'बलात्कारी को ग़िरफ़्तार करवाना चाहती हो तो खुद खोजो'

  • 6 दिसंबर 2013
दिल्ली रेप

पिछले दिसंबर में चलती बस में एक युवती के साथ हुआ बर्बर बलात्कार भारत में आए दिन होने वाले उन अनगिनत यौन हमलों में से एक था जहां बलात्कार पीड़ितों को न्याय के लिए चौतरफ़ा संघर्ष करना पड़ता है. पीड़ित को कोर्ट और थाने के साथ ही समाज के भेदभाव भरे व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है.

दिल्ली के कुख्यात बलात्कार मामले से कुछ ही पहले उत्तरी दिल्ली की 17 साल की एक दलित लड़की के साथ उसी के गांव के सवर्ण पुरुषों ने सामूहिक बलात्कार किया.

घटना 9 सितंबर 2012 की है. जब यह लड़की एक दोपहर अपने दादी के घर से अपने घर जा रही थी. अचनाक कुछ लड़कों ने उसे घेर लिया. वे लड़कों उसे जबरदस्ती कार में बिठाकर एक सुनसान जगह ले गए और उसका बलात्कार किया. सभी लड़के ऊंची जाति से ताल्लुक रखते थे. उन लड़कों ने इस घटना की मोबाइल से फ़िल्म भी बनाई. इस मोबाइल फ़िल्म में साफ़ दिखा कि आठ लोग उसका बलात्कार कर रहे हैं. हालाँकि अदालत ने केवल चार को ही दोषी करार दिया.

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पीड़ित लड़की 9 दिनों तक सदमे में रही. उसके बाद जब उसका परिवार पुलिस थाने शिकायत करने जाने लगा तो उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई.

लड़की के पिता पहले से ही अवसादित थे. इससे वो इतने आहत हुए कि उन्होंने आत्महत्या कर ली.

लड़की ने बताया, "हम वापस आए और दलित समुदाय के दूसरे सदस्यों से बात की. वो मदद के लिए आगे आए. फिर अंततोगत्वा इस मामले में पहली ग़िरफ़्तारी हुई. मैंने एक बयान में उन्हें बताया था कि 11-12 लोग शामिल थे लेकिन पुलिस ने केवल आठ लोगों को गिरफ़्तार किया. पुलिस ने कहा कि तुम और लोगों को ग़िरफ़्तार करवाना चाहती हो तो खुद जाकर उन्हें खोजो."

बलात्कार केस पुलिस की प्राथमिकता नहीं

भारत में बलात्कार जैसे अपराध में पहले तो शिकायत दर्ज नहीं होती और यदि दर्ज कराने जाओ तो थाने में महिला पुलिस नहीं होती हैं. थानों में महिला पुलिस की संख्या बहुत कम है. दिल्ली में इनकी संख्या केवल 6 फीसदी है.

दिल्ली पुलिस की महिला और बाल विभाग की प्रमुख सुमन नालवर कहती हैं, "बलात्कार जैसे मामलों को पुलिस अपनी पहली प्राथमिकता नहीं मानती."

सुमन कहती हैं कि अगर महिला को रास्ते में छेड़ा गया हो, या शरीर के किसी अंग को आपत्तिजनक तरीके से छुआ या पकड़ा गया हो तो पुलिस और दूसरे लोग भी इसे कोई बड़ी बात नहीं मानते.

वे कहती हैं, "छेड़खानी मानसिक यातना पहुंचाती है. मगर इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता. महिलाएं भी इसकी अनदेखी करती आई हैं. मगर अब जब इस मामले में जागरूकता आई है हमें इससे संबंधित ज्यादा फ़ोन आने लगे हैं. बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों का तेजी से बढ़ना चिंताजनक हैं."

'बलात्कार पीड़िता' नाम मिला

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दक्षिणी दिल्ली में एक वकील के दफ्तर में फ़ाइलों के ढेर के पीछे एक 20 साल की महिला बैठी है.

