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'इस अफ़सर ने हरियाणा की तस्वीर बदल दी'

 शुक्रवार, 27 सितंबर, 2013 को 07:13 IST तक के समाचार

हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसी लाल और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ एस. के. मिश्रा.

हरियाणा के तीन लालों बंसीलाल, देवीलाल और भजनलाल की दुश्मनी किसी से ढकी छिपी नहीं है लेकिन आईएएस अधिकारी एस के मिश्रा ने इन धुर विरोधी राजनीतिज्ञों के प्रधान सचिव होने की भूमिका बख़ूबी निभाई.

कानपुर में जन्मे 1956 बैच के आईएएस अधिकारी एस के मिश्रा कहते हैं कि बंसीलाल पूरी तरह से राजनीतिक इंसान थे लेकिन ‘मैं उनकी पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेता था.’

मिश्रा की दूसरी चीज़ जिसकी कद्र बंसी लाल और हरियाणा के दूसरे मुख्यमंत्री भी करते थे कि उनका फॉलो अप एक्शन बहुत तेज़ होता था. जो भी काम होता था एस के मिश्रा की कोशिश होती थी कि वो काम आज नहीं कल हो जाना चाहिए था. कल यानी आने वाला कल नहीं बल्कि बीता हुआ कल.

यही वजह रही कि उनका नाम हरियाणा के विकास से जुड़ गया. चाहे पर्यटन हो, सिंचाई की परियोजनाएं हों या सड़कों का विकास. सब के पीछे एस के मिश्रा का नाम लिया जाने लगा.

हरियाणा का विकास

क्लिक करें हरियाणा को पर्यटन के मानचित्र पर लाने की शुरुआत चंडीगढ़ से दिल्ली की एक कार ड्राइव के दौरान हुई थी. करनाल के पास नहर के पास एक खोखे पर पड़ी चारपाई पर बंसी लाल और एस के मिश्रा चाय पी रहे थे.

इसी दौरान मिश्रा ने बंसीलाल से कहा कि इस नहर के बगल में एक अच्छा सा रेस्त्रां खोला जा सकता है और इस नहर का पानी ले कर यहाँ एक कृत्रिम झील बनाई जा सकती है.

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह को कुछ बताने की कोशिश कर रहे हैं एस. के. मिश्रा.

बंसीलाल को ये आइडिया जंच गया और उन्होंने मिश्रा को इस पर काम करने की इजाज़त दे दी. एस के मिश्रा कहते हैं, "मैं बढ़ा चढ़ा कर नहीं कह रहा हूँ लेकिन 70 या 75 फ़ीसदी फ़ाइलें जो मुख्यमंत्री के आदेश से पास होती थीं, मैं ख़ुद ही उन्हें पास कर देता था बिना उन्हें दिखाए हुए. मैं वही फ़ाइलें उनके सामने पेश करता था जिनके बारे में मैं निश्चित नहीं होता था कि उनके बारे में बंसीलाल के विचार क्या होंगे या वो फ़ाइलें जिनके लिए मंत्रिमंडल की मंज़ूरी ज़रूरी होती थी."

यह बताता है कि बंसीलाल का कितना विश्वास उनमें था और दूसरी तरफ मिश्रा ने इस विश्वास का कभी कोई बेजा फ़ायदा नहीं उठाया.

देवी लाल का भरोसा

बंसीलाल के हारने के बाद जब देवीलाल सत्ता में आए को उन्होंने अपनी पहली ही प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ऐलान किया कि एस के मिश्रा जेल जाएंगे. उनके ख़िलाफ करीब पचास केस रजिस्टर किए गए और एस के मिश्रा ने स्टडी लीव पर जाने के लिए आवेदन कर दिया.

आईसीसीआर के एक प्रोजेक्ट पर जाने के लिए स्टडी लीव देने के उनके आवेदन पर हरियाणा सरकार कोई निर्णय नहीं ले रही थी. एस के मिश्रा ने तब देवीलाल से मुलाकात करने का फ़ैसला किया.

