कहाँ खो गई 'बॉबी' वाले शैलेंद्र की आवाज़

  • 8 नवंबर 2013
बॉबी, ऋषि कपूर, डिंपल कपाड़िया
बॉबी ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की पहली फ़िल्म थी.

राज कपूर की फ़िल्म बॉबी ने 2013 में अपने 40 साल पूरे किए हैं. जितनी ये फ़िल्म ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की हिट जोड़ी, प्राण और प्रेम नाथ की एक्टिंग, इसमें पहने गए फ़ैशनेबल कपड़ों के लिए मशहूर हुई थी, उतनी ही ये मशहूर हुई थी अपने गीत, संगीत और इसके बोलों के लिए.

मैं शायर तो नहीं मगर ऐ हसीं...इस एक गाने ने ऋषि कपूर और इस गीत के गायक शैलेंद्र सिंह को रातों-रात लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया था. हालांकि 1970 और 1980 के दशक के बाद शैलेंद्र फ़िल्मी परिदृश्य से ओझल से हो गए.

बॉबी के रिलीज़ के 40 साल पूरे होने पर बीबीसी ने शैलेंद्र सिंह से ख़ास बातचीत की.

पुराने दिनों को याद करते हुए शैलेंद्र कहते हैं, "उन दिनों में फ़िल्म इंस्टीट्यूट पूणे में एक्टिंग का कोर्स कर रहा था. साठे साहब मशहूर पब्लिसिस्ट थे. वे मुझे राज कपूर साहब के पास ले गए. वो बॉबी फ़िल्म में ऋषि कपूर को लॉंच करना चाहते थे. सभी दिग्गज गायक, रफ़ी साहब, किशोर दा, मन्ना दा, मुकेश साहब, महेन्द्र कपूर अपने करियर चरम पर थे लेकिन राज कपूर साहब को एक नई आवाज़ चाहिए थी. वो कहते थे कि हीरो 16 साल का लड़का है इसलिए गायक को भी लगभग इसी उम्र का होना चाहिए. वो मुझे लक्ष्मीकांत प्यारेलालजी के पास ले गए. ऑडिशन के बाद यह तय हुआ कि बॉबी के गाने मैं ही गाऊंगा. इस तरह बॉबी से मेरा करियर शुरू हुआ."

बॉबी के 40 साल :जब गाँवों से चलती थी बॉबी बस

शैलेंद्र सिंह उस समय ख़ुद भी लगभग 20-21 साल के थे और मैं शायर तो नहीं उनकी ज़िंदगी का पहला गाना था.

पहले गाने की यादों को टटोलते हुए उन्होंने बताया, "इसके लिए 10-15 दिन रिहर्सल की थी. बॉबी फ़िल्म का मुहूर्त मेरे इस गाने से हुआ था. लता जी ख़ुद मुझे आशीर्वाद देने आई थीं. ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी."

'लताजी की जगह राज कपूर ने गाया था गाना'

राज कपूर
राज कपूर का मानना था कि गीतों के बोल बिल्कुल सरल होने चाहिए.

बॉबी और राज कपूर को याद करते हुए शैलेंद्र सिंह का कहना था,"राज कपूर को गानों और संगीत की बहुत समझ थी. रिकॉर्डिंग और रिहर्सल में वो बेहद दिलचस्पी लेते थे. एक गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान लता जी आई नहीं थीं. इस दौरान गाने में मैं अपना हिस्सा गा रहा था और लता जी का हिस्सा राज कपूर गा रहे थे. उन्हें पूरा गाना याद था. फ़िल्म बनाने को लेकर राज साहब में ग़ज़ब का जुनून था."

बॉबी का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने दिया था. शैलेंद्र कहते हैं कि दोनों के स्वभाव में बहुत अंतर था. लक्ष्मीकांत हमेशा मस्ती के मूड में रहते थे जबकि प्यारे भाई रिज़र्व रहने वाले इंसान थे. लेकिन दोनों ने मुझे सहज बना दिया था और कहा कि ऐसा मत सोचना कि पहली बार गा रहे हो. पहली ही फ़िल्म में मुझे लता जी और मन्ना दा के साथ काम करने का मौक़ा मिला.

बॉबी के बाद भी शैलेंद्र ने ऋषि कपूर के लिए कई गाने गाए और उन्हें ऋषि की आवाज़ कहा जाने लगा. उनके साथ अपने रिश्ते को वे ख़ास मानते हैं.

