कठपुतली कॉलोनीः मोहल्ला है या मायानगरी?

  • 14 नवंबर 2013
कठपुतली कला

कठपुतली के तमाशे और जादू के खेल को भारत में पारंपरिक मनोरंजन की मशहूर विधाओं में गिना जाता है. दिल्ली में ही कठपुतली कलाकारों का एक ऐसा इलाका है जहाँ कला की इस शैली से रूबरू हुआ जा सकता है.

यहाँ रहने वाले हज़ारों कठपुतली कलाकार इस दम तोड़ती कला को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. कठपुतली कलाकारों की इस झुग्गी को कहीं और ले जाकर बसाने की सरकारी योजना ने यहाँ रहने वाले लोगों की चिंताएँ बढ़ा दी हैं.

यहाँ ज़िंदगी हर रोज़ एक जंग की तरह मालूम होती है. कठपुतली कॉलोनी नए और पुराने भारत के एक सिरे पर बसी हुई है.

कठपुतलियों की रंग-बिरंगी दुनिया

तीन हज़ार परिवारों की रिहाइश वाली इस कॉलोनी का पंजीकरण अभी तक नहीं हुआ है. लेकिन इसके आस-पास का माहौल आधुनिकता की झलक दिखलाता है.

इस कॉलोनी के पास ही एक मेट्रो स्टेशन है, एक दूध की डेयरी का प्लांट और एक तमाम सुविधाओं वाला अस्पताल.

एक प्राइवेट रीयल-एस्टेट डेवलपर को अरबों रुपए की इस ज़मीन पर एक आवासीय परिसर और शॉपिंग मॉल बनाने का ठेका मिला है.

कठपुतली कॉलोनी की ओर जाने वाली संकरी सी गली को कोई नज़रअंदाज करके भले ही गुज़र जाए लेकिन कॉलोनी के भीतर से आने वाली ढोलक की ढम-ढम की आवाज पर गौर किए बगैर आगे बढ़ना मुश्किल है.

कठपुतली कला

कॉलोनी की तंग गलियाँ, बेतरतीबी से बसे घर, बिजली और पानी के अवैध कनेक्शन, खुली नालियाँ और नंगे पाँव खेलते बच्चे, झुग्गी झोपड़ियों में पेश आने वाली ऐसी तमाम मुश्किलों के बावजूद कुछ असाधारण प्रतिभा वाले कठपुतली कलाकार इस मोहल्ले को अपना घर बनाए हुए हैं.

सृजन का समंदर

पूरन भाट पेशे से एक पारंपरिक कठपुतली कलाकार हैं और इस कॉलोनी में वे पिछले 50 सालों से रह रहे हैं.

वे कहते हैं, "हमारे पुरखे बंजारा कलाकार थे. उन्हें यहाँ पर काम मिला तो यहीं बस गए. इस कॉलोनी में कई कलाकार रहते हैं. वे कठतपुतली का तमाशा दिखाते हैं, जादूगरी जानते हैं, लोकगायकी, पेंटिंग, नृत्य, नटबाजी और किस्सागोई करते हैं. ऐसा बहुत कम होता है कि ये सभी चीजें एक जगह पर मिल जाएं. ये एक जादूनगरी है."

कठपुतली कॉलोनी के बांशिदों को एक कमरे का घर दिए जाने का वादा किया गया है लेकिन ज़्यादातर लोगों को इस पर संदेह है.

कई कलाकारों के पास इस मुसीबत को सुलझाने के लिए नए विचार हैं लेकिन कठपुतली कॉलोनी के बाशिंदों को लगता है कि सरकारी अफसर उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया है.

रोबोटिक कठपुतलियों की डिजिटल सफारी

पूरन भाट कहते हैं, "हमें यहाँ से हटाने की बजाय सरकार को हमारी कॉलोनी को सैलानियों की सैरगाह में बदल देना चाहिए ताकि लोग यहाँ आकर हमारी दुनिया को महसूस कर सकें. हम कूटनयिकों और विदेशी मेहमानों के सामने अपना फन पेश करते हैं. हम भारत की तहजीब की नुमाइंदगी करते हैं लेकिन जब हमारी भलाई की बात आती है तो सरकार हमसे मुँह मोड़ लेती हैं."