उस महिला ने बताया कि उसका यौन शोषण एक अमीरजादे ने किया. वह महिला ख़ासी पढ़ी लिखी और शांत स्वभाव की थी.

उसने बताया, "जब दर्द असहनीय हो गया तो मैं अस्पताल गई. वहां डॉक्टर ने मुझे पुलिस में शिकायत दर्ज करने की सलाह दी. मैं फ़ैसला नहीं कर पा रही थी. क्योंकि इससे मेरे परिवार को सदमा पहुंचता. अंततः शिकायत दर्ज हुई और मुझे मेडिकल जांच के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया."

वे कहती हैं, "वहां लंबे इंतजार के बाद मुझे "जिसका बलात्कार हुआ है" कहते हुए पुकारा गया. ये मेरी नई पहचान थी. वह डॉक्टर पूरी तरह से असंवेदनशील थी. उसे इस बात का रत्ती भर अहसास नहीं था कि मेरे साथ शारीरिक उत्पीड़न हुआ है. एक मशीन की तरह उसने मेरी जांच की."

पीड़िता ने बताया, "डॉक्टर बिल्कुल निर्दयी थे. मैं दर्द से चीख रही थी."

'टू-फिंगर टेस्टः एक यातना'

बलात्कार की जाँच के मामले में 'टू-फिंगर टेस्ट' भी काफ़ी कुख्यात है.

'टू-फिंगर टेस्ट' उसे कहते हैं जिसमें योनि के भीतर दो उंगलियां डाली जाती हैं और ये जानने की कोशिश की जाती है कि 'हाइमेन' (योनिमुख की झिल्ली) फटा है अथवा नहीं, या वह महिला सेक्स की आदी तो नहीं?

असहज और अप्रासंगिक घोषित हो चुके इस टेस्ट की व्यापक आलोचना होती रही है. फिर भी कई अस्पतालों में इस टेस्ट को मानक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

दिल्ली में रहने वाले मृणाल सतीश पिछले 25 सालों से बलात्कार के मामलों का अध्ययन कर रहे हैं. वे इस जांच को निरर्थक मानते हैं.

सतीश कहते हैं, "कई बार तो यह टेस्ट एक या दो साल की बच्ची के साथ भी किया जाता है. डॉक्टर एक बार भी नहीं सोचते कि ऐसे टेस्ट होने चाहिए या नहीं."

दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल, जो एक सरकारी अस्पताल है, में पुलिस बलात्कार पीड़ितों को मेडिकल जांच के लिए लाती है.

'बलात्कार कीट' से सामना

सफदरजंग की वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञा, रीना बत्रा बताती हैं, "यदि बलात्कार पीड़िता रिपोर्ट दर्ज करना चाहती है तो उसे बलात्कार किट की मदद लेनी पड़ती है. बलात्कार किट एक ऐसा किट है जो हर डॉक्टर के पास होता है. इसके जरिए सारे फोरेंसिक सबूत जुटाए जाते हैं. इसमें कई स्टेप होते हैं. इनके नाम हैः डेब्री कलेक्शन, इन बिटविन फिंगर, नेल्स स्क्रीपिंग आदि"

बलात्कार किट के जरिए सबूत जुटाए जाते हैं. वे बताती हैं कि ये किट भारत के सभी सरकारी अस्पतालों में इस्तेमाल किया जाता है. टू-फिंगर टेस्ट भी आमतौर पर किए जाते हैं.

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पूर्वी दिल्ली के शॉपिंग मॉल में तीसरी बलात्कार पीड़िता से मुलाकात होती है. उसके साथ उसके पड़ोसी ने ही बलात्कार किया.

पीड़िता बताती है कि वह इस आदमी से स्कूल ट्यूशन लेने जाती थी. बीवी से मिलवाने के बहाने उसने घर बुलाया और उसके साथ बलात्कार किया. उसने एक वीडियो भी बना ली थी.

