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शामी की कामयाबी ने दिखाए सुनहरे ख्वाब

 गुरुवार, 28 नवंबर, 2013 को 19:03 IST तक के समाचार
डीएनएस क्रिकेट अकादमी

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले के एक गाँव में किसान परिवार में पैदा हुए मोहम्मद शामी ने भारतीय क्रिकेट टीम के तेज़ गेंदबाज़ के रूप में पहचान बनाई है.

गाँव की कच्ची पिच से अंतरराष्ट्रीय स्टेडियमों तक का उनका सफर किसी सपने से कम नहीं है. कोलकाता उनके इस सफर का अहम पड़ाव रहा है. उत्तर प्रदेश से चयन न होने के बाद शामी क्लब क्रिकेट खेलने के लिए कोलकाता चले गए थे. यहीं उनकी रफ़्तार को धार मिली और वे टीम इंडिया तक पहुँचे.

मोहम्मद शामी की कामयाबी ने अमरोहा में उनके साथ क्रिकेट खेलने वाले कई खिलाड़ियों को दोबारा अभ्यास करने और किस्मत आज़माने के लिए प्रेरित किया है.

मिला नया हौसला

उन्नीस साल के उमेर अहमद मोहम्मद शामी के साथ ही तेज़ गेंदबाज़ी करते थे. अमरोहा और आसपास के इलाक़े में उमेर ही शामी के बराबर रफ़्तार से गेंद फेंक पाते थे. पारिवारिक दिक्कतों के कारण उमेर क्रिकेट जारी नहीं रख सके.

डीएनएस

अमरोहा और आसपास के कॉलेजों के मैदानों में अब क्रिकेट का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

इसी बीच मोहम्मद शामी कोलकाता गए और सही प्रशिक्षण पाकर टीम इंडिया तक पहुँचे. मोहम्मद शामी को क्रिकेट खेलता देखकर उमेर अब एक बार फिर मैदान में उतरे हैं और अभ्यास कर रहे हैं.

उमेर कहते हैं, "शामी की कामयाबी ने मुझे फिर से हौसला दिया है. तमाम दिक्कतों के बाद मैं अब प्रशिक्षण लेकर अपनी रफ़्तार को धार दे रहा हूँ. मुझे उम्मीद है कि मैं भी क्रिकेट जगत में अपना मुकाम बना ही लूँगा."

अमरोहा के आसपास के अधिकतर गाँव कृषि प्रधान हैं. यहाँ क्रिकेट अब तक सिर्फ़ शौक के लिए ही खेला जाता था. अक्सर बच्चों के हाथ में गेंद-बल्ला देखकर माँ-बाप उन्हें डाँट देते थे.

लेकिन मोहम्मद शामी की कामयाबी का असर ये हुआ है कि अब बच्चों में क्रिकेट के प्रति रुचि देखकर माँ-बाप उन्हें क्रिकेट अकादमियों में भेज रहे हैं.

अमरोहा और आसपास के कॉलेजों और स्कूलों के मैदानों में अब क्रिकेट अकादमियां खुल गई हैं. डिडौली के डीएनएस इंजीनियरिंग कॉलेज के मैदान में खुली अकादमी में महाराष्ट्र के पूर्व रणजी खिलाड़ी ज़ुल्फ़िकार पारकर प्रशिक्षण दे रहे हैं.

क्लिक करें गाँव की पिच जिसने दी शामी को रफ़्तार

डीएनएस क्रिकेट अकादमी

प्रशिक्षण

ज़ुल्फ़िकार कहते हैं, "यहाँ के बच्चों में क्रिकेट के लिए जरूरी प्रतिभा कूट-कूटकर भरी है. कुछ बच्चों में पैदाइशी प्रतिभा है. हम सिर्फ उस प्रतिभा को एक दिशा दे रहे हैं. बच्चे खेलना जानते हैं, लेकिन इसकी बारीकियाँ नहीं समझते हैं. हम ये बारीकियाँ ही उन्हें सिखा रहे हैं."

प्रशिक्षण की ज़रूरत पर जोर देते हुए ज़ुल्फ़िकार कहते हैं, "पैदाइशी प्रतिभा को अगर सही दिशा दे दी जाए तो क्रिकेटर मौके पर खरा उतरने के लिए तैयार हो जाते हैं. क्रिकेट अवसर का खेल है. जो अवसर पर सही प्रदर्शन करता है, वो अपनी छाप छोड़ देता है."

वो आगे कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी की अपनी बॉडी लैंग्वेज और एटीट्यूड होता है. यही उसे हौसला भी देता है. हमारी कोशिश यहाँ के गाँवों से सीखने आ रहे बच्चों को वही हौसला और एटीट्यूड देना है."

मोहम्मद शामी

नई उम्मीद

बासिक राज़ा अंडर 16 के लिए तैयारी कर रहे हैं. अब तक यहाँ के बच्चे खाली खेतों में बनाई गई कच्ची पिचों पर ही खेलते रहे थे. वे हरे मैदान की पिच पर प्रशिक्षण ले रहे यहाँ के बच्चों की पहली पीढ़ी से हैं. बासिक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और शामी की कामयाबी से प्रेरित होकर ही वे क्रिकेट अकादमी आए हैं.

यहाँ के अन्य स्कूलों और कॉलेजों के मैदानों में भी क्रिकेट अकादमियां चलाई जा रही हैं. मोहम्मद शामी के पहले कोच बदरुद्दीन सिद्दीक़ी अब मुरादाबाद के मॉर्डन पब्लिक स्कूल के मैदान पर क्रिकेट अकादमी चला रहे हैं.

शामी की कामयाबी ने यहाँ के स्थानीय क्रिकेटरों की आँखों को नए ख़्वाब दिए हैं. कच्ची पिचों पर दम तोड़ रही प्रतिभा अब क्रिकेट अकादमियों में पहुँचकर खुद को तराश रही है. फटाफट क्रिकेट के सबसे लोकप्रिय टूर्नामेंट आईपीएल ने क्रिकेट में करियर की संभावनाओं को और बढ़ा दिया है.

उमेर कहते हैं, "वक़्त बदल रहा है. अब पहले से ज़्यादा मौक़े हैं. यही वजह है कि तमाम पारिवारिक दिक्कतों के बावजूद मैं फिर से मैदान पर आया हूँ. मुझे क्रिकेट में नई संभावनाएँ दिख रही हैं."

मोहम्मद शामी की कामयाबी का एक और असर हुआ है. अब क्रिकेट खेलते बच्चों को पढ़ने की ताक़ीद नहीं की जाती है, बल्कि उन्हें बेहतर खेलने का हौसला दिया जाता है. साधारण किसान परिवार के बच्चे भी अब टीम इंडिया के सुनहरे सफ़र के ख्वाब देख रहे हैं.

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