नेताओं के मौखिक आदेशों को न मानें अधिकारी: सुप्रीम कोर्ट

  • 31 अक्तूबर 2013

सुप्रीम कोर्ट ने नौकरशाहों से कहा है कि वो अपने राजनीतिक आकाओं के मौखिक आदेशों का पालन नहीं करें.

अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई मौखिक आदेश मिलता है तो उसे लिखित में दर्ज करने के बाद ही उसका पालन करना चाहिए.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अधिकारियों के बार-बार स्थानांतरण बंद होने चाहिए और उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने के लिए उनका कार्यकाल तय करने का भी सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया.

अदालत का यह निर्णय उस समय आया है जब देश में उत्तर प्रदेश की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल और हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के कथित उत्पीड़न को लेकर बहस जारी है.

सर्वोच्च न्यायालय ने 83 सेवानिवृत्त नौकरशाहों की एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह फ़ैसला दिया.

इन नौकरशाहों में पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम, अमरीका में भारत के पूर्व राजदूत आबिद हुसैन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी, पूर्व चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति और पूर्व सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह शामिल हैं.

बीबीसी से बातचीत में टीएसआर सुब्रहमण्यम ने कहा ''प्रशासन में नीति की भूमिका 5 प्रतिशत है, क्रियान्वयन 95 फ़ीसदी है और क्रियान्वयन नौकरशाही करती है तो उसमें अगर सुधार होगा तो शासन में तुरंत सुधार होगा. .हमने मुख्य रूप से तीन बाते कही थीं कि व्यवस्थागत तैनाती या स्थानांतरण तार्किक होना चाहिए, तैनाती की अवधि निश्चित हो और लिखित आदेश दिए जाए और बिना ज़िम्मेदारी के कोई अधिकार ना हो. ये हमारे सुझाव थे जिसमें हमें बहुत हद तक कामयाबी मिली है.''

संसद बनाए कानून

पीटीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि नौकरशाही के कामकाज में व्यापक सुधारों का सुझाव देते हुए न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि नौकरशाहों की नियुक्ति, स्थानांतरण और उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को नियंत्रित करने के लिए संसद को एक कानून बनाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक संसद कानून नहीं बताती है, तब तक अदालत के दिशानिर्देशों का पालन किया जाएगा.

पीटीआई के मुताबिक अदालत ने कहा कि नौकरशाही में ज़्यादातर गिरावट राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण आई है और नौकरशाहों को राजनीतिक पदाधिकारियों के मौखिक आदेश पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए और उनकी प्रत्येक कार्रवाई लिखित संवाद पर आधारित होनी चाहिए. इस खंडपीठ में न्यायमूर्ति पीसी घोष भी शामिल थे.

टीएसआर सुब्रहमण्यम ये भी मानते हैं कि आदेशों के काट ढूंढ लेना राजनीतिज्ञों के हाथ में है लेकिन फिर भी वे कहते हैं कि ''यह पहला क़दम है. भारत में आजकल मीडिया और नागरिक समाज बहुत सशक्त हो गया है, सूचना का अधिकार है.सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना अब इतनी आसानी से नहीं हो सकती. ये प्रक्रिया है.ऐसा नहीं है कि एक आदेश आया और सब कुछ ठीक हो गया.''

तय हो कार्यकाल

हाल में उत्तर प्रदेश की आईएएस अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन के बाद अधिकारियों के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर बहस छिड़ गई थी.

अदालत ने कहा कि नौकरशाहों के न्यूनतम कार्यकाल को तय करने से न सिर्फ उनमें पेशेवराना अंदाज़ और कार्य कुशलता का विकास होगा बल्कि बेहतर प्रशासन में भी मदद मिलेगी.

अदालत ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से कहा कि वो नौकरशाहों को कार्यकाल को तय करने के लिए तीन महीनों के भीतर दिशानिर्देश जारी करें.

राजनीतिक प्रतिकूलता की स्थिति में एक नौकरशाह को क्या करना चाहिए इस सवाल के जवाब में टीएसआर कहते हैं कि ''अगर आदेश वैधानिक दायरे में है तो उन्हें पालन करना पड़ेगा औऱ वरिष्ठ स्तर पर उन्हें बिना व्यक्तिगत बनाए सलाह देनी होगी. अगर सीमा से ज़्यादा कुछ हो जाए तो फिर अपना अपना रास्ता देखना होगा.'

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