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क्या सोच रहा होता है बलात्कारी?

 गुरुवार, 12 दिसंबर, 2013 को 15:20 IST तक के समाचार

सवाल कई थे, लेकिन पूछा जाए तो किससे. दिल्ली से सटे गुड़गांव के दस गुना दस के कमरे में जब मैं पहुंची, तो मुझे देखते ही वह बच्ची चारपाई पर औंधे मुंह लेट गई.

बैंगनी और सफेद धारी वाला पायज़ामा और जैकट पहने इस बच्ची को देखकर कई सवाल उठे. कुछ महीने पहले ही इस बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था. बलात्कार का अभियुक्त फिलहाल जेल में हैं.

इस साढ़े पांच साल की लड़की को अपना शिकार बनाने वाले व्यक्ति की दिमाग़ी हालत कैसी होगी? यह कैसी मानसिकता है? ज़हन में कई सवालों का जाल बुन गया.

मन में ये सवाल कौंध ही रहे थे कि इस बच्ची की मां ने मुझे बैठने के लिए कुर्सी दी. मैं इस बच्ची की मां के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी. चेहरा भावशून्य था. मैं चाहकर भी उनके दिल की बात का कोई अंदाज़ा नहीं लगा पाई.

16 दिसंबर को चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया था. उस घटना के करीब चार महीने ही बीते होंगे कि अप्रैल महीने में बलात्कार का एक और मामला दिल्ली में सामने आ गया. उतना ही वीभत्स, लेकिन इस बार बलात्कार की शिकार एक पांच साल की बच्ची थी. वही बच्ची और उसका परिवार मेरे सामने था.

यह मामला कितना भयानक था उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभियुक्त ने इस बच्ची के साथ बलात्कार करने, उसके गुप्त अंगों को चोट पहुंचाने के बाद उसे कमरे में बंद करके मरने के लिए छोड़ दिया था.

यह बच्ची पूर्वी दिल्ली में अपने घर के पड़ोस से तीसरे दिन बरामद की गई.

घटना को याद करते हुए इस बच्ची की मां कहती है, ''वह नंगी थी और...उसकी हालत बहुत बुरी थी और बेहोश थी. मैं उसे देखकर रोने लगी.’’

दो महीने पहले पीड़ित बच्ची और उसका परिवार गुड़गांव शिफ़्ट हो गया.

मानसिकता

इस मामले में दो व्यक्तियों को अभियुक्त बनाया गया है और पुलिस ने चार्जशीट में इन दोनों पर धारा 366 ए, जबरन बंधक बनाने और यौन हिंसा से बच्चों की सुरक्षा की धारा-6 लगाई है.

शुरू में इस घटना की मीडिया, सोशल वेबसाइट, दफ़्तरों और घरों में चर्चा तेज़ थी और लोगों में भी काफी गुस्सा था. सवाल है कि बलात्कार क्यों हुआ.

मनोवैज्ञानिक और दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान अस्पताल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर रचना भार्गव कहती हैं कि भारत में बलात्कार की घटनाओं के कारणों को लेकर अध्ययन नहीं किया गया, लेकिन पश्चिमी देशों में हुए अध्ययन के आधार पर धारणाएं बनाई जा सकती है.

उनके अनुसार हर व्यक्ति के व्यवहार के अलग-अलग कारण, उनकी प्रवृत्ति, सोचने-समझने का ढंग जैसी बातें काम करती हैं.

वे कहती हैं, ''कोई भी व्यक्ति बलात्कार क्यों करता है, उसके पीछे कई कारण काम करते हैं. ऐसे मामलों में अभियुक्तों का बचपन, माता-पिता का बर्ताव, घर में कोई शराब या नशा करता हो या फिर उसके साथ बचपन में यौन व्यवहार की घटना तो नहीं घटी हो.''

रचना का कहना है सबसे महत्वपूर्ण पारिवारिक माहौल होता है और उसी के साथ सामाजिक कारण काम करते हैं.

यौन दुर्व्यवहार

उनके अनुसार कोई व्यक्ति यौन दुर्व्यवहार करेगा या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन यौन दुर्व्यवहार और अपराध करने वालों में कुछ बातें समान होती हैं.

रचना बताती हैं, ''इन लोगों में ग़ुस्सा काफ़ी होता है. ये एंटी सोशल पर्सनेलिटी या साइकोपैथिक होते हैं यानी इन्हें अपराध करके दुख का बोध नहीं होता. अगर ये लोग बलात्कार करते हैं, तो किसी को दर्द देकर यौन हिंसा करने में इन्हें मज़ा आता है. इस तरह से काम को अंजाम देने वाले ज़्यादातर लोग बचपन में यौन हिंसा का शिकार हुए होते हैं या परिवार में अकेलापन झेल चुके होते हैं.’’

रचना बताती हैं कि ये किसी भी व्यक्ति की सैक्सुअल फ़ेंटेसी पर निर्भर करता है कि वो महिलाओं के साथ करना चाहते हैं या बच्चों के साथ. हालांकि वे इस बात से इनकार करती हैं कि ऐसी बातें किसी के भी दिमाग में अचानक नहीं आती है बल्कि ये प्रवृत्ति धीरे-धीरे बनती है.

क्या इन कारणों से इस बच्ची को कथित बलात्कारियों ने निशाना बनाया, यह कहना मुश्किल है. लेकिन बलात्कार की घटना ने इस बच्ची और उसके परिवार का नज़रिया हमेशा के लिए बदल दिया.

इस बच्ची को पेंटिंग और पढ़ना पसंद है. बच्ची की मां बताती हैं कि हादसे के बाद अब वह घर से बाहर नहीं खेलना चाहती. केवल घर में ही रहना चाहती है.

पिता का कहना है, ''जब यह हादसा हुआ तो उनकी बेटी 'मार दिया-मार दिया' चिल्लाती थी. लेकिन घटना के बारे में कुछ नहीं बताती. हम डर के साए में ही रहते हैं, हर पल बच्चों के साथ रहते हैं. इसकी मां स्कूल की बस में बिठाकर ही जाती है और स्टैंड पर 15 मिनट पहले ही पहुंच जाती है. एक बार घटना घटी अब दोबारा ऐसा हो गया, तो कहीं के नहीं रहेंगे.’’

इस बच्ची के मां-बाप अब दोनों अभियुक्तों को फांसी की सज़ा दिए जाने की मांग कर रहे हैं और चाहते हैं कि 16 दिसंबर के मामले की ही तरह इस मुक़दमे की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो.

वो कहते हैं कि बेटा तो है नहीं कि हमारे पास रह सके, तो पढ़-लिखकर अपने पांव पर खड़ी हो जाए तो अच्छा है.

मेरे इस बच्ची के घर बिताए गए तक़रीबन तीन घंटों में मां ने बहुत कम बातचीत की. उन्होंने आख़िर में यही कहा कि एक मां होने के नाते मुझे यही लगता है कि मेरी बेटी से शादी कौन करेगा. बस यही उम्मीद करती हूं कि ये पढ़-लिख जाए और अपने पांव पर खड़ी हो जाए.

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