इस कॉलोनी में देश भर की विभिन्न जातियों और अलग-अलग हिस्सों से आए लोग भरे पड़े हैं. आंध्र प्रदेश से आए किशन टेनिस बॉल से बाजीगरी करते हैं.

कठपुतली कला

एक कोठरी के घर में वे पत्नी और पाँच बच्चों के साथ रहते हैं. इसमें एक नवजात भी है. घर में कोई शौचालय नहीं है. उनके जुड़वाँ बेटों में से एक कुपोषण की वजह से कुछ महीने पहले मर गया था.

एक गैरसरकारी संगठन की मदद से किशन को शराब से छुटकारा दिलाने और लीवर के इलाज के लिए ब्रिटेन भेजा जा रहा है.

किस्सागोई

पूरन कहते हैं, "टेलीविजन, वीडियो, मोबाइल फोन और मनोरंजन के दूसरे साधनों से हम पिछड़ रहे हैं. कई लोगों ने यहाँ काम करना चुना है लेकिन कुछ छोड़ कर भी गए हैं क्योंकि जिंदगी यहाँ मुश्किल मालूम होती है. यहाँ पैसे की तंगी है."

पूरन और उनके साथी कलाकार ऐसे असंगठित क्षेत्र से जुड़े हुए हैं जिनके लिए दिल्ली जैसे महँगे शहर में गुजर-बसर करना मुश्किल होता जा रहा है.

इसके अलावा कठपुतली के खेल-तमाशे जैसी दम तोड़ती लोक कलाओं को बचाए रखने की चुनौती उनकी चिंता को बदस्तूर बढ़ा रही है.

करीने से सजी रोशनी और संगीत के साथ स्टेज पर पूरन और उनके समूह के साथी कलाकारों ने एक लोक कथा पेश की.

लोक कथा "अमर सिंह राठौड़ की कहानी" का मंचन देखकर स्तब्ध रह गए. बेजान चीजों को बातें करते और उन्हें नाचते देख बच्चों की विस्मय से खुली रह गईं थीं. वे ये समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर ये बेजान कठपुतलियाँ बातें कैसे कर लेती हैं.

कठपुतली कला

पेशे से स्कूल टीचर गीता शर्मा भी अपने बच्चे के साथ ये कठपुतली शो देखने आई थीं. उन्होंने बीबीसी से कहा, "किस्सागोई करने का ये अनूठा तरीका है. खासकर उनकी बहुरंगी पोशाकें. 10 साल की उमर तक वाले बच्चों ने खूब मजा किया."

मुख्य धारा

कुछ ऐसे नौजवान भी हैं जो अपनी मर्ज़ी से कठपुतली कलाकारों के लिए वक्त निकाल रहे हैं.

कॉलेज छात्र स्वायन इन्हीं में से एक हैं. वे कठपुतली कला को मुख्य धारा का हिस्सा बनाने के लिए कोशिश कर रहे हैं. वे कहते हैं, "हम दो-तीन स्कूलों में गए. बच्चों को इन विधाओं में दिलचस्पी थी. इससे वे लोक कलाओं को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं."

सरजू एक नौजवान कठपुतली कलाकार हैं और उन्हें इस कला के हालात बदलने की उम्मीद है.

उन्होंने कहा, "हम कुछ नौजवान लोग हैं, चाहें तो कोई दूसरा पेशा भी चुन सकते हैं लेकिन हम पूरी मेहनत करेंगे कि ये कला आगे बढ़े और कला की दुनिया के शीर्ष पर पहुँचे."

सरजू की भावनाएँ इस कॉलोनी में रहने वाले नौजवानों के दिल की बात है.

गरीबी, नाउम्मीदगी और लोक कलाओं से लोगों की विमुखता जैसी वजहों से मुमकिन है कि ये सब किस्से कहानियों का हिस्सा बनकर रह जाएंगी.

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