र मोदी अकेले फ़ैक्टर नहीं हैं अभी तक मुझे ऐसा लगता है. ये भी है जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था उस वक़्त उनका विरोध भी हुआ था. उनका विरोध लालकृष्ण आडवाणी ने भी किया था. तब ऐसा कहा जा रहा था कि इस घोषणा का विपरीत असर मध्य प्रदेश के चुनावों पर पड़ेगा.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उनकी रैलियों से जितना फ़ायदा हो सकता था, वो पार्टी को मिला. मगर ये सबकुछ तब ही कहना बेहतर होगा जब चुनाव के परिणाम आ जाएंगे.

दो तिहाई बहुमत

मोदी, राजनाथ सिंह, आडवाणी, शिवराज सिंह चौहान

नई दुनिया अखबार के समूह संपादक श्रवण गर्ग का कहना है कि अगर बीजेपी इन चुनावों में नरेंद्र मोदी का असर वाकई मानती है तब तो मध्य प्रदेश में उसे 143 से ऊपर सीटें आनी चाहिएँ. उसी तरह छत्तीसगढ़ में भी 50 से ज्यादा सीटें आनी चाहिएँ. राजस्थान में भी पार्टी का कांफ़िडेंस लेवल ऐसा होना कि उसे दो तिहाई बहुमत मिलेगा.

(दिल्ली से तय होगा देश?)

दिल्ली में जिस तरह नरेंद्र मोदी की सभाएं हुईं उससे ये असमंजस नहीं रहना चाहिए थे कि उनकी सरकार आएगी या नहीं. जो समझ में आ रहा है उससे पता चलता है कि मध्य प्रदेश में 143 से कम सीटें आ रही हैं. छत्तीसगढ़ में सीटें 50 से कम हो रहीं हैं. राजस्थान में ये कोशिश चल रही है कि सरकार बस बन जाए और दिल्ली में सब कुछ अनिश्चित है.

इस लिए मैं इसको नरेंद्र मोदी के इम्पेक्ट से जोड़ कर नहीं चल रहा हूँ. नरेंद्र मोदी का अगर असर होता तो अच्छी सरकार और उनके असर की वजह से शिवराज सिंह चौहान और रमण सिंह को बहुत ही ज़बरदस्त बहुमत की तरफ होना चाहिए था. जोकि नहीं हो रहा है. बल्कि इसका उल्टा असर ही हो गया है मध्य प्रदेश में. नरेंद्र मोदी की सभाओं की वजह से वोटों का ध्रुवीकरण हो गया.

जो मुसलमान शिवराज सिंह चौहान के साथ थे वो मोदी की रैलियों की वजह से उनसे अलग हो गए. वैसा ही कुछ छत्तीसगढ़ में भी हुआ. मोदी की मार्केटिंग भले ही हो लेकिन मध्य प्रदेश में भाजपा को जो भी बढ़त हासिल है वो सिर्फ और सिर्फ शिवराज सिंह चौहान की व्यक्तिगत छवि की वजह से है. ऐसा ही छत्तीसगढ़ का हाल है.

अब देखिये, भोपाल में जो नरेंद्र मोदी की सभा हुई थी उसमे मुश्किल से तीन से चार हज़ार लोग ही जमा हो पाए थे. पार्टी मोदी का आकलन जरूरत से ज्यादा कर रही है.

स्थानीय मुद्दे

शीला दीक्ष

आउटलुक मैगज़ीन के संपादक नीलाभ कहते हैं कि मोदी फैक्टर से ज्यादा मैं इसे केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ एंटी-इनकम्बेंसी ही मानता हूँ. ये तो पता चल ही रहा था कि कांग्रेस से नाराज़ चल रहे हैं लोग क्योंकि कई तरह के घोटाले सामने आ रहे थे. महंगाई भी क बड़ा कारण रही है. चुनाव में अपने सफ़र के दौरान हमने देखा कि मोदी चर्चा का विषय नहीं हैं.

(आँकड़ों का आईना)

राजस्थान और मध्य प्रदेश में अगर हम लोगों को टटोलते थे तब वो बोलते थे कि हां मोदी भी हैं एक फ़ैक्टर. हमने ज़्यादातर देखा कि स्थानीय मुद्दे ही हावी रहे चुनाव में या फिर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ एंटी इनकम्बेंसी. हर जगह लोग महंगाई का ज़िक्र करते थे. हाँ, अलबत्ता नरेंद्र मोदी का असर भाजपा के कार्यकर्ताओं पर ज़रूर था. कुछ इलाकों में युवाओं पर असर देखा गया.

लेकिन युवा वर्ग भी जात और धर्म के आधार पर बंटा हुआ है. उधर एंटी-इनकम्बेंसी या सत्ता विरोधी रुझान कांग्रेस पर भारी पड़ा है. ऐसा भी नहीं हैं कि एग्जिट पोल हमेशा सच ही हुए हों. कभी कभी ये ग़लत भी साबित हो जाते हैं. लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस के संगठनिक कमजोरियां भी सामने नज़र आईं, जैसे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में.

अभी जिन इलाकों या राज्यों में चुनाव हुए हैं वहां ये दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दल ही मुख्य मुकाबले में रहे हैं. लोक सभा चुनाव का इसे सेमी फ़ाइनल नहीं कहा जा सकता है. आधा देश ऐसा है जहाँ ये दोनों दल सीधे मुकाबले में नहीं हैं.

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