पटेल की प्रतिमा और मोदी की सियासत

  • 3 नवंबर 2013
सरदार पटेल की प्रस्तावित प्रतिमा की प्रतिकृति

जब से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राज्य में देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल की मूर्ति की आधारशिला रखी है, तब से देश में धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर बहस छिड़ी हुई है.

सरदार पटेल के व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा के बारे में बड़े बड़े विद्वानों के लेख प्रकाशित हो रहे हैं.

सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सबसे क़रीबी साथियों में से थे और वे कांग्रेस पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता थे.

ऐसे में ये सवाल महत्वपूर्ण है कि आखिर भाजपा ने कांग्रेस के एक नेता को देश के महानायक के रूप में पेश करने का फैसला क्यों किया?

ये प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति होगी. ये अमरीका की मशहूर स्टेचयू ऑफ लिबर्टी की मूर्ति से ढ़ाई गुना ऊँची होगी. सरदार पटेल को भारत के लौह पुरुष कहा जाता है और इसीलिए इस प्रतिमा को लोहे का बनाया जा रहा है.

'पटेल वाली धर्मनिरपेक्षता चाहिए'

लेकिन ये प्रतिमा इन खूबियों के कारण सुर्खियों में नहीं है, बल्कि चर्चा इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस के टकराव को लेकर है.

नए नायक की जरूरत

आजादी के बाद 65 सालों में सिर्फ दस वर्ष को छोड़कर देश में कांग्रेस ने ही राज किया है. कांग्रेस नेहरू गांधी परिवार में इतनी रच बस गई है कि वह इससे बाहर कुछ देख ही नहीं पाती.

नरेंद्र मोदी, आडवाणी, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान

आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी और नेहरू के अलावा दर्जनों बड़े नेता शामिल थे, देश की आजादी में जिनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. इन नेताओं की राजनीतिक अंतर्दृष्टि ने एक आजाद और एक आधुनिक हिंदुस्तान में अहम भूमिका अदा की. ये वो नेता थे जिनके निःस्वार्थ बलिदान से एक नए भारत की नींव रखी गई.

सरदार पटेल की विरासत पर जंग

लेकिन समय बीतने के साथ कांग्रेस ने नेहरू गांधी के अलावा बाकी सारे नेताओं को इतिहास के पन्नों में गुम कर दिया. कांग्रेस में एक ही परिवार का गुणगान इस हद तक पहुँच गया है कि बंदरगाहों, हवाई अड्डों, नहरों, स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सड़कों, सरकारी योजनाओं और यहां तक कि मोहल्लो के नाम भी नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर मिलते हैं.

बहुत मुश्किल से किसी अन्य नेता का नाम दिखाई देता है. इस तरह की बातों से देश की जनता ऊब चुकी है. उन्हें एक नया आईकन, नए रोल मॉडल और नए नायक की तलाश है.

नरेंद्र मोदी लोगों की इस चाहत को अच्छी तरह से महसूस कर रहे हैं लेकिन भाजपा का दुर्भाग्य ये रहा है कि पिछली एक सदी में अलग-अलग रूपों में हिंदूवादी आंदोलन कोई बड़ा नेता नहीं दे सका. हिंदुत्व के झंडाबरदार गांधी जी को इसलिए स्वीकार न कर सके क्योंकि वह उनके अहिंसा के दर्शन को हिन्दुओं की कमज़ोरी के तौर पर देखते थे.

विश्लेषकों के मुताबिक महात्मा गांधी को बहुत से लोग मुस्लिम समर्थक भी मानते थे. इसके विपरीत एक अर्से से भाजपा और कई हिन्दूवादी विद्वान और इतिहासकार सरदार पटेल को एक हिंदू समर्थक नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

विचारधारा

सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू

ये भी बताने की कोशिश की गई कि पटेल नेहरू से ज्यादा सक्षम थे और सैद्धांतिक तौर पर उन्हें प्रधानमंत्री होना चाहिए था लेकिन नेहरू और गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया.

सरदार की सियासत पर किसका दावा?

पटेल की मूर्ति ने कांग्रेस को इसलिए मुश्किल में डाल दिया है कि भाजपा ने न केवल उनके एक नेता को अपना आदर्श बनाकर पेश कर दिया बल्कि उन्हें एक हिंदू समर्थक नेता के रूप में पेश किया जा रहा है जो कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता के विचार से सहमति नहीं रखते थे.

दरअसल राजनीतिक मूर्तियों की यह लड़ाई संसदीय चुनावों में संघर्ष के तेवर बढ़ा रही है. भाजपा मूलतः हिन्दूवादी पार्टी है. हालांकि वह चुनाव में बेहतर व्यवस्था के नारे के साथ उतरी है लेकिन हिंदुत्व के चोले को वो अलग नहीं कर सकी है.

अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा कभी भी राष्ट्रवाद तो कभी राजनीतिक मूर्तियों का इस्तेमाल कर लेती है लेकिन मूर्तियों की राजनीति से जनता ही नहीं अब राजनीतिक दल भी उकताने लगे हैं.

सरदार पटेल की मूर्ति की आधारशिला रखे जाने पर जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि भारत मूर्तियों का कबाड़ खाना बन चुका है.

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