हालांकि मिश्रा को डर था कि अगर वो मुलाकात का समय माँगेंगे तो देवीलाल उसके लिए कतई राज़ी नहीं होंगे. इसलिए वो विना अपॉएंटमेंट के गए.

देवीलाल से एस के मिश्रा ने कहा कि उन्हें छुट्टी चाहिए तो देवीलाल बोले, "वापस आ जाओ." मिश्रा ने कहा, "आप तो मुझे जेल भेज रहे थे. आपको अगर विश्वास है तो मैं वापस आ जाता हूँ. जहाँ मर्ज़ी आए लगा दीजिए."

इस पर देवीलाल ने कहा कि आप मेरे प्रधान सचिव के तौर पर वापस आइए. थोड़े दिनों में उनकी सरकार गिर गई और भजन लाल नए मुख्यमंत्री बने.

इंदिरा ने दी जिम्मेदारी

उन्होंने भी एस के मिश्रा को इस पद पर बने रहने के लिए कहा. इसके बाद इंदिरा गाँधी उन्हें भारतीय पर्यटन विकास निगम का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक बना कर दिल्ली ले आईं.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ एस. के. मिश्रा.

लेकिन यहाँ एस के मिश्रा के पर्यटन मंत्री अजीत प्रसाद शर्मा से गहरे मतभेद हो गए. दोनों के मतभेद सुलझाने की कोशिशें हुईं लेकिन जब शर्मा अपने को बदलने को तैयार नहीं हुए तो इंदिरा गांधी ने उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया और एस के मिश्रा को फ़ेस्टीवल ऑफ़ इंडिया के निदेशक की नई ज़िम्मेदारी दी गई.

उनकी देखरेख में क्लिक करें अमरीका, फ़्रांस, सोवियत संघ और क्लिक करें जापान में फ़ेस्टीवल ऑफ़ इंडिया आयोजित किए गए. नेशनल जियोग्राफ़िक ने अपने चार अंकों में फ़ेस्टीवल ऑफ़ इंडिया को कवर पेज पर रखा.

इसके अलावा टाइम, न्यूज़ वीक और आर्किटेक्चरल डाइजेस्ट ने भी इसे कवर किया. संयोग की बात थी कि गाँधी फ़िल्म उन्हीं दिनों रिलीज़ हुई.

इस सब का प्रभाव था कि भारत में यूरोपीय देशों से पर्यटकों की संख्या में 80 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई.

सूरजकुंड मेले की शुरुआत

एस के मिश्रा ने ही दिल्ली के पास सूरजकुंड मेले की शुरुआत की. उन्होंने भारत भर के कलाकारों को यहाँ आने के लिए आने जाने का किराया दिया और उनके रहने की व्यवस्था की. यहां आ कर वो अपनी चीज़े ग्राहकों को सीधे बेचते थे जिससे बिचौलिए द्वारा कमाया जाने वाला लाभ भी उन्हें मिलता था.

मिश्रा ने ही इस मेले की निश्चित तारीख तय कराई. पहली फ़रवरी से 15 फ़रवरी तक. ट्रेवल एजेंसियाँ इसके बारे में अपने ब्रोशर में लिखने लगीं और लोगों के बीच इस मेले का इंतज़ार शुरु हो गया.

1992 में जब चंद्रशेखर भारत के प्रधानमंत्री बने जो उन्होंने एस के मिश्रा को अपना प्रधान सचिव बनाया. उस समय मिश्रा अमरीका में थे. उनकी ग़ैर मौजूदगी में ही उनकी नियुक्ति के आदेश जारी हो गए.

तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ एस. के. मिश्रा.

जब वो चंद्रशेखर से मिलने गए तो उन्होंने कहा, ''मैंने तुमसे संपर्क करने की बहुत कोशिश की लेकिन तुम मिले नहीं. मैंने कहा कि आदेश जारी किए जाएं. मैं तुम्हें मना लूँगा.''

