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मोदी और महँगाई से कैसे निपटेगी कांग्रेस?

 मंगलवार, 24 सितंबर, 2013 को 07:39 IST तक के समाचार
नरेंद्र मोदी, राहुल गाँधी, कांग्रेस, भाजपा

एडवर्ड सिक्वेरा को उनके दोस्त 'एडी' कहते थे और अख़बार वालों को भी यही नाम ठीक लगता था. छोटा और ख़बर का शीर्षक लगाने में आसान.

50 और 60 के दशक में एडी का जलवा था. हर दूसरे तीसरे दिन उनकी तस्वीरें, उनकी ख़बरें, खेल के पन्नों से लेकर पहले पन्ने तक छपा करती थीं.

मध्यम दूरी के उस बंबईया धावक में रफ्तार तो थी ही, ग़ज़ब की कलात्मक लयकारी भी थी कि निगाहें हटती नहीं थीं. उम्मीदें बनी रहती थीं.

एडी दौड़ते थे तो हज़ारों लाखों लोगों की आकांक्षाओं को पर लग जाते थे.

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तमाम प्रतियोगिताएँ, तमाम पदक और तमाम कीर्तिमान एडी की झोली में आ-आकर गिरते रहे. 800 या 1,500 या फिर 5,000 मीटर की दौड़ में. दो दशकों तक मैदान पर उनका एकक्षत्र राज था. लेकिन 70 के दशक के आते-आते, कुछ उम्र और कुछ दूसरे धावकों की बेहतर कोशिशों ने एडी को पीछे छोड़ दिया.

यहाँ तक कि साल 1966 के बैंकॉक एशियाई खेलों में उन्हें प्रतियोगिता के सबसे 'दुर्भाग्यशाली एथलीट' का अनाधिकारिक तमगा मिला, जिन्हें दौड़ बीच में छोड़नी पड़ी.

मैं एडी से 70 के दशक में मिला था. उस दशक के अंत तक वे यकीनन पहले वाले एडी नहीं रह गए थे लेकिन जज़्बा वही था.

एक सवाल के जवाब में एडी ने कहा था, "मैं लौटूंगा, वापसी करूंगा. बस कुछ सेकेंड की बात है. वही तराशने में लगा हूँ."

एडी वो कुछ सेकेंड नहीं तराश सके.

जादुई आंकड़ा

भारत में आम चुनाव

आज़ाद भारत में एडी का करियर और कांग्रेस पार्टी का हाल कमोबेश एक जैसा है. 50 और 60 के दशक की अपराजेय कांग्रेस. 70 के दशक में आपातकाल के बाद उसका पराभव.

केवल साल 1984 की सुनामी वाली वापसी को छोड़ दें तो, क्योंकि उसके कारण दीगर थे, कांग्रेस आज तक अपने लिए आखिरी कुछ सीटें तब से नहीं तराश पाई है. एडी के कुछ सेकेंड उन पर भारी थे तो कांग्रेस की कुछ सीटें उसके गले की फांस बनी रहीं.

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लगता यही है कि कांग्रेस पार्टी साल 2014 में भी वही कुछ सीटें तराशने में कामयाब नहीं हो पाएगी. जादुई आंकड़ा उससे दूर ही रहेगा. लेकिन कांग्रेसी जज़्बा वही एडी वाला है और खुशफ़हमी है कि बस, कुछ ही दूर रह गए हैं. पिछली दो बार की तरह पहुँच जाएंगे खींचतान कर.

कांग्रेस की हालत निश्चित रूप से अच्छी नहीं है. पांव के नीचे से ज़मीन काफी खिसक चुकी है. दस साल पहले जैसी तो कतई नहीं है, जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अपने पैर पर 'इंडिया शाइनिंग' वाली कुल्हाड़ी मार ली थी. पिछले दस साल से कांग्रेस सत्ता में है और जो भी किया धरा है, उसी का है. महंगाई, भ्रष्टाचार, अक्षम प्रशासन, और यह छवि की उसकी जर्जर इमारत टूटने वाली है. इसे तोड़ने के लिए भाजपा "एक धक्का और दो..." वाले अंदाज़ में राशन पानी लेकर उस पर चढ़ गई है.

कांग्रेस को जैसे मनचाही मुराद मिल गई. वह यही चाहती थी कि "एक धक्का और दो..." वाले अपना नारा पूरा कर दें. मामला थोड़ा खिसककर सांप्रदायिकता की ओर चला जाए.

राजनीतिक समर

गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा

कांग्रेस के रणनीतिकारों को शायद अहसास था कि था कि अकुशल प्रशासन, अक्षम सरकार और निरंकुश भ्रष्टाचार से ज़्यादा बड़ा खतरा महँगाई से है.

उसे पता है कि अरबों-खरबों के आँकड़े और दुबला होता विदेशी मुद्रा भंडार लोग भूल सकते हैं, महँगाई कभी नहीं भूल सकते. वह उन्हें रोज़ सताती है. वे जानते हैं कि महँगाई उनकी सीटें और उम्मीदें खा जाएंगी.

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कांग्रेस को पता है कि चुनाव तो महँगाई पर ही होंगे. पार्टी में बेचैनी थी. उसे एक और मुद्दा चाहिए था जिससे महँगाई की धार थोड़ी कुंद हो. भारतीय जनता पार्टी ने जैसे कांग्रेस की सुन ली और अपनी ओर से एक मुद्दा उसे सौंप दिया. दिल्ली में गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश में अमित शाह और शेष भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की 'वानर सेना.'

अपनी तरफ से कांग्रेस ने भी नरेंद्र मोदी की छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. गुजरात के साल 2002 के दंगों के संदर्भ में उन्हें इतना और इस तरह से आगे बढ़ाया कि एक ज़माने के कट्टर हिंदुत्ववादी नेता लालकृष्ण आडवाणी 'उदार चरित' लगने लगे और किनारे लगा दिए गए, जैसे कट्टर सांप्रदायिकता की परिभाषा ही बदल गई हो.

भाजपा को इस बीच खुद लगने लगा कि अब आडवाणी छाप कट्टरता से काम नहीं चलेगा. उससे ज़्यादा मुखर और कट्टर कट्टरता चाहिए.

एक तरह से देखा जाए तो राजनीतिक समर का ये दौर ढील के पेंच लड़ाने वाली कांग्रेस के हक में गया नज़र आएगा.

कनकौआ लूटने वाले सत्ता की नदी के दूसरे पाट पर अभी साफ नहीं देख पा रहे हैं कि हवा में लहराती दो पतंगों में से असल में कटी कौन सी है?

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