शाहिद आज़मी: '‏भाई ने ख़ुद को बदला, नाइंसाफ़ी से लड़े'

  • 20 अक्तूबर 2013
शाहिद आज़मी
सामाजिक कार्यकर्ता और वकील ‏शाहिद आज़मी की साल 2010 में हत्या कर दी गई थी.

शुक्रवार को रिलीज़ हुई है हंसल मेहता निर्देशित फ़िल्म 'शाहिद', जिसमें मुख्य भूमिका निभाई है राजकुमार यादव ने.

फ़िल्म आधारित है सामाजिक कार्यकर्ता और वकील शाहिद आज़मी की असल ज़िंदगी पर जिनकी साल 2010 में हत्या कर दी गई थी.

शाहिद पर कभी चरमपंथी होने का आरोप लगा था और बाद में उन्होंने जेल से बाहर आकर कानून की पढ़ाई पढ़ी और ऐसे कई लोगों की कानूनी लड़ाई लड़ी जो कथित तौर पर पुलिस की ज़्यादतियों के शिकार हुए.

(रिव्यू: 'शाहिद')

ऐसे में हमने सोचा कि असल ज़िंदगी के शाहिद के परिवार से मिला जाए.

ख़ालिद आज़मी ने जिस कुर्सी पर बैठकर हमसे बात की उसी कुर्सी पर उनके बड़े भाई शाहिद आज़मी आज से तीन साल पहले बैठे थे जब उन पर गोलियां चलाकर उनकी हत्या कर दी गई.

आज ख़ालिद उसी ऑफ़िस की उसी कुर्सी पर बैठकर अपने मुवक्किलों से उनके केस के बारे में चर्चा करते हैं.

शाहिद का इतिहास

शाहिद आज़मी
अपने परिवार के साथ शाहिद आज़मी (बीच में)

बताया जाता है कि शाहिद कभी कश्मीर स्थित चरमपंथी कैंप का हिस्सा थे. लेकिन फिर वो जल्द ही वहां से लौट आए थे.

उनके भाई ख़ालिद साफ़ तौर पर इस बारे में तो कुछ नहीं बताते. ख़ालिद ये ज़रूर कहते हैं कि उनके भाई से ग़ल्ती हुई ज़रूर थी लेकिन जल्द ही वो पूरी तरह से बदल गए थे.

शाहिद जब कश्मीर से वापस लौटे तो उन्हें कुछ दिनों बाद जेल में डाल दिया गया था.

ख़ालिद उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मैं तब बहुत छोटा था. मुझे सिर्फ़ इतना याद है कि पुलिस जब चाहे तब हमारे घर आ जाती थी और तरह तरह के सवाल पूछती थी. कई बार तो मैं रोने लगता."

कैसे बने वकील ?

ख़ालिद के मुताबिक जेल में रहकर शाहिद ने आत्मविश्लेषण किया और बाहर आने के बाद वो पूरी तरह से बदल गए.

ख़ालिद ने दावा किया कि कानून की पढ़ाई पढ़ने और वकील बनने के बाद उनके भाई शाहिद मुस्लिम समुदाय के उन युवा लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने लगे जिन पर चरमपंथी होने के ग़लत आरोप लगे और जिन्हें कथित तौर पर पुलिस ज़्यादतियों का शिकार होना पड़ा.

अपने भाई में आए इस बदलाव के बारे में ख़ालिद कहते हैं, "जेल में रहकर उन्होंने काफ़ी किताबें पढ़ीं. उन्हें कई अच्छे लोगों का साथ मिला. और जेल से बाहर आकर वो पूरी तरह से बदल चुके थे."

हत्या

शाहिद आज़मी
शाहिद आज़मी पर कभी चरमपंथी होने के आरोप लगे थे.

26 नवंबर 2008 में मुंबई में हुए हमलों में फ़हीम अंसारी पर भी इस हमले की साज़िश में शामिल होने के आरोप लगे थे. लेकिन शाहिद आज़मी ने फ़हीम का केस लड़ा और कोर्ट ने फ़हीम को आरोपों से मुक्त कर दिया.

ख़ालिद दावा करते हैं कि शाहिद ने इसी तरह से कई और बेगुनाहों को इंसाफ़ दिलाया. इसी वजह से उन्हें धमकियां मिलने लगीं. और 2010 में उनके ऑफ़िस में उनकी हत्या कर दी गई.

ख़ालिद के मुताबिक़ उनकी मां ने उन्हें काफ़ी हिम्मत दी और अब उन्होंने ख़ुद वकील बनकर अपने बड़े भाई के अधूरे काम को पूरा करने की ठानी है.

ख़ालिद ने हंसल मेहता की फ़िल्म 'शाहिद' देखी है. फ़िल्म में अभिनेता राजकुमार यादव ने उनके भाई का रोल अदा किया है. ख़ालिद उनके काम से बेहद ख़ुश हैं और मानते हैं कि राजकुमार ने हूबहू उनके भाई को पर्दे पर उतारा है.

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