एस के मिश्रा याद करते हैं कि चंद्रशेखर को वो सम्मान नहीं मिला जिसके कि वो हक़दार थे. एक बार गुलमर्ग में कुछ स्वीडिश इंजीनयरों का अपहरण कर लिया गया. स्वीडन के राजदूत चंद्रशेखर से मिलने आए.

चंद्रशेखर का दम

उन्होंने कहा चलो क्लिक करें नवाज़ शरीफ़ से बात करते हैं. फ़ोन पर उनके पहले शब्द थे, ''भाई जान, वहाँ बैठे बैठे क्या बदमाशी करा रहे हो?''

इस पर नवाज़ शरीफ़ बोले कि इससे हमारा कोई वास्ता तो है नहीं. उनको तो मिलिटेंट्स ने पकड़ लिया. इस पर चंद्रशेखर ने कहा, ''असलियत हमें मालूम है. असलियत आपको भी मालूम है. मुझे प्रेस में जाना नहीं है. मानवता के नाते ये इंजीनियर कल सुबह तक छूट जाने चाहिए और मुझे कुछ सुनना नहीं है.''

एस के मिश्रा कहते हैं कि अगले ही दिन ये इंजीनियर रिहा कर दिए गए.

इसके बाद एस के मिश्रा क्लिक करें संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य बने. उनका कहना है कि उन्हें पंद्रह मिनट में ही अंदाज़ा लग जाता था कि सिविल सर्विस के उम्मीदवार में दम है या नहीं.

एक बार जालंधर की एक लड़की सिविल सर्विस का इंटरव्यू देने आई. उससे बाकी सदस्यों नें छह सवाल पूछे. वो किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे पाई.

जब एस के मिश्रा की बारी आई तो उन्होंने कहा, ''तुमने अपने सीवी में लिखा है कि तुम डिबेटर हो. मैं एक प्रीपोसीशन रखता हूँ. तले हुए अंडे ऑमलेट से बेहतर होते हैं. इस पर बहस करो.''

संस्थाओं की शुरुआत

लड़की ने कहा कि मुझे सोचने के लिए क्या दो मिनट का समय दिया जा सकता है. उन्होंने कहा ठीक है. उसके बाद लड़की ने उस विषय पर बेहतरीन भाषण दिया.

इसके बाद एस के मिश्रा ने कहा कि अब मोशन के खिलाफ़ बोलो. उसने फिर बहुत अच्छा बोला. एस के मिश्रा ने उस लड़की को 80 फ़ीसदी अंक दिए. उनके साथियों ने कहा कि उसने किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. तब भी आप उसे इतने अंक दे रहे हैं. मिश्रा का जवाब था, ''मैंने उससे जो सवाल पूछा उसकी उम्मीद वो नहीं कर रही थी. उसने क्विक रिसपॉन्स दिया. एक थिंकिंग अफ़सर में और क्या चाहिए?"

एस के मिश्रा की अगली पारी थी इंटैक के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष के रूप में. उनको ही मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल स्टेशन और बिहार के चंपारन को विश्व हैरिटेज साइट घोषित करवाने का श्रेय जाता है. इतना ही नहीं नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ फ़ैशन टेक्नालॉजी (निफ़्ट) और हरियाणा के मोती लाल नेहरू स्कूल ऑफ़ स्पोर्ट्स के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका रही.

फ़ोटोग्राफ़ी के शौकीन मिश्रा को तरह तरह के विषयों पर किताबें पढ़ने का बहुत शौक है. जब भी वो किसी नई जगह जाते हैं उनका पहला काम होता है उस शहर से संबंधित कोई किताब ख़रीदना. उनके निजी पुस्तकालय में करीब 6000 पुस्तकें हैं. किताबों से जो समय खाली बचता है वो समय वो गोल्फ़ खेलने में बिताते हैं.

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