बस्तर के रास्ते बनेगी छत्तीसगढ़ में सरकार

  • 8 नवंबर 2013

छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा के चुनाव के पहले चरण में कुल मिलकर 18 सीटें हैं. इनमें से 12 सीटें बस्तर में हैं.

अविभाजित मध्य प्रदेश के दिनों में भी चुनाव के दौरान ये इलाका काफी महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि 12 सीटें काफी उलट पलट करने का माद्दा रखती हैं.

बाक़ी की 6 सीटें गाँव और डोंगरगढ़ की हैं. राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमण सिंह एक बार फिर चुनाव लड़ रहे हैं.

इस बार के चुनाव में बस्तर को लेकर दोनों प्रमुख राजनितिक दल यानी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी नें अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

यहाँ 12 में से 11 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास है जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक ही सीट मिल पाई. इसलिए ये कहा जा रहा है कि "बस्तर में भाजपा के पास खोने के लिए सब कुछ और पाने के लिए कुछ भी नहीं" है.

सत्ता विरोधी लहर

भाजपा की कोशिश है कि इस बार बस्तर के इलाके से वो अपनी 6 सीटें भी बचाने में कामयाब रहे तो गद्दी का रास्ता साफ़ हो जाएगा. मगर पार्टी के लिए बस्तर की डगर उतनी आसान भी नहीं है क्योंकि इस इलाके से चुने गए उनके कई विधायकों के खिलाफ 'एंटी-इनकम्बेंसी' यानी सत्ता विरोधी लहर का मुद्दा एक बड़ी चुनौती है.

बस्तर से भाजपा के तीन मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं जिनमे कोंडागांव से लता उसेंडी, नारायणपुर से केदार कश्यप और अंतागढ़ से विक्रम उसेंडी शामिल हैं. इसके अलावा बीजापुर से संसदीय सचिव महेश घाघडा की किस्मत भी दाव पर लगी है. इत्तेफाक से इन चारों को इस बार मुश्किलों का सामना करना पढ़ रहा है.

बस्तर में इस बार कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं. खास तौर पर 28 मई को बस्तर के दर्भा इलाके में हुए नक्सली हमले के बाद जिसमें सलवा जुडूम के जन्मदाता महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और वरिष्ट नेता विद्याचरण शुक्ल मारे गए थे.

कांग्रेस इस घटना की सुहानुभूति के सहारे बस्तर में चुनाव लड़ना चाह रही है. यही वजह है कि जगह जगह पर पार्टी ने महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल की तस्वीरें लगाकर लोगों से इनकी क़ुरबानी को याद रखने की अपील की है.

मतदान पर दारोमदार

पार्टी को लगता है कि घटना के बाद बस्तर की आम जनता की हमदर्दी उनके साथ है और इसलिए वो इस बार अपनी स्थिति को बेहतर होता देख रहे हैं. वैसे भी कांग्रेस को इस इलाके से पिछले चुनाव में सिर्फ एक ही सीट मिली थी और वो भी कोंटा से कवासी लखमा की.

मगर इस बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को भी बस्तर से दो सीटों की उम्मीद है. एक सीट कोंटा की जहाँ से आदिवासी नेता मनीष कुंजाम लड़ रहे हैं और दूसरी सीट दंतेवाडा की जहाँ बोदाराम कवासी लड़ रहे हैं.

कांग्रेस नें महेंद्र कर्मा की विधवा देवती कर्मा को दंतेवाडा से खड़ा किया है. हलाकि पिछले चुनाव में इस सीट पर महेंद्र कर्मा तीसरे स्थान पर आये थे और सीट भारतीय जनता पार्टी के भीमा मंडावी की झोली में गयी थी, इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद लोगों में देवती के प्रति सुहानुभूति है.

लेकिन सब कुछ निर्भर करता है मतदान के प्रतिशत पर क्योंकि सुदूर इलाकों में कम या नहीं के बराबर मतदान होता आया है. पूरे बस्तर में अस्सी प्रतिशत मतदान केंद्र अति संवेदनशील घोषित किए गए हैं.

इस बार भी मतदान प्रतिशत ज्यादा न होने की संभावना हैं क्योंकि दक्षिण बस्तर का एक बड़ा इलाक़ा है जहाँ के लोग अपना मत इसलिए नहीं डाल पाएंगे कि उनके मतदान केन्द्रों को स्थानांतरित कर दिया गया है.

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