जब हाथियों का झुंड घरों में घुस जाए

  • 7 अक्तूबर 2013
हाथी, छत्तीसगढ़

क्या होता है जब घरों में हाथियों के घुसने का ख़तरा हर वक़्त मंडराता हो ? यह छत्तीसगढ़ के धरमजयगढ़ के ग्रामीण इलाकों के रहने वालों से बेहतर भला कौन बता सकता है. पिछले दस सालों से इस इलाके में 150 हाथियों का झुंड घूम रहा है और पिछले दस सालों से ही यहाँ के रहने वालों और हाथियों के बीच संघर्ष भी चल रहा है.

इस लड़ाई में अब तक 62 लोग मारे जा चुके हैं जबकि 23 हाथियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी है.

अगर हाथियों के झुंड का धैर्य ख़त्म होता जा रहा है तो लोगों का सब्र भी अब जवाब देता जा रहा है. लोगों ने भी अब हाथियों के खिलाफ गोलबंद होना शुरू कर दिया है.

रोज़ हो रहे हाथियों के हमलों से तंग आकर अब इस क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों के लोगों ने वन विभाग को चेतावनी दी है कि अगर इसी तरह उनके जान और माल का नुकसान होता रहा तो वो इस इलाके में घूमने वाले सभी हाथियों से खुद ही निपटने के लिए मजबूर हो जायेंगे.

मुआवज़ा की मांग

मुआवज़े और सुरक्षा के सवाल को लेकर ग्रामीणों के प्रदर्शन लगातार जारी हैं.

लोगों का आरोप है कि दिन-ओ-दिन इस इलाके में हालात बेकाबू से होते चले जा रहे हैं और नौबत यहाँ तक आ पहुंची है कि हाथियों के झुंड अब शहर में घुस कर नुकसान पहुंचा रहे हैं.

दो महीनों के दौरान ही बायसी और उसके आस पास के इलाकों जैसे सागरपुर, आमपल्ली और ओंगना में हाथियों ने तीस से ज्यादा मकानों को तोड़ तो दिया ही, साथ ही इस पूरे इलाके में फसलों को भी काफी नुकसान पहुंचाया है.

यहीं रहने वाली पारुल बैरागी ने बताया कि किस तरह उनका परिवार रात को सो रहा था तभी हाथियों के झुंड ने उनके घर को तोड़ डाला. परिवार ने किसी तरह जान तो बचा ली. मगर घर पूरी तरह से टूट गया है. पारुल का कहना है कि इतने नुकसान के बावजूद वन विभाग ने उन्हें मुआवज़े के रूप में एक फूटी कौड़ी तक नहीं दी है. कई और ग्रामीणों का भी दावा है कि कुछ मामलों में वन विभाग ने मुआवज़ा दिया तो, मगर नुकसान के मुकाबले मुआवज़ा बेहद कम था.

धरमजयगढ़ के वन अनुमंडल अधिकारी आर सी अग्रवाल ने बीबीसी को कि मरने वालों के आश्रितों को सरकार दो लाख का मुआवज़ा देती है साथ ही जिनकी खेती का नुकसान होता है उन्हें भी फसल और ज़मीन के हिसाब से मुआवज़ा दिया जाता है.

इस इलाके में ज़्यादातर लोग बांग्लादेशी शरणार्थी हैं जिन्हें यहाँ सरकार ने बसाया था और ये सभी बाशिंदे पूरी तरह से खेती पर ही निर्भर हैं. हाथियों के हमले उस समय ज्यादा बढ़ जाते हैं जब फसल के काटने का वक़्त होता है.

पिछले दस सालों में इस संघर्ष में 23 से ज़्यादा हाथी मारे जा चुके हैं.

छत्तीसगढ़ बंग युवा समिति के सजल मधु बताते हैं कि फसलों को हो रहे नुकसान की वजह से कई किसानों का दिवाला निकल गया है.

वो कहते हैं, "अब जब मकई की फसल तैयार हो गई, तब हाथियों ने हमला कर सब कुछ तहस-नहस कर दिया. हजारों एकड़ में लगी धान और मकई की फसल बर्बाद हो गयी है और साथ में वो किसान भी बर्बाद हो गए हैं जो इसके तैयार होने का इंतज़ार कर रहे थे."

यही वजह है कि इलाके के लोगों का अक्रोश बढ़ता ही जा रहा है.

