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प्रचार से आख़िर ग़ायब क्यों हैं असल मुद्दे?

 सोमवार, 18 नवंबर, 2013 को 19:30 IST तक के समाचार
चुनाव प्रचार मुद्दे

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में 12 करोड़ नए मतदाता वोट डालेंगे.

इस रविवार दिल्ली के एक कैफ़े में मेरी मुलाक़ात पहली बार मताधिकार का इस्तेमाल करने के योग्य एक समूह से हुई.

मैं ख़ुद को रोक नहीं पाया और मैंने उनसे पूछ ही डाला "आपको क्या लगता है सरकार को किस पर फ़ोकस करना चाहिए-बढ़ती मंहगाई कम करने पर या आर्थिक वृद्धि तेज़ करने पर."

युवाओं का यह झुंड एकाएक खड़ा हो गया और बोला- "आर्थिक वृद्धि तेज़ करने पर."

उनकी प्रतिक्रिया आश्चर्यचकित करने वाली नहीं थी. इन युवाओं की सबसे बड़ी चिंता उनके रोज़गार को लेकर है. जो निश्चित ही देश की आर्थिक वृद्धि से ही तय होता है.

दूसरी ओर, इस युवा वर्ग से अलग रोज़गार प्राप्त प्रौढ़ वर्ग चाहता है कि सरकार मंहगाई पर लगाम लगाए, जो पहले ही उनकी जेबें खाली कर चुकी है.

12 करोड़ नए मतदाता

जिन लड़के-लड़कियों से मेरी मुलाक़ात हुई, वे लगभग 12 करोड़ उन युवाओं में शामिल हैं, जो 2014 के आम चुनावों में पहली बार मताधिकार का इस्तेमाल करने जा रहे हैं.

या यूं भी कह सकते हैं कि अगले साल मतदान करने वाले हर छह मतदाताओं में एक मतदाता पहली बार वोट डालेगा.

शीला दीक्षित दिल्ली मुख्यमंत्री

वर्ष 2009 के चुनाव में कोई भी दल ऐसा नहीं था, जिसे ये 12 करोड़ मत मिले. सैद्धांतिक तौर पर देखें, तो यूं कह सकते हैं कि इतने सारे मत यदि किसी एक दल को मिले होते, तो वह दल बहुमत के साथ विजयी होता.

आश्चर्य की बात है कि छोटा हो या बड़ा, किसी भी नेता के पास इन मतों को अपने पक्ष में भुनाने के लिए स्पष्ट नीति नहीं है. केवल यही नहीं, 79 करोड़ दूसरे मतदाताओं के मसले पर भी वे नीति के मामले में दीवालिया नजर आते हैं.

मुख्य विपक्षी दल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने मतदाताओं को रिझाने के लिए सुशासन सरकार का गुजरात मॉडल भुनाने की कोशिश ज़रूर की.

उनका मानना है कि केंद्र में भी उनका यह मॉडल काम कर सकता है. जबकि इससे भी ज्यादा मोदी इतिहास के पन्नों या दुनिया में सबसे ऊंची सरदार पटेल की मूर्ति लगाने का श्रेय लेने के चक्कर में फंसे हैं.

इन बातों के चलते मोदी कांग्रेस नेता सोनिया गांधी या उनके पुत्र राहुल गांधी को निशाना बनाना ही भूल गए.

'ग़रीबी का जश्न?'

मोदी के प्रतिद्वंदी या जैसा कि मोदी कहना पसंद करते हैं "शहज़ादे" राहुल गांधी भी उनसे पीछे नहीं हैं.

चुनाव आयोग कांग्रेस उपाध्यक्ष को चुनाव रैलियों में उनके भड़काऊ भाषणों के लिए पहले ही फटकार लगा चुका है. अक्टूबर में हुई एक रैली में राहुल गांधी ने दावा किया था कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी हिंसाग्रस्त मुज़फ़्फ़रनगर के कुछ पीड़ितों के संपर्क में है.

अरविंद केजरीवाल आप

वहीं कांग्रेस है जो ग़रीबी दूर करने के लिए शुरू की गई इसकी योजनाओं और विकास की बात करने से नहीं चूकती, जबकि कई पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसा लगता है मानो सरकार ग़रीबी का जश्न मना रही है.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनाव रैलियों के दौरान उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल या नेता को माओवादी क्षेत्र में ग़रीबी का मुद्दा उठाते नहीं सुना. इन क्षेत्रों के बच्चों को स्कूल जाने या फिर दूसरी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं और सभी दल इन मुद्दों पर बात करने से बचते रहे.

त्रिपक्षीय मुद्दा हो या नेताओं के चरित्र पर टिप्पणी या फिर भष्ट्राचार का मसला, टेलीविज़न चैनलों पर अंतहीन बहस सुनी जा सकती है, लेकिन अर्थव्यवस्था को लेकर कोई पुख़्ता बातचीत हो, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता.

पिछले साल मुझे अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव कवर करने का मौका मिला. दोनों ही मुख्य उम्मीदवार बराक ओबामा और मिट रोमनी का अपने भाषणों में ज़ोर रोज़गार, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय कर्ज़े और अर्थव्यवस्था पर रहा. इस दौरान दोनों पक्ष एक-दूसरे पर किसी तरह की व्यक्तिगत छींटाकशी से बचते रहे.

भाजपा नेता

साथ ही, टीवी और समाचार-पत्र विशेषज्ञों की भी पैनी नज़र विदेश नीति और अर्थव्यवस्था को लेकर दोनों उम्मीदवारों के विचारों पर रही. उम्मीदवारों के मुद्दों से भटकने के मौक़ों को भी नहीं जाने दिया गया. जबकि हमारे देश में मानो हर कोई मोदी और राहुल के व्यक्तित्व में वशीभूत दिखाई दे रहा है.

घोषणा-पत्रों में भरमार

यह बात सच है कि सभी राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणा-पत्रों में उन मुद्दों की भरमार लगा देंगे, जो वे सत्ता में आने पर लागू करेंगे.

दूसरी ओर, एक सच्चाई यह भी है कि कितने ऐसे लोग हैं, जो इन घोषणा-पत्रों को पढ़ते हैं. इसके बजाय लोग नेताओं को रैलियों में सुनने को ज़्यादा तरजीह देते हैं.

देश में हुए पिछले चुनावों से साफ़ है कि यहां मतदाता जाति और शायद विचारधारा के आधार पर वोट देते हैं. मतदाता यह भी जानते हैं भाजपा को 2004 के चुनावों में अपने बहुचर्चित प्रचार अभियान 'इंडिया शाइनिंग' के बावजूद हार का सामना करना पड़ा था. वे ज़रूरी मुद्दों से दूरी बनाकर भी रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनका भाग्य तय करने में जातिगत समीकरण अहम हैं.

हालांकि अगर कोई नेता जाति की इन बेड़ियों को तोड़ने की कोशिश भी करता है, तो देश की 65 फीसदी युवा जनसंख्या शायद उनकी इस बग़ावत को नज़रअंदाज़ न कर पाए.

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