ये विधानसभा चुनाव क्यों सेमीफ़ाइनल नहीं हैं?

  • 18 नवंबर 2013
राहुल गांधी

पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों को हर तरफ अगले साल होने वाले आम चुनावों का सेमीफ़ाइनल कहा जा रहा है.

लेकिन इन्हें सेमीफ़ाइनल कहना सही नहीं होगा. इसकी पहली वजह तो यही है कि सेमीफ़ाइनल दो में से एक दावेदार को रेस से बाहर कर देता है.

लेकिन आठ दिसंबर को जब विधानसभा चुनाव के वोट खुलेंगे तो ऐसा नहीं होने जा रहा है.

दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम में होने वाले इन विधानसभा चुनावों के नतीजे भले ही कुछ भी रहें, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी मैदान में बनी रहेंगी. साल 2014 के आम चुनावों के लिए उनके बीच एक दूसरे को पछाड़ने की रेस जारी रहेगी.

ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा उत्तर भारत में मज़बूत हो रही है और पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी की रैलियों में बड़ी संख्या में लोग उमड़ रहे हैं. अब भले ही बात कानपुर, रेवाड़ी और दिल्ली की हो या फिर पटना और छत्तीसगढ़ की.

निश्चित रूप से भारत के शहरी मध्य वर्ग के बीच वो खासे लोकप्रिय हैं. मोदी के प्रशंसकों में बहुत से युवा और पहली बार वोट देने वाले शामिल हैं. मोदी की रैलियों में ये लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.

भाजपा: '225 सीटों पर अस्तित्व नहीं'

मोदी ने सोशल मीडिया का भी बख़ूबी इस्तेमाल किया है जबकि कांग्रेस इस मामले में उनसे पीछे रही है.

नरेंद्र मोदी

मिज़ोरम को छोड़ कर जिन चार राज्यों के चुनावों पर ख़ास तौर से नज़र है, वहां लोकसभा की 72 सीटें हैं. बेशक इन चुनावों से एक संकेत मिलेगा कि उत्तर भारत में राजनीतिक रूप से क्या हवा चल रही है.

नरेंद्र मोदी जानते हैं कि दिल्ली में प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुंचने के लिए उन्हें उत्तर और पश्चिमी भारत की ज़्यादातर लोकसभा सीटों को अपनी झोली में डालना होगा.

भले ही देश भर में मोदी के लिए व्यापक समर्थन हो, लेकिन पूर्वी और दक्षिणी भारत में भाजपा की कोई मौजूदगी नहीं है जिससे वहां इस समर्थन को सीटों में बदला जा सके.

देश भर में 225 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा का लगभग कोई अस्तित्व नहीं है. वैसे 182 सीटों के बूते 1998 में ‘उदारवादी’ वाजपेयी सरकार बनाने के लिए 24 पार्टियों को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब रहे थे.

बहुत से लोग मानते हैं कि दिल्ली की गद्दी पर दावेदारी के लिए मोदी को 200 या उसके आसपास सीटें जीतनी होंगी.

यही वजह है कि अगर भाजपा दिल्ली और राजस्थान को कांग्रेस से छीन लेती है और छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में साल 2008 के मुक़ाबले अपनी स्थिति को सुधारती है, तो इससे मोदी की मुहिम को मज़बूती मिलेगी.

दिल्ली पर दांव

दूसरी तरफ (मिज़ोरम से अलग) दोनों पार्टियों को दो-दो राज्यों में जीत मिलती है तो इससे कांग्रेस को नयी ऊर्जा मिलेगी.

अरविंद केजरीवाल

इससे पार्टी को आम चुनावों के लिए नया जोश मिलेगा. फिलहाल उसका मनोबल ख़ासा कमज़ोर नज़र आता है.

हालिया सर्वे और अन्य बातों पर ग़ौर करें तो छत्तीसगढ़ में मुक़ाबला बेहद नज़दीकी नज़र आता है.

राजस्थान भाजपा की झोली में जा सकता है हालांकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चुनाव से पहले आख़िरी छह महीने में अपना बटुआ खोला और कल्याणकारी योजनाओं पर खुल कर ख़र्च किया है.

उधर मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य की मुहिम का असर देखने को मिला है लेकिन कांग्रेस ने अपना ये पत्ता बहुत देर से चला.

बात दिल्ली की करें तो उसकी अहमियत विधानसभा की 70 और लोकसभा की सात सीटों से कहीं ज़्यादा है.

दिल्ली को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं. कांग्रेस को अपने 15 साल के शासन की सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है.

भाजपा को इसका स्वाभाविक तौर पर फ़ायदा मिलना चाहिए था, लेकिन पार्टी की अंदरूनी खींचतान और हर्षवर्धन को देर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से पार्टी ऐसा नहीं कर पाई.

विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

इसके अलावा आम आदमी पार्टी भी नई राजनीतिक ताकत के तौर पर उभरी है, ख़ास कर दोनों बड़ी पार्टियों से ऊब चुके मध्य वर्ग के कुछ हलकों में उसे लेकर उत्साह देखा जा सकता है.

अरविंद केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस और भाजपा, दोनों के वोटों में सेंध लगा रही है. हालांकि ये देखना बाक़ी है कि उन्हें आख़िरकार कितनी सीटें मिलती हैं.

राहुल और प्रियंका की भूमिका

अगर शीला दीक्षित लगातार चौथी बार जीत दर्ज करने में कामयाब रहती हैं तो वो उन नेताओं की सूची में शामिल हो सकती है जिन्हें केंद्र में तीसरी बार यूपीए की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों के तौर पर देखा जा सकता है.

दोनों पार्टियों के खाते में दो-दो राज्य आने की स्थिति में राहुल गांधी को कांग्रेस के नेता के तौर पर पेश किया जा सकता है, भले ही उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाया जाए.

साल 2014 में राहुल गांधी की क्या भूमिका होगी, ये तय करने के लिए अभी कांग्रेस को दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावी नतीजों का इंतजार है.

चुनाव परिणाम दो-दो रहने की स्थिति में प्रियंका गांधी को रायबरेली की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया जा सकता है. इस सीट का प्रतिनिधित्व अभी उनकी मां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी करती हैं.

जिन राज्यों में चुनाव हो रहा है, बेशक वो 2014 के लिए कांग्रेस की रणनीति में अहम स्थान रखते हैं.

अगर कांग्रेस का प्रदर्शन विधानसभा चुनावों में अच्छा नहीं रहता है तो कांग्रेस के सामने सोनिया गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा.

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