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जिहादी चरमपंथ: पाकिस्तान को मनाने में नाकाम हुआ अमरीका

 शुक्रवार, 11 अक्तूबर, 2013 को 09:13 IST तक के समाचार
हुसैन हक्कानी

अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक़्क़ानी के अनुसार अमरीका की ये उम्मीदें नाकाम साबित हुई हैं कि वो पाकिस्तान को क्षेत्रीय युद्ध में जिहादी चरमपंथियों का इस्तेमाल न करने के लिए राज़ी कर लेगा.

अपनी आने वाली किताब 'मैगनीफिसेंट डिल्यूज़न्स' में हक़्क़ानी ने अमरीका और पाकिस्तान लंबे मगर उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों की पड़ताल की है. उन्होंने कहा है कि अमरीका कम्युनिज़्म के ख़िलाफ़ युद्ध में पाकिस्तान की मदद चाहता था लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा इस सिलसिले में अपने वादे को पूरा नहीं किया है.

हक्क़ानी के अनुसार, पाकिस्तान ने बंटवारे के बाद नहीं, उसके पहले से ही अमरीका से मदद लेने के प्रयास शुरू कर दिए थे.

वह कहते हैं कि पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए अमरीका का इस्तेमाल किया.

यहाँ तक कि अमरीका की पाकिस्तान को परमाणु हथियार न बनाने या कम करने की तथा क्षेत्रीय युद्ध में जेहादी चरमपंथियों का इस्तेमाल न करने के लिए मनाने की कोशिशें भी नाकाम रहीं.

हक़्क़ानी कहते हैं, "पाकिस्तानी सियासतदानों ने अमरीकी सरकार को भरोसा दिलाया कि वह और मध्य पूर्व एशिया के बाकी इस्लामिक मुल्क उनका हर तरह से साथ निभाएंगे और सोवियत रूस को पाकिस्तान और बाकी इस्लामिक मुल्कों पर आक्रमण करने से रोकने में फ़ौजी सहायता करेंगे."

जस के तस हालात

ज़्यादातर पाकिस्तानी अमरीका से ख़ुश नहीं हैं.

अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत के अनुसार, "पाकिस्तानी सियासतदानों ने और फ़ौजी तानाशाहों ने हमेशा अमरीका का इस्तेमाल अपनी फ़ौजी ताक़त बढ़ाने के लिए किया. सबसे अहम बात यह है कि सन 1947 से अब तक अमरीका ने पाकिस्तान को 40 बिलियन डॉलर की मदद की है. लेकिन इतनी बड़ी राशि ख़र्च करने के बाद भी पाकिस्तानी आवाम आज बदतर हालात में जी रही है."

हक्क़ानी कहते हैं, "पाकिस्तान और अमरीका एक दूसरे को अपना दोस्त समझते हैं लेकिन आपसी संबंध को लेकर दोनों का नज़रिया एकदम अलग है. कई बार वादा करके भी पाकिस्तान ने अमरीका की किसी भी फ़ौजी मुहिम में साथ नहीं दिया."

उनके अनुसार दोनों ही मुल्क इस तरह के संबंधों से ख़ुश नहीं है.

वह कहते हैं कि पाकिस्तान में बहुत बड़ी आबादी अमरीका के ख़िलाफ़ है और कई अमरीकी राष्ट्रपति पाकिस्तान को मदद करने के पक्षधर नहीं रहे. पाकिस्तान को मदद के औचित्य पर कई बार सवाल उठाए गए.

अमरीका का मानना है कि आतंक के ख़िलाफ़ जंग में पाकिस्तान विश्वसनीय सहयोगी नहीं रहा है

हक्क़ानी का कहना है, "लेकिन हर बार यह सवाल अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यकाल के अंतिम दिनों में उठाए गए. अगर अमरीकी सियासतदानों ने पाकिस्तान को मदद करने के मसले पर आपस में चर्चा की होती तो आज हालात कुछ और होते."

उनके मुताबिक़ पाकिस्तान और अमरीका के संबंधों के लिए सियासतादानों से ज्यादा दोनों मुल्कों के कूटनीतिज्ञ ज़िम्मेदार हैं.

उन्होंने कहा, "अब समय आ गया है कि पाकिस्तान अपनी फ़ौजी ताक़त बढ़ाने के बजाए सामाजिक प्रगति पर ध्यान दे. किसी भी मुल्क के लिए सशक्त फ़ौज ज़रूरी होती है लेकिन फ़ौजी ताक़त और सामाजिक उन्नति में तालमेल होना बहुत ज़रूरी है."

तानाशाही का वक़्त ख़त्म

भारत कश्मीर

हक्कानी का कहना है कि पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी युद्ध में जिहादियों का इस्तेमाल कर रहा है

भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा हालात के बारे में वह कहते हैं, "क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि शुरुआती दौर में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव होना स्वाभाविक है. लेकिन भविष्य में हमारा रिश्ता ऐसा हो जैसा अमरीका और कनाडा के बीच है."

"मैं हमेशा से इस बात का समर्थक रहा हूँ कि पाकिस्तान और भारत अपने रिश्ते सुधारने की कोशिश करें और जो भी विवादास्पद मुद्दे है, उन्हें फ़िलहाल अलग रखें. बंटवारा अब इतिहास बन चुका है बार-बार उसे उछालने और युद्ध करने से किसी को कुछ हासिल नहीं होगा."

जर्मनी और फ़्रांस का उदहारण देते हुए हक्क़ानी ने कहा कि दो विश्वयुद्ध होने के बावजूद आज जर्मनी और फ़्रांस के बीच मित्रता है और आपसी व्यापार बहुत उम्दा तरीक़े से चल रहा है.

आसियान देशों में विएतनाम तथा फ़िलीपीन्स आर्थिक सहयोग का अच्छा उदहारण हैं. भारत तथा पाकिस्तानी सियासतदानों को इनसे सीख लेनी चाहिए.

भारत और पाकिस्तान के सौहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए पाकिस्तान में लोकतंत्र का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है.

वह कहते हैं, "मैं जानता हूँ कि यह बहुत कठिन प्रक्रिया है लेकिन पाकिस्तान में इसकी शुरुआत हो चुकी है. राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी सरकार ने अपने पांच साल पूरे किए, और अब भी पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक सरकार बनी है. यह लोकतंत्र की सदी है और फ़ौजी तानाशाही की कोशिशों को मान्यता नहीं मिलेगी."

"पाकिस्तान के फ़ौजी तानाशाहों ने अवाम के बीच भारत के लिए नफ़रत पैदा की है. इसके लिए उन्होंने पाठ्यक्रम भी बदलवा दिए. लेकिन अब यह रुकना चाहिए और पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि नफ़रत फ़ैलाने के प्रयासों के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाए."

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