'सीबीआई चुनाव आयोग और कैग की तरह हो'

  • 11 नवंबर 2013
मनमोहन सिंह

गुवाहाटी हाईकोर्ट के सीबीआई के गठन पर सवाल उठाते हुए उसे अवैध करार दिए जाने के संदर्भ में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि सीबीआई के इतिहास और भविष्य को सुधारने के लिए सरकार हर संभव प्रयास करेगी.

आमतौर पर सरकारें सीबीआई को एक स्वतंत्र निकाय के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं होतीं. इस संदर्भ में प्रधानमंत्री का बयान क्या मायने रखता है, इस पर बीबीसी ने सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह से बात की.

प्रधानमंत्री के बयान का क्या मतलब है?

कैसी भी सरकार हो उसे भ्रष्टाचार विरोधी निकाय की ज़रूरत तो होती ही है. कम से कम यह दिखाने के लिए कि वे भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ रहे हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस रुख़ को गंभीरता से लिए जाने की ज़रूरत है. उनका स्टैंड बिलकुल सही है.

मेरे विचार से पड़ताल का आदेश सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट देती है. सीबीआई कभी भी सरकार के कहने पर जांच नहीं करती.

क़ानून की मदद क्यों नहीं ली गई?

18 दिसंबर 1997 को सुप्रीम कोर्ट ने इन बातों को निपटा दिया था. अब सात साल के बाद यदि कहा जाए कि नोटिफिकेशन दिखाओ, तो यह संभव नहीं है.

वैसे मेरा दावा है कि रिकॉर्ड ज़रूर होगा. अब मुश्किल यह है कि साल 2006 के कोलगेट के बारे में रिकॉर्ड नहीं मिल रहे. इसकी प्रक्रिया तो पहली अप्रैल 1962 को ही शुरू हो गई थी. तो इतने पुराने रिकॉर्ड कैसे मिलेंगे.

इसी समय कोर्ट का सवालिया निशान क्यों?

सीबीआई को लेकर पहले से तमाम तरह की बहसें चल रही हैं. इसका मतलब ये नहीं कि असम हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला नामंज़ूर कर दिया. न इसका यह मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कोलगेट या टूजी में जो फ़ैसला दिया था, वो ग़लत था.

इसका यह मतलब नहीं कि आप पुलिस एजेंसी नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट में जो जज बनकर आते हैं, वे बेहद प्रतिभाशाली होते हैं. सभी के सभी लगभग मुख्य न्यायाधीश रह चुके होते हैं.

मैं असम हाईकोर्ट की मंशा पर शक नहीं कर रहा. लेकिन आप अगर ये मान लें तो पटना हाईकोर्ट ने जो चारा घोटाले में फ़ैसला दिया धा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था, तो वो भी ग़लत हो गया.

मुख्य न्यायाधीश को सलाम कि उन्होंने किसी को बोलने का मौक़ा नहीं दिया. हमें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास बनाए रखना होगा.

सीबीआई को क़ानूनन मज़बूती क्यों नहीं दी गई?

सीबीआई
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई को असंवैधानिक क़रार दिया था.

एक प्रविष्टि में लिखा है कि सरकार के पास शक्ति है कि वह सेंट्रल ब्यूरो ऑफ सेंट्रल इंटेलीजेंस एंड इंवेस्टिगेशन एजेंसी का गठन करे.

हाईकोर्ट जज ने इसकी व्याख्या की है कि सीबीआई सामान्य जांच के लिए बनाई गई है न कि अन्वेषण कार्यों के लिए. मैं हाईकोर्ट की इस व्याख्या से सहमत नहीं हूं.

जांच-पड़ताल के बारे में स्थिति साफ़ क्यों नहीं?

प्रधानमंत्री ने खुद भी कहा है कि नीतियों से जुड़े मामलों पर सीबीआई को सतर्क रहने की ज़रूरत है. सीबीआई ने अपनी मर्जी से यह नहीं किया है. यह फ़ैसला तो सुप्रीम कोर्ट ने दिया.

सीबीआई की स्थिति थोड़ी अस्पष्ट तो है. अंततः ये सरकार की ही रचना है, पर ये लाखों की संख्या में रिपोर्ट करती है.

क़ानून की अंतिम व्याख्या सुप्रीम कोर्ट करती है. रिपोर्ट में यही कहा गया है कि जब पीएम कोयला मंत्री थे, तो ढाई करोड़ का भुगतान किया गया था.

दो कोयला फैक्ट्री के निदेशक बनाए गए. उनकी गवाही को कोई भी आगे नहीं आया.

जो गवाह आया भी वो मुकर गया. हमारे देश में गवाहों की सुरक्षा को लेकर कोई क़ानून नहीं है.

क्या करने की ज़रूरत है?

सीबीआई को वो ओहदा देने की ज़रूरत है जो चुनाव आयोग और कैग का है. इसके बाद कोई भी इसके काम में दख़ल नहीं देगा.

सुप्रीम कोर्ट
उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को असंवैधानिक क़रार देने के गुवाहाटी हाईकोर्ट के फ़ैसले पर फ़िलहाल रोक लगा दी है.

किसी न किसी पर तो हमें विश्वास करना ही होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद कहा है कि सारे अधिकारों का इस्तेमाल चोरों, गुंडों और बदमाशों को छोड़ने के लिए किया जा रहा है, न उन्हें सज़ा दिलाने के लिए.

क्या आप स्वायत्त और जवाबदेह सीबीआई के पक्ष में हैं?

हां, जांच एजेंसी को स्वायत्त होने की ज़रूरत है. हालांकि संसदीय एजेंसियां उन पर सवाल खड़े कर सकती हैं.

मैं यह नहीं कहता कि सीबीआई को पूर्ण अधिकार देकर उसे निरंकुश बना दिया जाए. उस पर निगाह रखे जाने की ज़रूरत है.

सीएजी और चुनाव आयोग भी हिंदुस्तान में ही काम कर रहे हैं, बहुत अच्छी तरह से. तो कानून के जरिए सीबीआई को ऐसा ही बनाए जाने की ज़रूरत है. काम की सीमाएं संविधान तय करे.

(बीबीसी संवाददाता स्वाति बख्शी की बातचीत पर आधारित)

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