ऋषि कपूर को वो कुछ यूँ याद करते हैं, "उनके साथ मेरा एक अलग तरह का लगाव है. उनके लिए गाने में मुझे बहुत मज़ा आता था. वो मेरे अच्छे दोस्त हैं. जब भी हम दोनों में बात होती है तो हम बॉबी के दिनों को याद करते हैं. तब उन्होंने मुझे अपनी एक फ़ोटो दी थी जिसके पीछे लिखा था मैं शरीर हूं और तुम मेरी आवाज़. वो फ़ोटो अब भी मेरे पास है और वो रिश्ता अब भी बरक़रार है."

शैलेंद्र सिंह ने अपने करियर में कई हिट गाने गाए, जिसमें मैं शायर तो नहीं, झूठ बोले कौवा काटे, हमने तुमको देखा, एक दिन तुम बहुत बड़े बनोगे ( अंखियों के झरोखो से) जैसे गानें शामिल हैं.

'सब गायक एक जैसा गाते हैं'

बॉबी फ़िल्म
बॉबी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर बेहद कामयाब रही थी.

गायकों की बात करें तो शैलेंद्र सिंह मोहम्मद रफ़ी के बड़े फ़ैन हैं. रफ़ी की तारीफ़ों के पुल बांधते हुए वे कहते हैं,"मैं हमेशा से मोहम्मद रफ़ी का फ़ैन था और हमेशा रहूंगा. वैसा गायक कोई दूसरा नहीं हो सकता."

फ़िल्म इंस्टीट्यूट पुणे में एक्टिंग का कोर्स करने वाले शैलेंद्र सिंह इसे किस्मत का खेल मानते हैं कि वे गायक बने. एक्टिंग की पढ़ाई करते हुए वे पुणे से हर शनिवार अपने गुरु से गाना सीखने के लिए मुंबई जाया करते थे.

वे कहते हैं,"गायक बनने का इरादा नहीं था, लेकिन मैं शौक के लिए गाता था. लेकिन इसे कहते हैं नियति. गाने में मुझे इतना मजा आने लगा कि फिर मुझे एक्टिंग में मजा ही नहीं आता था."

उन्होंने चंद फ़िल्मों में एक्टिंग भी की थी जिसमें रेखा के साथ फ़िल्म भी शामिल थे. अपने उन दिनों पर खुद ही चुटकी लेते हुए शैलेंद्र ने कहा, "एक्टिंग में मैंने अपने हाथ जलाए थे. चूंकि मैंने एक्टिंग कोर्स किया था इसलिए दो चार फ़िल्मों में काम किया था. लेकिन मुझे मजा नहीं आया. उसके बाद मैंने फ़िल्मों में काम करना छोड़ दिया."

मौजूदा दौर के गीत-संगीत से शैंलेंद्र कुछ ख़ास प्रभावित नहीं हैं. उन्होंने कहा, "अफ़सोस है कि आज़ के दौर में मेलोडी खत्म हो गई है और बोलों में अश्लीलता का प्रचलन बढ़ा है. इससे कोई फ़िल्म हिट नहीं होती. लोग फ़िल्म देखने आते हैं, आइटम नंबर देखने नहीं. ऐसे गाने 10-15 दिन चलते हैं. राज साहब हमेशा कहते थे कि गाना इतना सिम्पल होना चाहिए जो सबकी जुबान पर चढ़ जाए. आजकल के सभी गायक भी एक ही तरह के लगते हैं, ऐसा नहीं हैं कि वो अच्छा नहीं गाते, लेकिन ये पता ही नहीं चलता कौन गा रहा है."

बात-बातों में रुख फिर बॉबी की ओर मुड़ा. उस साल सर्वश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार नरेंद्र चंचल को मिला था बॉबी के गाने 'बेशक मंदिर मस्जिद' के लिए. हालांकि शैलेंद्र भी 'मैं शायर तो नहीं...' के लिए नामांकित हुए थे.

इंटरव्यू ख़त्म होते-होते मैंने उनसे पूछा कि आखिर क्या वजह थी कि बॉबी के गीत-संगीत और गायकी को इतना सराहा गया लेकिन इसे पुरस्कार समारोहों में बहुत कम अवॉर्ड मिले.

इस पर साफगोई से जवाब देते हुए वे बोले, "मुझे भी बॉबी के लिए बेस्ट सिंगर का अवार्ड ऑफर हुआ था, लेकिन मैंने मना कर दिया था. मैं वजह नहीं बता सकता. फिर उन्होंने ये पुरस्कार नरेंद्र चंचल को दे दिया. भारत में अवॉर्ड की कोई अहमियत नहीं है अच्छे गानों को अवॉर्ड नहीं मिलता है. जो गाना हिट हो जाता है उसे अवॉर्ड दे दिया जाता है. ये सिलसिला पहले भी था लेकिन अब तो यह बिजनेस हो गया है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार