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29 साल बाद धुला ग़बन का दाग

 मंगलवार, 3 दिसंबर, 2013 को 17:36 IST तक के समाचार

कानपुर का मौसम ख़ुशनुमा है. सुबह के समय ठंड तो है लेकिन धूप भी खिली है. दुबली-पतली कद काठी के 65 वर्षीय उमाकांत मिश्रा अपने घर में पेड़ से अमरूद तोड़ रहे थे, तभी उनके पड़ोसी उनसे कहते हैं, "बधाई हो मिश्रा जी. आपने 29 साल लंबी लड़ाई आखिर जीत ही ली."

उम्र और बीमारी की वजह से ज़्यादा बोलने में असमर्थ उमाकांत मिश्रा जवाब में अपना सिर हिलाते हैं और उनके चहरे पर एक मुस्कान आ जाती है.

एक लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद मिश्रा ने अब आराम की सांस ली है और थोड़ा हल्का महसूस कर रहें हैं. उनके माथे से जालसाज़ी का 29 साल पुराना आरोप धुल चुका है.

29 साल पहले उमाकांत मिश्रा कानपुर शहर के हरजिंदर नगर डाक घर में डाकिया थे.

13 जुलाई 1984 की बात याद करते हुए वो कहते हैं, "मुझे मनी ऑर्डर के तौर 697.60 रुपए बांटने थे. मैंने 300 रुपए बांटे और बाकी पैसा उप डाकपाल आरडी कुरील को सौंप दिया. पैसों की गिनती हुई तो 57.60 रुपए कम निकले. मुझ पर ग़बन का आरोप लगा. मुझे नौकरी से निलंबित कर दिया गया और पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई."

लंबी लड़ाई

इसके बाद उन्हें जेल भी जाना पड़ा. जेल से तो वो दो दिन में छूट गए लेकिन इसके बाद शुरू हुई एक लंबी क़ानूनी लड़ाई. मुक़दमे के दौरान अदालत में कुल 348 तारीखें पड़ी.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "कानपुर के परमट इलाके में मेरा घर था. अदालत में मुक़दमा लड़ने के दौरान मेरा घर बिका और फिर हरदोई ज़िले में मेरा खेत. अगर रिश्तेदार सहारा न देते तो परिवार सड़क पर आ जाता."

मिश्रा बताते हैं, "कोर्ट का आदेश 25 नवंबर को आया और उसी दिन मेरे करीब 18, 000 रुपए खर्च हो गए."

पिछले 29 बरसों में मिश्रा के तीन बच्चों की मौत हो चुकी है. वो बताते हैं, "तीनों बच्चे छोटे थे. दो बेटियां और एक बेटा जीवित है. दोनों लड़कियों की शादी चंदा मांग कर की. बेटे को दसवीं कक्षा के बाद पढ़ा न पाया."

उमाकांत मिश्रा के 32 वर्षीय पुत्र गंगा सागर कहते हैं कि उनके पिता ने पिछले 29 बरसों में हर तरह के काम किए.

उन्होंने बताया, "ज़रूरत पड़ी तो मजदूरी का काम भी किया. वो बीमार रहने लगे लेकिन पैसे की कमी के चलते इलाज नहीं करवा पाए. आज मेरे पिताजी न ठीक से बोल सकते हैं और न ही सुन सकते हैं."

वो कहते हैं, "मैं खुद भी ज़्यादा पढ़ नहीं पाया. कभी लिफ़ाफ़े बना कर बेचता था तो कभी पान और सिगरेट."

नुकसान की भरपाई

29 साल बाद एक काला दाग धुल जाने के बाद मिश्रा और उनका परिवार खुश है. उनकी पत्नी कहती है, "अब एक दिन सभी रिश्तेदारों और पड़ोसियों को मिठाई बांटनी है."

मिश्रा को पता है उनकी लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है. वो कहते हैं, "1984 में मैं सस्पेंड हुआ. उस समय से लेकर मेरे रिटायरमेंट तक जितना भी पैसा बनता है, वो मुझे मिलना चाहिए."

गंगा सागर कहते हैं, "भूतपूर्व न्यायाधीश और वकीलों का कहना है कि मेरे पिताजी के साथ नाइंसाफी हुई है. उन्होंने अपना जीवन सस्पेंशन में ही काट दिया. इसकी भरपाई तो होनी ही चाहिए."

गंगा सागर का कहना है कि डाक विभाग ने मौखिक तौर पर भरोसा दिलाया है कि उनके पिता के साथ न्याय होगा.

गंगा सागर कहते हैं, "हम अपनी मांग ऊपर तक उठा रहे हैं. अगर हमें न्याय नहीं मिलता है तो पूरा परिवार राष्ट्रपति भवन के सामने ज़हर खा कर जान दे देगा."

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