सामाजिक कार्यकर्ता धीरेंद्र सिंह मालिया का कहना है कि इन इलाकों में हाथियों के मरने के बाद कई ग्रामीणों पर भी वन विभाग ने मामले दर्ज किये हैं. उनका कहना है कि अमूमन खेतों में पानी पहुंचाने के लिए किसानों ने बोरवेल लगवाए हैं जो बिजली से चलते हैं.

उनके अनुसार, "कुछ मामलों में ऐसा हुआ कि हाथियों का झुंड खेत में धान खाने आया. खेत में पानी भरा हुआ था और बोरवेल में लगा तार टूट गया जिस वजह से हाथी की बिजली लगने से मौत हो गई."

धरमजयगढ़ के वन अनुमंडल अधिकारी आर सी अग्रवाल ने बीबीसी को बताया कि पिछले कुछ महीनों में जिन खेतों में हाथियों की बिजली लगने से मौत हुई है उनके मालिकों पर मामले दर्ज किये गए हैं. ग्रामीणों की मांग है कि इस तरह के मामलों को फ़ौरन वापस लिया जाए.

ग्रामीणों के आरोप

लोगों ने अब हाथियों के खिलाफ गोलबंद होना शुरू कर दिया है.

ग्रामीणों का आरोप है कि हाथियों के हमलों के वक़्त वन विभाग का अमला उनकी कोई मदद नहीं करता. आमापाली के रहने वाले कुछ किसानों का आरोप है कि हाथियों के झुंड से निपटने के लिए विभाग न तो प्रयास कर रहा है और न ही नुकसान होने पर सही मुआवज़ा ही दे रहा है.

धरमजयगढ़ के इलाके में हाथियों के आवागमन की वजह से वर्ष 2007 में राज्य सरकार ने लेमू के पास, जंगली इलाके को हाथियों के कारीडोर के लिए चिन्हित किया और वन और पर्यावरण मंत्रालय से इस इलाके को अधिसूचित करने का अनुरोध किया.

मगर कुछ ही दिनों के अन्दर इस इलाके में कोयले के भंडार का पता चला और कई कंपनियों ने यहाँ से कोयला निकालने के लिए आवेदन देने शुरू कर दिए.

वर्ष 2011 में छत्तीसगढ़ की सरकार ने वन मंत्रालय को एक बार फिर चिट्ठी लिख कर हाथियों के कॉरीडोर को बाद्लाखोल के जंगलों में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया.

इस इलाके के तरायमार में भारत एल्युमिनियम कंपनी (बाल्को) का कोयले का ब्लॉक प्रस्तावित है जिसको लेकर पत्राचार चल रहा है. ग्रामीणों को आश्चर्य है कि जिस इलाके में 62 लोग और 22 हाथी मारे जा चुके हैं वहां के बारे में धरमजयगढ़ के वन मंडल अधिकारी ने सरकार को चिठ्ठी लिख कर कहा है कि यहाँ 'हाथियों का आना जाना नहीं है.'

आमापाली के रहने वाले कुछ कृषकों का आरोप है कि हाथियों के झुण्ड से निपटने के लिए विभाग न तो प्रयास कर रहा है और न ही नुकसान होने पर सही मुआवजा ही दे रहा है.

वर्ष 2010 के अक्टूबर माह में लिखी गयी चिट्ठी में कहा गया है, "क्षेत्र में वन्य जीवों के सहवास का प्रमाण नहीं है. बफर ज़ोन में जंगली हाथियों का आवागमन जल स्रोतों के समीप सामयिक तौर पर होता है. हाथियों का प्रवास सामयिक है."

सामाजिक कार्यकर्ता वन मंडल अधिकारी की इस चिट्ठी से काफ़ी नाराज़ हैं. उनका आरोप है कि अधिकारियों ने दबाव में आकर ऐसा लिखा है.

मालिया कहते हैं, "जहाँ इतनी फसल का नुकसान हो रहा है और जहाँ वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार उन्होंने साल 2005 से लेकर 2011 तक मकान और फसल की क्षतिपूर्ति के लिए लोगों को 46 लाख 53 हज़ार 140 रूपए मुआवज़े के रूप में दिए हों. वहां के बारे में वो कहते हैं कि हाथियों का प्रवास सामयिक है. इनकी बातों में विरोधाभास है और ये अपने दस्तावेजों में खुद ही फँस रहे हैं."

स्रोत: वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार

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