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जासूसी से बचने को भारत विकसित कर रहा है निगरानी तंत्र?

 शनिवार, 2 नवंबर, 2013 को 18:14 IST तक के समाचार

अमरीका और ब्रिटेन जहां दूसरे देशों की जासूसी के आरोपों से बचने का रास्ता ढूंढ रहे हैं वहीं कई देश अमरीका के पूर्व जासूस एडवर्ड स्नोडेन के खुलासे से सबक लेकर बड़े पैमाने पर निगरानी के लिए वही तकनीक विकसित कर रहे हैं.

आलोचकों का कहना है कि भारत भी इन देशों में से एक है.

भारतीय एजेंसियां विदशी साइबर जासूसी को रोकने के लिए कई कदम उठा रही हैं. इनमें इंटरनेट ट्रैफ़िक को अपनी सीमाओं में लाने और अधिकारियों के जीमेल और अन्य बाहरी ईमेल सेवाओं के इस्तेमाल पर रोक की योजना शामिल है.

इसके ख़िलाफ़ अभियान चला रहे लोगों का मानना है कि भारत सरकार का इलेक्ट्रॉनिक जासूसी कर रहे अपने ही जासूसों पर नियंत्रण कम हो रहा है.

इसके अलावा भारत अपना एक व्यापक निगरानी तंत्र भी बनाने की ओर अग्रसर है, जिसे आलोचकों ने स्नोडेन के क्लिक करें जासूसी कार्यक्रम के खुलासे का हवाला देते हुए भारतीय प्रिज्म का नाम दिया है.

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी के सुनील अब्राहम कहते हैं, ''स्नोडेन लीक का यह एक नकारात्मक पक्ष रहा है. भारत जैसे देश भी अब ऐसा ही कर रहे हैं."

डाटा की जासूसी

क्लिक करें स्नोडेन ने जो दस्तावेज़ पत्रकार ग्लेन ग्रीनवाल्ड को दिये थे उनमें यह साफ था कि अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) ने भारतीयों से जुड़े करोड़ों डाटा की जासूसी की थी. भारत अमरीका के निशाने पर आए पांच शीर्ष देशों में शामिल था.

लेकिन दूसरे देशों की तरह भारत ने अमरीका की आलोचना करने से परहेज किया है. ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि भारत अपने क्रिया-कलापों की तरफ किसी का ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहता है.

भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने तो हाल ही में अमरीकी करतूत को हल्के में लेते हुए कहा था कि 'वास्तव में यह जासूसी' नहीं थी.

जब क्लिक करें जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने एनएसए द्वारा उनके मोबाइल फोन की जासूसी का खुलासा होने पर चिंता जाहिर की थी तब भारतीय प्रधानमंत्री के कार्यालय इस तरह की किसी संभावना से चिंतामुक्त दिखा था.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा, "हमें किसी तरह की कोई चिंता नहीं है क्योंकि मनमोहन सिंह मोबाइल फोन औऱ जीमेल का प्रयोग नहीं करते हैं."

कई भारतीय अधिकारी इन सेवाओं का प्रयोग करते हैं. लेकिन दिसम्बर से सरकार उनके किसी भी सरकारी काम के लिए निजी ईमेल प्रयोग करने पर रोक लगाने की योजना बना रही है. भारत की यह प्रतिक्रिया एक तरह से अमरीका की जासूसी पर सीधी प्रतिक्रिया है. अब निजी ईमेल की जगह अधिकारियों को सरकारी ईमेल प्रयोग करना होगा.

तेज़ी

ताज़ा ख़बरों के मुताबिक अब एनएसए गूगल में पैठ बनाने की संभावना है. इससे भारतीय प्रयासों में और तेज़ी आने की संभावना है.

भारतीय अधिकारियों के साथ काम करने के बीबीसी के खुद के अनुभव को देखते हुए यह बदलाव लाना आसान नहीं होगा. सरकारी ईमेल प्रणाली में अकसर गड़बड़ी आने के कारण कई अधिकारी जीमेल और याहू का उपयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

सबसे महत्वाकांक्षी योजना तो भारत का आंतरिक इंटरनेट ट्रैफिक को देश के अंदर ही संचालित करने की है. वर्तमान समय में दिल्ली से कोलकाता भेजा गया कोई ईमेल अमरीका या यूरोप के रास्ते जाता है. ऐसा इंटरनेट के डिजाइन और भारतीय क्षमता में कमी के कारण है.

लेकिन स्नोडेन के खुलासों का आकलन करने के लिए हाल ही में हुई एक बैठक में भारत के सुरक्षा प्रमुख ने कहा कि विदेशी निगरानी से बचने के लिए भारतीयों द्वारा भेजे गए सौ प्रतिशत ईमेल औऱ फाइलें भारत के रास्ते ही भेजी जानी चाहिए.

जासूसों का काम

अन्य सरकारें भी इस तरह के कदम उठा रही हैं जिससे न केवल जासूसों का काम मुश्किल हो जाएगा बल्कि इंटरनेट पर भी सरकारों का नियंत्रण बढ़ जाएगा.

आलोचकों का कहना है कि भारत पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ रहा था जबकि किसी में एडवर्ड स्नोडेन का नाम भी नहीं सुना था.

आलोचकों की सबसे बड़ी चिंता उस व्यापक निगरानी तंत्र को लेकर है जिस पर सरकार पिछले कुछ सालों से काम कर रही है. सेंट्रल मॉनीटरिंग सिस्टम सुरक्षा एजेंसियों को ऐसी क्षमता दे सकता है जिससे वे पूरे देश में की जाने वाली सभी फोन कॉल और सुन और रिकॉर्ड कर सकती हैं.

अगर यह जानकारी सही है, तो भारतीय साइबर जासूसों को ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे. उन्हें इंटरनेट और टेलीकॉम कम्पनियों को काबू में करने और फोन टैपिंग की अधिक स्वतंत्रता मिल जाएगी.

भारत सरकार का कहना है कि उसका निगरानी तंत्र का काम चरमपंथियों की साजिशों को नाकाम करना और राष्ट्रीय सुरक्षा के दूसरे ख़तरों को रोकना है. लेकिन ठोस जानकारी के अभाव में इसकी मंशा को लेकर आशंका है.

गोपनीयता बिल, जो कि जासूसी को रोकने में मदद के लिए लाये जाने वाला था, वह स्नोडेन के खुलासे के बाद गर्त में चला गया.

रिपोर्ट

सुनील अब्राहम का कहना है, "भारत की सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है- जब अमरीका ऐसा कर सकता है तो हम क्यों नहीं कर सकते."

भारत के जासूसों को संसदीय और न्यायिक रुप से दिक्कत नहीं है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में खुफिया एजेंसियां सीधे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को रिपोर्ट करती हैं.

सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, ''भारत को अपने संप्रभु अधिकारों को बचाने की जरूरत है. लेकिन ये अभूतपू्र्व शक्तियां हैं.

भारत में इस समय अगले साल होने वाले आम चुनावों का ख़ुमार है और जासूसी जैसे मुद्दों को कोई ज्यादा भाव नहीं दे रहा है.

हालांकि भारत सरकार एनएसए की मुश्किलों से सबक सीख रही है. लेकिन दुग्गल कहते हैं, "देर सबेर सरकार को व्यापक जवाबदेही के मुद्दे को सुलझाना ही होगा."

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