पीड़िता कहती हैं "ब्लैकमेल करता रहा कि मैं पुलिस के पास न जाऊं. ये घटना अक्टूबर में हुई थी. उसने जनवरी में मुझे अगवा कर लिया. मैं तीन महीने बंद रही."

अराजक न्याय व्यवस्था

पीड़िता ने कहा, "पूरा समाज इसके लिए मुझे ही दोषी ठहराने लगा. मेरे भाई को स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि उसके दोस्तों ने उससे बात करना बंद कर दिया. मेरा परिवार को भी वह जगह छोड़नी पड़ी. काफ़ी यातना से गुज़रने के बाद उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया."

इस महिला के केस की सुनवाई तीस हजारी कोर्ट में होने वाली है. अगर कोई कोर्ट आए तो देखें कि भारत की न्याय व्यवस्था कितनी अव्यवस्थित और बोझिल है.

भारतीय बलात्कार कानून साल 1860 में ब्रितानियों ने बनाया था. इसमें बाद में कई संशोधन हुए. वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार बलात्कार के मामले में पीड़ित महिला के यौन इतिहास पर गौर नहीं करना चाहिए.

पुलिस में केस दर्ज करने से लेकर कोर्ट में सुनवाई और फ़ैसला आने तक पीड़िता के साथ हर जगह असंवेदनशील व्यवहार होता रहा.

17 साल की दलित बलात्कार पीड़िता ने बताया, "वकील ने मेरी मां को सुनाया कि ज़रूर मेरे चरित्र में ही खोट होगा."

भारत अभी भी पितृसत्तात्मक समाज है जिसमें किसी महिला के कौमार्य का काफी महत्व होता है और विवाह से पहले यौन संबंध बनाने को वर्जित समझा जाता है.

न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी दिल्ली हाईकोर्ट के जज रह चुके हैं. वे कहते हैं, "इस कानून का गलत इस्तेमाल हो सकता है अगर लड़की का बलात्कार न हुआ हो और वो कह दे कि उसका बलात्कार हुआ है. जब तक आप पकड़े न जाएं (सेक्स करते हुए) तब तक सब ठीक है और जब पकड़े जाएं तो बेहतर है कि आप ये कहें कि आपका बलात्कार हुआ है."

जिरह की असंवेदनशील प्रक्रिया

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बलात्कार के मामलों में सरकार ने सबूत पेश करने और जिरह की प्रक्रिया को संवेदनशील बनाने की सलाह दी है, जैसे कि हर पीड़िता को स्क्रीन(पर्दा) मुहैया कराने की मांग पर गौर किया जाए.

दक्षिणी दिल्ली की उस पढ़ी लिखी महिला ने स्क्रीन की मांग की थी. मगर उसकी मांग ठुकरा दी गई. जिस आदमी पर उसने आरोप लगाए थे उसे छोड़ दिया गया.

अदालत में चल रही जिरह के बारे में पीड़िता ने बताया, "मैं उस इंसान की ओर नज़र नहीं उठा पा रही थी. मगर वह और उसका वकील मुझे लगातार घूरे जा रहे थे. उनका यही इरादा था कि मैं डर जाऊं. बोल ना पाऊं."

उन्होंने आगे कहा, "उन लोंगो ने यही साबित करने की कोशिश की कि हम दोनो में सब कुछ रज़ामंदी से चल रहा था. जब मैं ऊब गई तो बलात्कार का इल्जाम लगा दिया. वे रुतबेदार लोग थे. परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी अपने बेटे को बचाने में."

मगर अब लड़कियों की चुप्पी टूटने लगी है. 18 साल की दलित युवती ने फैसला लिया कि, "अब मैं बलात्कार पीड़िता बन कर नहीं रहूंगी." उसने फिर से पढ़ाई शुरू कर दी. अब वह कॉलेज में है और वकील बनना चाहती है.

लेकिन यौन हिंसा के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और बलात्कार के पीड़ितों का मानना है कि भारत को सभी बलात्कार पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है.

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